प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2019
अंक -51

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

धरती की पुकार

आकाशगंगा में तैरते हुए
बेहद दुर्गम क्षेत्र में
फँस गई है धरती

जैसे कंटीले झुरमुट में
फँसी गोरैया कराह रही हो
नुच गए हों
जैसे उसके पंख

जल गए हैं सारे पेड़
धरती को लग गया है चर्मरोग
दाद, खाज या कुष्ट रोग

चल रहे हैं चारों ओर
बारूद के खेल
अंतहीन विध्वंसकों की गूँज
उन्हें उगलना है आग
क्षणांश प्रतिस्पर्धा में
सुलग रही है
विनाशक से विनाशक
आग की ज्वालाएँ

जलहीन होती सतह पर
सहमे हैं पेड़
जैसे ईराक, सीरिया की जनता
बेबस और असहाय
पता नहीं किस पल
समाप्त हो जाएँ अनगिनत ज़िंदगियाँ
युद्ध में, अगले धमाके में
पता नहीं कौन है
क्रूरता का मास्टरमाइंड
जो कर रहा है
इंसान होकर इंसान का शिकार

अब कोई नहीं जाता
पेड़ की शव यात्रा में
लेकिन आज भी बिना नागा
आदमी की शवयात्रा में
अवश्य जाता है पेड़

अब कोई नहीं सुनता
गौरैया, पेड़ या
धरती की पुकार


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धरती ने कहा

धरती बोली फिर गुस्से में
क्यों हो रहे मेरी छाती पर
सतत युद्ध पर युद्ध! बताओ़?

महाधमाकों से
बिखरी हैं
मरी और अधमरी पीढ़ियाँ
सनी खून से क्यों मनुष्यता
कौन है विजयी, कौन पराजित
पता नहीं है

गिद्ध अनेकों
मना रहे हैं मौत का उत्सव
सात समुद्रों का पानी भी
खौल रहा है महाताप से

मैंने जो ओढ़ा हरा शाल
अब वही हुआ इतना बदहाल
अनगिन मकड़ी बुनने आईं
सन्नाटे के विकराल जाल

धरती ने कहा-
ओ धर्मधुरंधरो!
ओ तानाशाहो!
ओ बाजारियो!
इस युद्धकाल में
संकट में अस्तित्व मेरा है
और अस्मिता लगी दाँव पर

धरती बोली-
अये इंसानो! अये इंसानो!
युद्ध अगर लड़ने हैं तुमको
लड़ लो और कहीं पर जाकर
मगर युद्ध से मुझको अब तुम
मुक्त करो
अब मुक्त करो


*******************


इस बार बसंत

इस बार बहुत कुछ बदल गया
इस बार बसंत बहुत भटका
इस बार न उसके नाम
कोई कवि ने अपनी कविता लिक्खी
आँखों में इक उदास मौसम
उसके ज्यों आकर पसर गया!
जैसे एक सिसकी ठहर गयी!

दुविधा में था अब यह बसंत
क्या करे और क्या नहीं करे?
आकर क्या उसने गलती की?
क्या मुँह लटकाए लौट जाए?

इस बार यहाँ न मिले उसे
वह बाग़, बगीचे, वे कानन
न आवभगत, न अपनापन

इस बार उसे उत्सुक होकर
न कोई लेने ही आया
न छुए किसी ने पाँव-वाँव
न माँगा बच्चों ने आशीष
मन में बस भरती गयी टीस

इस बार झड़े सूखे पत्ते
नहीं जमा हुए स्वागत करने
अगवानी पर, इस ड्योडी पर

वह पूछ-पूछ उन तक पहुँचा
सोचा अब बच्चे व्यस्त हुए
जब पंहुचूंगा तब मिल लूँगा
करते तो होगे इंतजार
लेकिन इस बार नदारद थी
बगिया और वह हरा लॉन
अब थे सारे ऊँचे मकान

बाहर थे कई सुरक्षागार्ड
मुझसे भी माँगा आई कार्ड
मैंने बतलाया बसंत नाम
किससे मिलना है? बता काम?
पहले से लिया है क्या टाइम?

