प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2019
अंक -49

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

लघुकथाएँ

किंकर्तव्यविमूढ़

दिल्ली के एक ज्वैलर्स की शॉप में सीसीटीवी कैमरे पर लाखों की चोरी करते हुए चोरों को टीवी पर चल रही न्यूज में देखकर पूनम ठिठक गयी। चेहरे का रंग सफेद पड़ गया, हाथ पैर कांपने लगे उसके।
"अरे क्या हो गया तुम्हें! तुम ऐसे काँपने क्यों लगीं?" पूनम की हालत देखकर राकेश ने घबराकर पूछा।
"क्या आपने अभी टीवी नहीं देखा राकेश? न्यूज़ में ज्वैलर्स की शॉप में चोरी करनेवाले लड़कों में अपना नीरज भी है।"

राकेश ने भी टीवी की ओर देखा। न्यूज़ अभी चल रही थी।
"अरे! हाँ, ये तो तुम्हारा भाई नीरज ही है। पर ये कैसे ..? राकेश की आँखें भी आश्चर्य से फैल गयीं।

"राकेश ये ठीक नहीं हुआ। हमें तुरंत पुलिस को बता देना चाहिए कि चोरी नीरज ने की है।"
"अरे! ऐसे कैसे! मुझे तो यकीन नहीं हो रहा। वो भाई है तुम्हारा। देखा नहीं कितनी मदद करता है वो हमारी। चिंटू की एडमिशन फीस का पैसा उसी ने तो दिया था। और रक्षाबंधन पर कितना कीमती नैकलेस गिफ्ट किया था तुम्हें। और हाँ! वो भूल गयीं तुम! जब मैं हॉस्पिटल में एडमिट था तब तो अपना ब्लड देकर जान बचाई थी उसने मेरी।"

"हाँ राकेश मुझे सब याद है। पर मैंने तब भी उससे पूछा था कि इतना पैसा कहाँ से लाया। उसने कहा था 'दीदी बिजनेस अच्छा चल रहा है'। मैं मानती हूँ कि उसने हमारी बहुत मदद की है, लेकिन चोरी तो चोरी ही है! और
चोरी करना अपराध है। आज उसने चोरी की है, कल को रंगे-हाथों पकड़ा गया तो मर्डर भी कर देगा, तब क्या होगा राकेश! अभी तो कुछ साल की जेल होगी, लेकिन तब तो सीधी फाँसी या उम्रकैद ही है।"
"हाँ, ये बात तो है! देखो अभी तो मैं ऑफिस जाकर आता हूँ, तुम किसी से कुछ मत कहना। फिर देखते हैं क्या करना है।"

राकेश के जाने के बाद पूनम काफी देर तक किंकर्तव्यविमूढ़ होकर भिन्न-भिन्न चैनल्स पर बार-बार उस न्यूज को देखती रही। अंत में अपने अंतरद्वंद पर विजय पाते हुए दायित्व-बोध से बंधी वह तेजी से स्कूटी उठाकर घर से बाहर निकल गयी।






निवाला

"ले कमला! तू भी पहले खाना खा ले, काम बाद में निपटा लेना।" मिसिज़ चड्ढा ने सुबह से काम में लगी कमला को खाने की प्लेट थमाते हुए कहा तो कमला को घर पर बैठे अपने भूखे बच्चों की याद सताने लगी।
"अरे!! खाना? मेम साब! आज घर जाने में बहुत देर हो गयी है, वहाँ घर पर मेरे बच्चे भूखे बैठे होंगे तो मेरे मुँह में यहाँ निवाला कैसे उतरेगा मेमसाब!!" बोलते हुए कमला उदास हो गयी।
"बहुत दिनों से उनको कुछ अच्छा खाने को नहीं मिला, सोच रही हूँ आज ये खाना उन्हीं के लिये..." सकुचाते हुए कमला ने कहा।
"ठीक हैs उनके लिये भी ले जाना, इसे तू ही खा ले।"

फिर चलते वक्त मिसिज़ चड्ढा ने बच्चों के लिये भी बहुत सारा खाना कमला को दे दिया।

कमला घर जाकर बड़े प्यार से अपने बच्चों को खाना खिलाने लगी और बच्चे भी चटकारे लेकर पार्टी का-सा आनन्द लेने लगे। वहीं दरवाजे पर पड़ी हुई हड्डियों का ढांचा बनी कुतिया; जो अक्सर सुस्ताने के लिये उन्हीं के दरवाजे पर लेटी रहती थी, खाने की खुशबू से उठ बैठी और बच्चों के हाथों से मुँह तक जाते एक-एक निवाले को गिनने लगी। उसकी आँखों में कमला को याचना-सी नजर आ रही थी, जिसे देखकर कमला ने दो पूड़ियाँ उसकी ओर भी उछाल दीं- 'ले तू भी खा ले, क्या याद करेगी, आज मेमसाब के बेटे का जन्मदिन था'।

