प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2019
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

अमीं अस्तो

एक पेड़ गिराकर हर बार
मृत्यु की एक नयी परिभाषा गढ़ी जाती है
तुम्हारी छोड़ी गयी साँसों पर ही ज़िन्दा है जो
उसके काट दिये जाने से
उम्र की सरहदें भी सिकुड़ती जाती हैं।

काट दोगे किसी बरगद की बाँहें तो
हवा के बे-ख़ौफ़ झोंके रोज़ सनसनी मचायेंगे
उखाड़ फेंकोगे गर ज़मीन से एक भी जड़
भूख से उपजे ख़ंज़र तुम्हारा ख़ून बहायेंगे।

बेघर परिन्दों के मुकद्दस घरौंदें
रौंद देने से चहक बुलबुल की रोती है ख़्वाब में
भूल जाती हैं ललचाई हुई क़ौमें
एक आग भी होती है फूलों के हिज़ाब में।

ज़रूरत पर एक बूँद की, समन्दर लाते हैं
चल नहीं सकते मगर दुनिया चलाते हैं
जो बीज बनकर दफ़न होना जानते हैं
वो दरख़्त बनकर कभी भी उग जाते हैं।

सुनी होगी चिपको वूमैन गौरा के साहस की कथा
जिसकी याद में सुबकते हैं हिमाचल के हज़ारों देवदार
उत्तराखण्ड के जंगलों मे लगती है जब-जब भी आग
झुलसे हुये पेड़ करते हैं किसी बहुगुणा का इन्तजार।

बरगद, नीम, शहतूत, आम, बाँस और शीशम हो
सागवान, ख़ेजड़ी, तुलसी, चंदन और सफ़ेदा हो
हर तरफ़ नज़र में जिसकी गुलाब, पलाश, गेंदा हो
चाहता हूँ एक अमीर ख़ुसरो फिर से पैदा हो
जो कहीं भी बैठे, लेटे और कहता-कहता न रुके
"अगर फिरदौस बर रू-ए-जमीं अस्त
अमीं अस्तो अमीं अस्तो अमीं अस्त।"


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सबसे बुरी मनुष्यता

सबसे कोमल माँस होता है पृथ्वी का
सबसे सुन्दर काया होती है पेड़ की
सबसे स्वादिष्ट होती है छाँव तारों की
सबसे करूण होता है हृदय हवा का
और
सबसे अच्छी संगत होती है प्रकृति की

इसीलिए
सबसे अधिक नोची गयी है धरती
सबसे अधिक दुहे गये हैं पेड़
सबसे अधिक परोसी गयी है रात
सबसे अधिक वर्गलायी गयी है हवा
सबसे अधिक पीड़ित हुई है प्रकृति

वस्तुत: एक दिन
सबसे बुरी साबित हो जायेगी मनुष्यता।


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हम अमानुष हैं

हमने जन्म लेते ही
शुरू कर दिया उसकी कोख का खनन
और आमरण लगे रहे इसी घमण्ड में
कि मनुष्य से उच्चतर कौन है अब
इस तरह पृथ्वी को हमने
बाँझ कर, गाली देना प्रारम्भ कर दिया।

जब जैव-विकास का संघर्ष चल रहा था
तब किये गये सब कार्यों के बदले में
हमने प्रकृति से दो आँखें माँगी थी
हमें वरदान में थोड़ा पानी और नमक भी मिल गया
हमने नमक को खारा कह नकार दिया
और जल केवल उतना ही बचा पाये
जिससे दु:खी होने का स्वांग रचा जा सके।

हमारे पूर्वजों ने हमें एक विरासत सौंपी थी
ताकि दुनिया में रोशनी और चेहरों पर तेज बचा रहे
मगर आग हमारे लिए केवल
दिलों में पलने वाली भड़ास रही
या फिर दिमाग़ में चुभने वाली ईर्ष्या।

वायु हमारे लिए उस तरह कभी नहीं रही
जिस तरह पंछियों ने उसको छूकर जाना है
वह सिर्फ़ मुफ़्त में मिलने वाली एक चीज़ है
जिसे ग़ैर-ज़रूरी ज़रूरतों के हिसाब से हमने
इत्र और ज़हर का एक मिश्रण बना दिया है।

हमारी पहुँच से बहुत परे होता है
सचमुच में अगर कोई आकाश होता है
लेकिन इसे भी हमने रगों और हड्डियों में
रक्त और मज्जा के स्थान पर
विषैली रिक्तता बनाकर स्थापित कर दिया है।

