मई 2019
अंक - 49 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

विशेष

दम तोड़ती पारंपारिक हस्तकला: कैलीग्राफी

 



दोस्तो! पहले बता दूँ कि कैलीग्राफी/अक्षरांकन या सुलेख अक्षर लिखने की वो कला है, जिसमें संकेतों को सुव्यवस्थित ढंग से चित्रात्मक शैली से अर्थपूर्ण बनाकर कुशलता से उकेरा जाता है।

महाभारतकालीन पांडुलिपियों और मुग़लकालीन दस्तावेज़ों तक में ये कौशल भली-भाँति साक्ष्य के रूप में प्राप्त है कि ये हस्तकला बहुत प्राचीन है। आजकल कम्प्यूटर के दौर में इस हुनर को तवज्जोह मिलनी अमूमन बंद-सी हो चुकी है।
पारंपारिक तरीके से कैलीग्राफी (क़ातिब कला) को खूबसूरती से ढालने वाले हुनरमंद कैलीग्राफ़र हैं दिल्ली के इकलौते 'कातब़', मतलब कैलीग्राफिक आर्टिस्ट- मोहम्मद ग़ालिब। इन्हें 'क़ातिब ग़ालिब' नाम से भी यहाँ लोग पहचानते हैं। इक दफ़ा उनसे मिलने गयी तो दुकान बंद मिली, फोन करने पर पता चला कि अकस्मात उनके घर कोई बीमार हुआ तो वो असमर्थ थे आने में। ओखला दूर भी था वहाँ से।


पुनः करते-करते अभी पिछले गुरुवार दम साध लिया कि मिलना ही है, काहे से कि शुक्रवार फिर वो व्यस्त रहते, तो बस सवारी चल दी दिल्ली- 6, उर्दू बाज़ार। नियत समय उन्हीं की दुकान पर मुख़ातिब हुए उनसे और लगभग दो घंटे समय बिताया बातें करते क़ातिब़ मोहम्मद ग़ालिब साहब के साथ।
उनका भिन्न-भिन्न काम देखा। बहुत-से उर्द़ू और अरेबिक में लिखे शेऱ, शायरी सुने और उनकी इस कला के उद्गम्, दिलचस्पी व तालीम से लेकर रोज़ी-रोटी व मजबूरियों, हालातों, ज़ाती ज़िन्दगी पर मालुमात हासिल की। इस कला में इस्तेमाल होने वाली पारंपरिक क़लम, औज़ार, निब, पेन व सियाही, रंगों की भी जानकारी ली। साथ ही उनसे इस कैलीग्राफी कला के भविष्य आदि को लेकर चर्चा भी की।


मेरी उत्सुकता चंद सव़ालों में कैद थी, जिन्हें पूछकर आज़ाद कर आई हूँ। उनकी दुकान का मुआयना करने पर सवालों की फ़ेहरिस्त ने जगह बदल ली। दुकान तो नहीं, पर उर्द़ू बाज़ार की एक पुरानी किताबों की दुकान में अपने थैलै, सामान, एक स्टूल और दो इंसानों के बैठने जितनी जगह मयस्सर है उन्हें।
मैंने पूछा उनसे कि आप कितने सालों से इस कला को पहचान दे रहे हैं?
उन्होंने कहा कि ठीक से बरस तो उन्हें भी याद नहीं पर। गाँव में पढ़ाई पूरी कर के रोज़गार की ज़रूरत राजधानी तक खींच लाई थी। उम्र का 38 साल के लगभग हिस्सा इस शहर के नाम हो गया।


आप कहाँ से हैं और पढ़ाई-लिखाई कहाँ से, कितनी की?
मैं उत्तरप्रदेश के सहारनपुर से आगे अलीपुर से हूँ। इस्लामी मदरसे 'दारुल उलूम देवबंद, सहारनपुर' से पढ़ना-लिखना किया, जितना भी रहा। क़ातब कला भी वहीं पर सीखी। पूरी पढ़ाई पारिवारिक हालातों के चलते नहीं हुई।


मैंनै फिर कहा कि कैलीग्राफी शौक था या जूनून ठहरा आपका?
इस प्राचीन कला में महारथ हासिल करने के लिये मोहम्मद ग़ालिब का ये मानना है कि 'हम क़ातिब इस कला को रोज़ी-रोटी के लिये सीखते हैं।
मैंने ये इसलिये किया क्यूँकि ये इल्म से जुड़ा एक सम्माननीय काम है और यह मुझे शिक्षित लोगों के साथ जोड़े रखता है और साहित्य को पढ़ने-समझने वाले लोगों के साथ मेरे संबंधों को प्रगाढ़ करता है। जु़नून में तो बाद में तब्दील हुआ।'


क्या ये काम आपको आवश्यकता लायक रोज़ी दिलाता है? आप संतुष्ट हैं?
वो बताते हैं कि कम्प्यूटर के आने से पहले ये एक मूल्यवान जॉब (काम) था। कार्यालयों से लेकर अख़बारों तक से हम पर काम आया करता था और हम क़ातिब हर संभव तरह इसे करके दिया करते थे। उस समय यह कला लोगों की ज़रूरत थी। हाँलाकि वक्त काफ़ी लगता था इसे लिखने में। किताबें उर्दू में लिखी जाति थीं व अख़बारों को भी क़ातिबों की ज़रूरत थी। हम मूल्यवान थे। सुलेख एक ऐसी कला है जिसमें बहुत कम लोग महारत हासिल कर सकते हैं। इलेक्ट्रॉनिक गेजेट्स की क्राँति में यह कला अब दम तोड़ रही है।


