प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2019
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख/विमर्श

वृक्ष-वनस्पति धरा के आभूषण हैं! - नीरज कृष्ण 

 

योनास्मै भव पृथिव्यनृक्षरा निवेशनी।
यछास्मै शर्म सप्रथाः।।

अथर्ववेद में कहा गया है - हे पृथ्वी ! तुम मनुष्य के लिए सुखद, निर्बाध और वास - योग होओ। वस्तुतः तुम मनुष्य को सुख दो।

अस्मे वो अस्त्विन्द्रियम अस्मे नृम्णम
उत क्रतुरस्मे , वर्याछंसि सन्तु वः 
नमो मात्रे पृथिव्यै, नमो मात्रे पृथिव्यै,
इयं ते राऽयन्तासि यमनो ध्रुवोदसि धरूणः।
कुष्यै त्वा क्षेमाय त्वा, रय्यौ त्वा, पोषाय त्वा।।
 

यजुर्वेद में पृथ्वी माता को प्रणाम किया गया है। पृथ्वी को देवता माना गया है । तुम्हें कृषि की उन्नति के लिए, तुम्हें जन-कल्याण के लिए, तुम्हें धन - समृद्धि के लिए और जनता के पोषण के लिए बुलाते हैं। अर्थात पृथ्वी जन कल्याणकारी हो और लोगों के समृधि में योगदान दें। यह बात वेदों में तब कही गई खनिज सम्पदा का समाज में उतना उपयोग नहीं होता था।

सृष्टि में विधाता की वैज्ञानिक दृष्टि सर्वत्र द्रष्टव्य है। यहाँ अनगिनत विविधताएँ हैं, किंतु कुछ भी निरर्थक नहीं है। हर वस्तु की कुछ ना कुछ सार्थकता है, उपयोगिता है। ऐसी विविधताओं से भरी सृष्टि में ‘मानव’ उसका चरम निदर्शन है। मानव के साथ शेष प्रकृति का सहचरी भाव भी है और अनुचरी भाव भी। यह दोनों परस्पर अन्योन्याश्रित हैं,यथा- मनुष्य वृक्ष-वनस्पतियों का पौधारोपण करके, उन्हें खाद-पानी देकर उनका पालन-पोषण करता है, तो वृक्ष-वनस्पति अपने बीज, फल आदि भोज्य पदार्थ प्रदान कर मानव के पालन-पोषण का आधार बनते हैं। मनुष्य उनकी जंगली जानवरों से सुरक्षा करता है तो वे भी उसकी सुरक्षा हेतु लकड़ी आदि प्रदान करते हैं, जिससे वह मकान अस्त्र-शस्त्र आदि बना सके। मनुष्य कीट-पतंगों से उनकी रक्षा करता है तो उसे रोग दूर करने की औषधियाँ प्रदान करते हैं, इतना ही नहीं उसे अनेक प्रकार से पूजन, भजन,होम आदि धार्मिक क्रियाओं तथा सजावट और सुविधाओं के लिए उपादान प्रदान करते हैं। कृषि आदि  जीवन के विविध पक्षों के लिए उपकरण तैयार करने की सामग्री भी वृक्षादि ही प्रदान करते हैं। इसी प्रकार मनुष्य प्रकृति के प्रति श्रद्धावनत होता आया है। दिव्य और उपयोगी शक्तियों के परस्ती पूज्य भाव से ओत-प्रोत रहना स्वभाविक भी है। इसी के परिणामस्वरूप वृक्ष-पूजा सदा से की जाती रही है। वैदिक साहित्य में इसके निदर्शन भरे पड़े हैं।

 

संभवतः वन में ‘जी’ उपसर्ग लगाकर ही जीवन शब्द का निर्माण हुआ होगा। ‘जी’ का अर्थ चित्त और प्राण है, वहीँ वन का आशय घर या आलय से है। अतः ‘वन ही जीवन है’कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा। अपनी श्रद्धा और आदरांजलि समर्पित करते हुए मानव को वृक्ष-पूजा के समय उन्हें दिव्य शक्तियों का अनुभव होता रहा है, जिसके कारण उसकी अन्तश्चेतना प्रभावित होती है। किसी भी तत्व में दिव्यत्व का अनुभव हमारी आत्मा को शांति प्रदान करता है। प्राचीन मान्यता है कि पेड़-पौधे में देवी देवताओं का निवास रहता है। जहाँ तक वृक्ष के सांस्कृतिक महत्व की बात है, हमारे पूर्वजों ने इसे शुभ-कार्य तथा उत्सवों से जोड़कर रखा है ताकि इसे पूजनीय बनाये रखा जा सके। इसी प्रकरण में आम्र-विवाह, वट-सावित्री पूजा, तुलसी स्थापना कि परिपाटी प्रारंभ की गयी।

 