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से बने हम
और हमने अपने होने को ही नष्ट कर लिया है
हमारे साथ घटित तमाम दुर्घटनाओं के लिए
समय को दोष देने वाले हम मनुष्य
अगले कई युगों तक अमानुष कहे जायेंगे।


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पृथ्वी का प्रतिशोध

आग बरसती है
धरती पर
इसलिए नहीं कि
सूरज का
बढ़ रहा है तेज
बल्कि इसलिए कि
गिर रहा है
हमारा स्तर
दिनो-दिन

गिन-गिन हम माया
काया पे धरती की
करते हैं वार
प्यार से अनजान
दुकान बना चुके हैं
ज़िन्दगी और
और गुज़र रहे हैं
किसी आँधी की तरह
रिश्तों के नज़दीक से
जैसे ये बताना ही ध्येय हो
कि हेय हैं सब
समक्ष हमारे
हम ही हैं जो हैं

इसलिए तप रही है
क्रोध में धरती
ले रही है
प्रेम में प्रतिशोध
कि जितना दिया है
उतने से अधिक ही
छीनकर मानूंगी।


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मातम

ये समय सुबहों के चिलचिलाने का है
सीधी-सादी दोपहरियाँ
अब ले रही हैं सूरत मौत की
शामें झुंझलाकर बदल लेती हैं पाली
कभी रात की तरफ़
कभी दोपहर की तरफ़।

धरती की कोख का हरापन
अब लिपट गया है आत्मा के घावों पर
आकाश की नीली काया
झुलस कर सफ़ेद हो गयी है
तुम मानो या मत मानो
पूनम को चाँद की ग़ैरहाज़िरी
हमारे गुनाहों का काला चिट्ठा है।

ये जो भूख है ना
निगल लेना चाहती है आदमीयत
और ये प्यास पी जाना चाहती है
इस दुनिया की सारी सुन्दरता
तुम मानो या मत मानो
ये जो बादलों की ख़ामोशी है ना
हमारे भीतर से मर जाने का मातम है।


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विलोम/ समानार्थी

यदि तुम पृथ्वी को केवल पृथ्वी ही कहते हो
तो ये भी तय है कि
तुमको प्रेम करना नहीं आया अभी तक।

यदि तुम हवा को हवा कहके ही पुकारते हो
तो ये भी तय है कि
तुमको जीवन समझ नहीं आया अभी तक।

यदि तुम्हें लगता है जीवन का विलोम मृत्यु है
तो अब तक पढ़ी गयी सब पुस्तकें
तुम्हारे लिए व्यर्थ ही रहीं हैं।

तुम किसी क्षण प्रेम में आकण्ठ डूबना
पृथ्वी को माँ कहके पुकारना
हवा को तुम जैसा ही गुमराह किरदार समझना
जो कुछ भी विलोम रहा है आज तक
संभव है वही तुमको समानार्थी प्रतीत हो।


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फूल तोड़ना मना है

इन पुष्पों को देखिए
कितना मुस्कुराते हुए महकते हैं!
वर्ण भी इतने, रूप भी इतने
कि सब शब्दमालाएँ मुँह ताकतीं फिरें।

तुम्हें एक बात और बताऊँ सखि!
ये इतने प्रेमिल हैं
कि तितलियाँ हों, भौंरे हों, कीट-पतंगे जो भी हों
इनको अन्तर नहीं पड़ता
ये सबको बता देते हैं मधु कहाँ रखा है
इस भाँति देते हैं मधुरस निर्देश
जैसे जीवन संदेश ही देते हों।

और भी बहुत-सी बातें हैं सखि!
जिनसे पता चलता है
ये हमसे श्रेष्ठतर हैं हर लिहाज़ से
ये मोह नहीं रखते जीवन से
जब लगता है कि समय आ गया डाल से छूटने का
ये स्वयं ही टूट जाते हैं
तनिक भी अवसर नहीं देते डाली को
कि दुत्कार दे
और विस्मय की पराकाष्ठा सुनो प्रिय!
यह टूटन आत्महत्या नहीं कहलाती।

तुम मुझे पुष्प भेंट न किया करो
पाप लगता है, जीवन से पूर्व ही जीवन लेने से।


- राहुल कुमार बोयल
 
रचनाकार परिचय
राहुल कुमार बोयल

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कविता-कानन (1)