जून 2019
अंक - 50 | कुल अंक - 55
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

यादें
शीशम
 
आसपास यूँ तो छोटे-बड़े कई पेड़-पौधे हैं, मगर उसकी बात ही कुछ और है। कुछ दूर है  मगर बहुत बड़ा है वो पेड़। इसलिए पास ही नज़र आता है। सुबह उठते ही उसकी हरी-हरी पत्तियों पर सूरज की पीली रोशनी पड़ते ही वो ख़ूबसूरत सोने के झरने में स्नान करता हुआ जान पड़ता है। इतना विशाल और भरा-भरा है कि पंछी जब उसकी डालों पर बैठते तो पता ही न चलता कि पंछी कौन और पत्ता कौन!
गर्मियों की दुपहरी जब सब सुस्ता रहे होते तो सच में उसकी शाखें और पत्तियाँ भी मुझे निढ़ाल हुई दिखतीं और शाम को वही पत्तियाँ फिर चिकनी रेशमी ज़ुल्फ़ों की तरह उसके बदन पर फहराती फिरतीं। लेकिन रात में कभी जब मैं बरामदे में खड़ी हो ग़लती से उस पेड़ की तरफ निगाह डाल दूँ तो वो मुझे हज़ार-हज़ार बाँहो वाला कोई दैत्य आकार-सा प्रतीत होता। दिन भर की उसकी इतनी मनभावन अदाओं से बंधी मैं; रात के उस वक़्त में डर के मारे ख़ुद को उसके आगोश से छुड़ा; घर के अंदर दुबक जाती। और फिर सुबह ही नज़र मिलती जब प्यार से उसकी पत्तियाँ अंगड़ाई लेती और मैं दूर से उसे निहारती जाती।
 
हाँ, ऐसा ही तो लगता था मुझे वो शीशम का पेड़। और ऐसा इसलिए लगता था कि उन दिनों मेरी तबीयत ख़राब थी। आसपास के पेड़ों को गौर से देखने के सिवा और कोई काम होता न था दिन भर। उन्हीं दिनों में फरवरी की एक उदास शाम भी थी। दिन ढलते हुए बता रहा था कि कल भी ऐसी ही उदास शाम लेकर आऊंगा। मगर जाने कैसे शाम के उन आखिरी पलों में एक करिश्मा हुआ। शीशम का पेड़, जो मेरी एकटक नज़रों में स्थिर है, अचानक हिला और उसकी अनगिनत शाखों से हज़ारों तोते एक साथ उड़ने लगे। अरे! ये कहाँ छुपे हुए थे? ये उड़ क्यों रहे हैं? मैं आवाज़ देती हूँ- 'अरे ठहरो- ठहरो, रूको'!
लेकिन वो सब फुर्र! फुर्र जिस अदा से हुए हैं मेरी उदासी को भी साथ ले गये हैं। यूँ दिन भर उस पेड़ को देखती रहती, अब शाम को तोतों की उड़ान का भी इंतज़ार करती। वो इकट्ठा किस वक्त होते थे ये पता न चलता। पर मुझे ये पता चल गया था कि इस विशाल पेड़ के अस्तित्व पर इन पक्षियों का संरक्षण ठहरता है। उदास दिनों में वक़्त ठहर गया था जैसे उसी की तरह। मौसम बदलता है, तबीयत सुधरती है, वक़्त गुज़रता है मगर वो शीशम खड़ा रहता है, ज्यों का त्यों अपनी जगह पर।
 
अगले मौसम एक शाम छत पर टहल रही हूँ। चाल में तेज़ी है लेकिन नज़र कहीं रुकना चाहती है। कहाँ?
वहाँ, जहाँ कभी शीशम का पेड़ था। मैं कटे हुए वृक्ष की तरह ढह गई सामने शीशम को न पाकर। भागकर गयी उस अगली गली में जहाँ कुछ नये घर बन रहे थे और शीशम पर अब भी कुल्हाड़ी चल ही रही थी। मैंने गुस्से में पूछा मकान बनाने वाले से- "ये क्यों काट रहे हो?"
आदमी ने दलील दी- "ये मेरे मकान को ढँकने लगा था। सर्दी का वक़्त है। सारे मकान पर छाया कर दी इसने..." उसकी बातें कानों से टकराकर लौट रही थीं। सुनाई दे रही थीं सिर्फ शीशम की सिसकियाँ। जो कह रही थीं- "मैंने किसी का कुछ नहीं छीना। मैं तो हमेशा से अपनी ही जगह पर खड़ा रहा। इसी आदमी ने अपना मकान मेरी जड़ों में उगा लिया और अब जब मेरी छाया इसके घर पर पड़ने लगी है तो ये मेरा साया भी मिटा देना चाहता है"।
मैंने जवाब माँगने की नीयत से आदमी की तरफ निगाह डाली।
कुटिल मुस्कुराहट के साथ वो आदमी अपने सच के सबूत के साथ अपने ही अस्तित्व को मिटाता हुआ कहता हो जैसे- मैं ग़लत कह रहा हूँ तो पूछ लो शीशम से ही।
मैंने शीशम की तरफ देखा। सामने था..इंसान की बेदर्द, स्वार्थी, झूठी दलील के मुकाबले बिना पत्ती, बिना शाख, निढ़ाल, कटेहाल शीशम का मर्मांतक सच।

- प्रतिभा नैथानी

रचनाकार परिचय
प्रतिभा नैथानी

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