पृथ्वी पर मानव और प्रकृति से सम्बंधित जो भी ज्ञान-विज्ञान उपलब्ध है, वेद इनमें प्राचीनतम हैं। यह ज्ञानराशि आज संहिता-ब्राहमण-अरण्यक-उपनिषद तथा छः वेदांगों के रूप में विद्धमान है जिसे वैदिक वाङ्मय कहा जाता है। वैदिक वाङ्मय में पर्यावरण के सभी घटकों का उल्लेख है। मानव एवं पर्यावरण के मध्य सम्बन्ध पुरातन काल से है। पर्यावरण के साथ यह सम्बन्ध जीवन मूल्यों पर आधारित रहा है। मानव में प्रकृति के प्रति अनुराग इतना अधिक है कि उससे अलग अस्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती और इसी भावात्मक जुड़ाव का वर्णन वेदों में वर्णित है।

बराह पुराण में वर्णित है कि जो व्यक्ति एक पीपल, एक नीम या वट, दो अनार या नारंगी, दस पुष्प लताएँ एवं पांच आम्र वृक्ष लगाता है, वह नरक नहीं जाता है। जबकि पद्म पुराण में स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट है कि वृक्षों को काटने वाला नरक का भागी होता है। बौद्ध एवं जैन धर्मावलम्बी तो प्रारंभ से ही प्रकृति-संरक्षण के प्रति संवेदनशील रहे हैं।

 

लोक में यह मान्यता प्राप्त है कि यदि हम दिव्य शक्तियों के निवास-स्थान इन वृक्षादि को नष्ट कर देंगे तो संबद्ध देवताओं के कोप भाजन भी बन सकते हैं। इस भय ने बड़ी सीमा तक पेड़ों को काटने और उन्हें काटने के कारण बढ़ने वाले प्रदूषण से संसार को बचाए रखा। कुछ वृक्षों के अध्ययन और प्रयोग करके उसके गुणों को पहचाना गया।तदनुसार ही उनके उपयोग तथा स्थान तक निर्धारित किए गए। यथा तुलसी का पौधा घर के आंगन में और नीम का पेड़ घर के बाहर लगाया जाता रहा है। पीपल के महत्व को विशेष रूप से पहचाना गया। वह सर्वाधिक आक्सीजन निःसृत करता है। वह वृक्ष के रूप में भगवन का स्वरूप है। भगवान ने उसे अपनी विभूति बताया है- ‘अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणाम’। छांदोग्योपनिषद में तो सारे संसार की उपमा ‘अश्वत्थ’ से दी गई है।

अस्य सोम्य महतो वृक्षस्य यो मुलेभ्याहन्यजीवन स्त्रवैद्धो
स एष जीवेनात्म्नानुप्रभूतः पेपीयमानो मोदमानस्त्तष्ठाती।।
(6/11/1)
 

हे सौम्य! यदि कोई इस महान वृक्ष के मूल में आघात करें तो वह जीवित रहते हुए ही केवल रक्तस्राव करेगा....। यह वृक्ष जीव-आत्मा से ओतप्रोत है और जलपान करता हुआआनंदपूर्वक स्थिर है। गीता में भी कहा गया है- उर्ध्वमूलमधः शाख्माश्वत्थं प्राहुरव्ययम।(15/1)   इसमें मानव के स्नायु-संस्थान की उपमा उल्टे अश्वत्थ से दी गयी है पीपल की एक विशेषता है कि वह अन्य वृक्षों में, भवनों में, पत्थरों के जोड़ों में कहीं भी उग सकता है।

सोम के अतिरिक्त ऋग्वेद में शाल्मली, खदिर, सिन्सोपा, विभिदक, शमी प्लक्ष आदि वृक्षों के नाम भी मिलते हैं। इक्षु(गन्ना) का भी उत्पादन होता था। फूलों वाले वृक्षों में पलाश,कमल, कुमुद के उल्लेख ऋग्वेद तथा आयुर्वेद में हुए हैं। इनके साथ ही फलदार वृक्षों में उर्वारुक, कर्कन्धु, कुवलय, उदुम्बर, खजूर और बिल्ब आदि के उल्लेख भी संहिताओं में प्राप्त होते हैं। फलहीन वृक्षों के भी वर्णन हैं। वनस्पतियों के रस में कतिपय तत्वों का मिश्रण करके औषधियां बनाई जाती थी। इस तरह से देखा जाए तो ऋग्वेद और यजुर्वेद में वृक्ष वनस्पतियों तथा पशु-पक्षियों से संबंधित ज्ञान की महत्वपूर्ण सामग्री उपलब्ध है।

 

ऋषियों ने अपने प्रतिभा ज्ञान से यह बताया कि वृक्ष-वनस्पतियों एवं प्राणियों में वृद्धि हेतु ऊर्जा अथवा अग्नि की आवश्यकता होती है और ऊर्जा से ही जीवाणुओं की स्थापना तथा प्रजनन-क्रिया संभव होती है। वृक्षों पर पुनरुत्पत्ति होते रहना- उनमें जीवन को प्रमाणित करता है। मतस्य पुराण तो वृक्ष की तुलना पुत्र से करते हुए यह वर्णित है