कुतिया कुछ देर उन पूड़ियों को उलट-पलट कर सूंघती रही फिर मुँह में दबाकर वहाँ से निकल गयी। "कितने प्यार सेे अपने बच्चों के मुँह से निवाला निकाल कर दिया था इसे, पर जाने कहाँ लेकर चल दी है चुड़ैल, यहीं बैठकर न खा लेती! देखूं तो कहाँ जाती है लेकर!! कमला बड़बडा़ती हुई दरवाजे के बाहर झाँकने लगी"।

देखा गली के छोर पर तीन-चार छोटे पिल्ले पैरों में मुँह छिपाये धूप में लेटे हुए थे। कुतिया ने उनके सामने जाकर अपना मुँह खोल दिया। पिल्ले पूड़ियों पर झपट पड़े। ये देखकर कमला की आँखें नम हो गयीं। "अरी! मैं ये कैसे भूल गयी कि तू भी तो मेरी तरह एक माँ ही है। और माँ अपने बच्चों के मुँह में निवाला डालने से पहले ख़ुद कैसे खा सकती है!






मानदण्ड

सुबह नौ बजे का समय था। छात्र-छात्राएँ एक-एक कर कॉलेज पहुँच रहे थे। कॉलेज के चीफ प्रॉक्टर डॉ. सुभाष वर्मा राउँड पर थे। बेल बजने में अभी समय था। प्रांगण में लगे नीम के वृक्ष के चारों ओर बने चबूतरे पर कुछ छात्र बैठे हुए गप्पे लगा रहे थे कि सामने से कुछ शिक्षकों को आता देखकर वे सभी मुँह फेर कर खड़े हो गये, मानो उन्होंने शिक्षकों को देखा ही न हो। प्रॉक्टर साहब वहीं खड़े हुए ये सब देख रहे थे।

तभी उन छात्रों ने सामने से त्यागी सर को आते देखा और वो मुडेर से उतर कर सर की तरफ बढ़ने लगे। नजदीक पहुंचने पर उन्होंने त्यागी सर को प्रणाम किया और उनके चरण स्पर्श कर एक तरफ हो गये।

प्रॉक्टर साहब छात्रों का ये व्यवहार देखकर आश्चर्य में पड़ गये। छात्रों से पूछा, "मैंने देखा आपने गुप्ता सर, डॉ. विकास सर और उनके साथ वाले टीचर्स को देखकर मुँह फेर लिया किन्तु डॉ. त्यागी सर के पैर छुए और प्रणाम किया, ऐसा क्यों किया तुम सबने! सभी शिक्षक एक समान सम्मान के हकदार होते हैं"।
"नहीं सर! सब नहीं, क्या आप नहीं जानते सर वो सारे टीचर्स कभी समय पर हमारी क्लास नहीं लेते और न ही कभी कोर्स पूरा करते हैं। साथ ही प्रैक्टिकल परीक्षा में फेल करने का भय दिखाकर हम से रुपये भी माँगते हैं। सर फिर कैसे हम उन्हें इज़्ज़त दें!" एक छात्र ने आक्रोशित होकर कहा।
"और ये त्यागी सर! कड़कती सर्दी हो या भारी बारिश, इन्होंने आज तक कभी हमारा पहला पीरियड मिस नहीं किया सर। किसी भी प्रलोभन के बिना बहुत अच्छा पढ़ाते हैं ये हमें। हमारी प्रॉब्लम सॉल्व करने के लिए हर वक्त तैयार रहते हैं।"
"सर इसलिए सबसे अच्छे मार्क्स भी इन्हीं के सब्जैक्ट में आते हैं हमारे।" इस बार दूसरे छात्र ने त्यागी सर की तारीफों के पुल बांध दिये।
बाक़ी के सारे छात्रों ने भी सहमति में सिर हिला दिया।

चीफ प्रॉक्टर साहब के पास अब कोई जवाब नहीं था। "शायद तुम लोग ठीक कहते हो, इज़्ज़त ख़रीदी नहीं जा सकती। उसके लिए अपने आदर्श, आचरण या व्यवहार को निर्धारित कर निश्चित मानदण्ड स्थापित करने पड़ते हैं, तभी वह पायी जा सकती है।"


- सुनीता त्यागी
 
रचनाकार परिचय
सुनीता त्यागी

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