मैंने बतलाया मैं भैया
सब अपनों से मिलने आया
उनने हमको फिर धमकाया

वन से मैं जब भी चलता था
कितने अरमान सजाता था
आने से पहले भी मैं अनगिन
तैयारी करता था
पूरी गर्मी, पूरी बारिश, पूरी सर्दी
संचित करता था हुलक-पुलक
अनगिन-अनगिन फूलों के रंग
एकत्रित कर खुशबू उमंग
अपनेपन की भरकर तरंग

रखता रहा साल भर बांधे
एक पोटली में हरीतिमा
बिलकुल जैसे
शहर आते बूढ़े माँ-बाप
चलने से पहले
संजोते हैं थोड़ी बड़ियाँ,
थेाड़े पापड़, अचार,
घर की गाय का घी,
बेसन के लड्डू

ममतावश लाद वही लाया मैं
ये प्यार भरी सब पोटलियाँ
पर यहाँ ज़रूरत नहीं रही
बुझ गया बसंत का
उत्फुल्लित मन

उसको बतलाया गया यहाँ
‘ग्लोबल स्प्रिंग उत्सव’ होगा
इक पाँच सितारा होटल में

महँगी महँगी टिकटें होंगी
सब आएंगे सम्पन्न लोग
तीखी खुशबू के साथ-साथ
फॉरेन परफ्यूमों से लकदक
फूलों की ख़ुशबू क्या बिसात

उसने जगमग इन रातों में
नकली बसंतोत्सव देखा
जो मदहोशी से भरा हुआ
जो भोर तलक वीरान हुआ

इस बार किसी ने नहीं कहा
क्यों इतनी जल्दी लौट रहे
इसरार बहुत करते मुझसे
मत जाओ अभी कुछ और रहो

सारा गाँव शहर में आया
महानगर में आन समाया
नहीं बचा है पेड़ कहीं भी
सबके सर अब काट दिए हैं
जंगल जल कर भस्म हो गए
बारूदी रोज़ धमाकों से
जब चारों ओर प्रदूषण है
तब क्या वसंत के संग गाएँ

जीवन की जद्दोजेहद में
नकलीपन सबने ओढ़ लिया
तब चेहरे पर कैसा बसंत
अब भीतर-भीतर पतझर है
किसको फुर्सत कि कूक सुने

जो नयी पत्तियाँ आनी थी
और पेड़ की गोद भरानी थी
उनकी ही हुई भ्रूण ह्त्या
अब समझे कौन उदासी यह
इन जगमग-जगमग शहरों में

सुबह सोचता रहा बसंत
इस बार न उसका मान रहा
ले चल वसंत यह दर्द साथ
क्यों ठहरे अब धरती के पास

अपने प्रवास में वह बसंत
अब जान गया था यह यथार्थ
उस के वियोग में धरती पर
अब कोई नहीं होता उदास

अब कई बार वह सोचेगा
फिर यहाँ लौटने की बसंत
सब भूल गए हैं यह शायद
मौसम कब होता बसंत
वह तो रिश्तों का गर्भस्थल
फिर उससे भी है इतना छल??

जब यहाँ बसंत का मान नहीं
वो आये क्यों यह भान नहीं
तो क्या वह फिर भी आयेगा
अगले बरसों में धरती पर?