दश कूप समावापी, दशवापी समोह्रिदः।
दशहृदः समः पुत्रो, दशपुत्र समोद्रुमः।।

अर्थात, दस कुओं के बराबर एक बावड़ी है, दस बावड़ी के बराबर एक तालाब है और दस पुत्रों के बराबर एक वृक्ष है। कहने का मूल आशय यह है कि एक वृक्ष से प्राप्त लाभ दस पुत्रों से प्राप्त लाभ के सामान होता है।

इस बात को भली-भांति समझ गया कि मानव और वनस्पति-जगत अन्योन्याश्रित रूप से परस्पर निर्भर हैं, इतना ही नहीं वैदिक ऋषियों ने वनस्पतियों और जड़ी-बूटियों के चिकित्सकीय गुणों की वृद्धि के लिए मंत्र तथा पूजन विधानों का प्रयोग किया है। 

वैदिक संहिताओं के अतिरिक्त प्रतिशत ग्रंथों में विजय दृष्टिकोण यथावत विद्यमान है यह धार्मिक उपनिषद में याज्ञवल्क्य ऋषि ने वृक्षों की तुलना मानव शरीर की है-

यथा वृक्षो वनस्पतिस्थेव पुरुषोमृषा।
तस्य लोमानी पर्णानि त्वागस्योत्पाटीका बहिः।।
त्वच एवास्य रुधिरं प्रास्यन्ति त्वच उत्पतः।
तस्मात् तदा तृष्णात प्रैति रसो वृक्षादिवाहतात।।
मांसान्य्स्य शकराणी किनाट  स्नाव तत स्थिरम।
अस्थिन्य्न्तरतो दारूणि मज्जा मज्जोपमा कृता।।
(वृहदा. 8/7/28) 
 

अर्थात जैसे वन का बड़ा वृक्ष है, ऐसा ही मानव-शरीर है। मानव-देह में रोम है, वृक्ष में पत्ते हैं। मानव की त्वचा है, वृक्ष की बाहरी छाल। जैसे मनुष्य की त्वचा से रक्त निकलता है, वैसे ही वृक्ष की छाल से उत्पन्न रस निकलता है, जैसे कहीं कट जाने पर मनुष्य का रक्त निकलता है, वैसे वृक्ष को काटने पर उसका रस बहता है। मानवीय मांस और मांसपेशियों की तरह छाल के भीतर का भाग निकलता है। पुरुष में जैसे नाड़ी-जाल है, वैसे ही वृक्ष का कीनाट (लकड़ी से लगा हुआ कोमल भाव) है। उसके अंदर की लकड़ियां मानो हड्डियां हैं। उसकी मज्जा पुरुष की मज्जा के समान है। यों तो ऋषियों ने उक्त कथन मध्य किया है और बताया है कि जब कटा हुआ वृक्ष अपनी जड़ के कारण फिर से नवीन रूप में फूट निकलता है तो मृत्यु से कटा हुआ अर्थात मारा हुआ मनुष्य किस मूल से पुनः जन्म लेता है। इस विश्लेषण में दार्शनिक समाधान तो है ही, साथ ही वृक्ष-वनस्पतियों जीवन देखने की दृष्टि भी सुस्पष्ट है, अतः यह मानना कि आधुनिक वैज्ञानिकों ने वृक्षों में जीवन की खोज की- पूर्णतः सत्य नहीं है। अथर्ववेद में वृक्षों का वन का स्वामी कहा गया है, जो मनुष्य को पाप से बचा सकते हैं।

अग्निं ब्रूमो बनस्पतीनोषधीरुत वीरुधः।
इन्द्रं वृहस्पति सूर्य ते नो मुज्ज्न्तवन्हंश।।
अथर्ववेद (11/6/1)
 

वेदों में ‘जल’ को देवता माना गया है। किन्तु उसे जल न कहकर ‘आपः’ या ‘आपो देवता’ कहा गया है। ‘ऋग्वेद’ के पूरे चार सूक्त ‘आपो देवात’ के लिए समर्पित हैं। हमारी धरती रत्नगर्भा है। इसके गर्भ में अकूत संपत्ति छुपी हुई है। प्रकृति ने मनुष्य को जीवन-यापन के लिए बहुत कुछ दिया हैन लेकिन उसकी भी एक मर्यादा है। आज अंधाधुंध कटते जंगल, सिमटती नदियाँ और फैलते शहर हमें विवश कर रहे हैं कि हम भविष्य के बारे में गंभीरता पूर्वक चिंतन करें। यदि हम अपने बच्चों को प्रकृति के साथ रहना नहीं सिखायेंगें तो कल हम-और-वे सिर्फ परिणामों के साथ रहने के लिए अभिशप्त हो जायेंगें।  


- नीरज कृष्ण
 
रचनाकार परिचय
नीरज कृष्ण

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