मेरा अगला सव़ाल था कि क्या आप इसे किन्हीं ख़ास तरीकों व औज़ारों आदि से लिखते हैं?
ग़ालिब बताते हैं कि हमारे बैठने का भी एक खास तरीक़ा होता है, जब हम कैलीग्राफ़ी स्टाइल में लिख रहे हों, तब। अख़बारों के लिये लिखते समय ख़ास ध्यान रखना पड़ता है। हमें सिखाया गया था कि हम तभी सीख पायेंगे, जब हम एक 'Particular' तरीक़े से बैठेंगे। और इतना ही नहीं, हम क़ातिबों को और भी skills में परफ़ेक्ट होना पड़ा।
यही नहीं हमें लिखते समय अपनी साँस रोकनी पड़ती है ताकि हमारे हाथ न हिलें। मैं अभी अट्ठावन (58) का हूँ और ये मेरे लिये अब ये बिलकुल आसान नहीं है। समय बदल गया है। नई पीढ़ी कैलीग्राफ़ी को व्यवसायिक रूप से नहीं अपनाना चाहती। बाक़ी के अन्य प्राचीन व्यवसायों की तरह ये कला भी टैक्नोलॉजी की वजह से विलुप्त हो रही है।


आपके परिवार में कौन-कौन हैं?
जी, मैं, मेरी बेग़म, एक बेटी और एक बेटा। ज़रूरत लायक पढ़ा लिखा कर बेटी की शादी कर चुका हूँ।

 

आपका बेटा जानता है ये कला, उसने भी सीखा आपसे ये हुनर?
कैसी बात करती हैं! आजकल की पीढ़ी कहाँ सीखना चाहती है इस हुनर को! वो अभी फिलहाल कुछ नहीं कर रहा, कुछ वक्त पहले ही नौकरी छोड़ बैठा है। छिटपुट रिपेयरिंग वगैरह के काम से अपने गुज़ारे लायक कमाता है वैसे।


आपके थैले से निकले इन औज़ारों में जीरो प्वॉइंट ब्रश से लेकर तीन नंबर तक हैं और ये पुराने निबदार लकड़ी की क़लमें और क्या आप सभी का इस्तेमाल करते हैं? आप इन्हें कहाँ से लाते हैं?
जी। इस पारंपारिक कला के लिये कुछ ख़ास तरह की क़लम इस्तेमाल की जाती है, जिसे हम लोग ख़ुद ही बनाते हैं। इसे हम सरकंड़े (सिलसटे) की लकड़ी का आगे का भाग ब्लेड से छीलकर अलग-अलग अक्षरों के हिसाब से तैयार करते हैं। आजकल तरह-तरह के ब्रशों ने थोड़ी आसानी कर दी है। चार्ट पेपर शीट्स और हैंडमेड पेपर्स, कैमलिन के साधारण व मैटेलिक रंगों ने विविधता के संग आसानी ला दी है। पहले समय में गिने चुने प्राकृतिक रंगों वाली स्याही तैयार कर लिखा जाता था।


कितना काम आ जाता होगा अमूमन आजकल?
हा हा, जी कई-कई दिन यूँ ही खाली निकल जाते हैं। कभी जामिया से या यूनिवर्सिटी से कुछ शोध छात्र/छात्राएं आ जाते हैं भूले-भटके या फिर इस कला के शौक में नाम या विज्ञापन लिखवाने वाले कभी-कभार। और आप जैसे चंद लोग इक्का-दुक्का, जो जानने की उत्सुकता लिये आते हैं। बस अब तो हाथ भी काँपने लगे हैं और नज़र भी कमज़ोर होकर बैठती ही नहीं।


भविष्य क्या है इस कला का और इससे मिलते रोज़गार का?
नई पीढ़ी इस पारंपारिक कला को अपनाना नहीं चाहती क्योंकि रोज़गार के लिये ये अब पर्याप्त नहीं रह गयी है। हाथ का काम अब ख़त्म हो गया है, रोज़गार नहीं है कोई। ऐसे में अपनी इस कला को दम तोड़ते देखना नियति बन गई है।


ऊपर हुईं तमाम बातों में परत-दर-परत मन बुझने-सा लगा था कि कैसे इस हुनर को बचाकर संजो सकूँ?
मन है सीखने का वैसे ही जैसे बाकी की कलाएँ सीखीं हैं, लुप्त होती हाथ की कारीगरियाँ! मगर मेरी उस जगह से दूरियाँ और बाकी जिम्मेदारियाँ प्रतिदिन जाने की अड़चनें बनती हैं। ख़ैर, चाह है तो कभी राह भी मिलेगी ही।


उस दुकान पर उन्होंने काफ़ी किताब़ें दिखाईं, जिनमें हिन्दी शायरी के साथ उर्द़ू व अरेबिक एवम् रोमन में भी एक ही पुस्तक में समागम रहा भाषाओं का। उर्द़ू ट्रॉसलेशन के बाबत भी जानकारी एकत्र की हमने और अंत में उनसे अपना, बेटी और राघव जी का नाम भी कैलीग्राफी से लिखवाया, याद के तौर पर लेकिन उन्होंने कहा कि उर्द़ू में प्रीति बहुत छोटा-सा लिखा जायेगा, जो कि लिखकर दिखाया भी मोहम्मद साहब ने, तो मैं अरेबिक में कैलीग्राफी से आपके नाम लिखूँगा। बहुत प्यारी याद समेट लाई उसे, फ्रेम करा कर बैठकी में रखा है।


- प्रीति राघव प्रीत