*******************


जलीं ख़्वाब से मेरी आँखें

टुकड़ा-टुकड़ा ख़्वाब
याद में उतर रहा है
भीतर ही भीतर यह
मन को कुतर रहा है

अन्तरिक्ष में अब रहता हूँ
पत्नी और बेटा भी संग हैं
तैर रही है पूरी बस्ती

आसपास के अन्य ग्रहों से
आना-जाना लगा हुआ है
भाई मंगल पर रहता है
बहन चाँद पर अब सैटल है

बनकर महा महामानव हम
चले गये हैं अन्य ग्रहों पर
कभी नौकरी करने जैसे
चले आए थे गाँव छोडकर
समंदर पार कहीं अमरीका लंदन
पुरखे अपने फिर न लौटे
अन्तरिक्ष में बरसों पहले
हम जो पृथ्वी से आये थे
श्रेष्ठ महामानव कहलाते

स्वर्ग सुखों के बीच एक दिन
बेटे ने पहचान पूछ ली-
“पापा-पापा मुझे बताओ
अपने पूर्वज, अपने पुरखे
दादू-दादी कहाँ रहे थे
कैसे हमसे छूट गए वे"

क्या बतलाता?
खुद को यादों में लौटाता?
मैंने उत्तर देना टाला
ज़िद कर बैठा लेकिन वह तो

डाटाबेस पुराना खोला
बेटा उसे देखकर बोला-
धरती बनी आग का गोला
सायं-सायं की सुनी कराहें
देखे फटते वहाँ वालकेनो
टकराते उल्कापिंडों से
खौल-खौल कर सागर का जल
सूख रहा था
चारों तरफ नमक की परतें

इससे पहले अजब दृश्य था
महाभयानक, प्रलयंकारी
मानवकृत प्रदूषण फैला
धरती पर कचरा और मैला
इसे डस्टबिन बना दिया था

छीना गया था गुरुत्वाकर्षण
जैसे बूढ़े हाथों में इक
कांप रही हो चाय की प्याली

बढ़ता गया सूर्य सुरसा-सा
वृहतर से वृहतर होता वह
और चाँद भी भाग रहा था
दूर धरा से

धरती ने उर्वरता त्यागी
वहीं भूख ने युद्ध कराए
महा आणविक शस्त्र चलाकर
आत्ममरण को किया निमंत्रित

फटने लगी ओजोन परत भी
बहने लगी गैस ज़हरीली

बढ़ता गया तपन कण-कण में
सूखा और अकाल सदियों तक
लुप्त हो गया पूर्ण हरापन
वहाँ प्राणियों की लाशों से
पटती रही धरा बेचारी
होती गयी विलीन जिन्दगी

समय बीतते देर लगी कब
पलक झपकते बीत गए दिन
साल हजारों

बेटे! एक समय यह धरती
शस्य श्यामला वसुंधरा थी
हम सब इसको माँ कहते थे, धरती माता
हम रहते थे वहाँ... वहाँ, वह देखो
भारतवर्ष वहाँ था अपना
तेरे दादू-दादी का घर
वो तेरा घर
वे तंगी के दिन थे, जिसमें
रिश्ते सारे तंग हो गए
तब परिवार की परिभाषा में
बीबी और बच्चे ही आए

फैली जब गामा किरनें तो
घातक रोग धरा पर फैले
तब हमने की थी तैयारी
धरती से बाहर जाने की
किया पलायन
अपनी बीबी बच्चे लेकर
मात-पिता को वहीं धरा पर
छोड़ झुलसता

मुझे विदा का वक्त याद है
माँ-बापू ने हाथ हिलाए
मुझे लगा आशीष दे रहे
अब भी देखूँ उस जलते गोले में से वो
जैसे अब भी हाथ उठाये

जलती धरती में उभरे थे वे
हाथ देखकर बेटा तब बोला
ज़ूम करो मैं देखूँ उनको, ज़ूम करो तो!

अरे नहीं पापा! ये तुमसे
हाथ हिला कर हेल्प माँग रहे
देखो देखो!

रहा जानता बरसों से यह
नहीं दे सका उन्हें कहीं कुछ
संग-सहारा बूढ़े बाबा!!!
अन्तरिक्ष में हम हैं केवल
इन अफसोसों के हस्ताक्षर

टूटी निद्रा तो ये पाया
जलीं ख़्वाब से मेरी आँखें


- हरेराम समीप
 
रचनाकार परिचय
हरेराम समीप

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