प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2019
अंक -53

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

रात के स्याह अँधेरे में

रात के स्याह अँधेरे में
एक नारी देह
धराशायी हुई
बहु-मंज़िला ईमारत से
और लग गया जमघट
शुरू हो गया
क़यासों का सिलसिला
यह आत्महत्या है
या जघन्य हत्या
बिना कुछ जाने
क़यास लगाये जाते हैं

एक निरीह अबला आत्महत्या करे
तब भी दोष उसी के सर मढ़ा जाता है
“ऐसा आत्मघाती क़दम उठाने से पहले
अबोध बच्चों का तो कुछ सोचती”
जिसके कारण यह हालात बने
उस पर कोई ऊंगली क्यों नहीं उठाता!
अंततः जब तहकीकात बताती है
“दोषी पुरुष था”
सभ्य समाज
विरोध के स्वर क्यों नहीं गूँजाता?"

क्या कभी किसी ने
ऐसा भी सोचा है?
आहत तन
आहत मन
अहम और द्वंद
न आत्महत्या
न हत्या है
समस्याओं का अन्त
वैवाहिक रिश्तों में
दरार और तकरार
लाता हैं मासूम संतान पर
तबाही का अम्बार
कोई जान से गया
और कोई सलाखों के पीछे गया
बच्चों को अनाथ कर के
दुश्वारियों की विरासत दे गया


********************


याद करते हैं

अब भी याद करते हैं
मुझे मेरे शहर के लोग
ठीक वैसे ही जैसे
मेरी यादों में बसे हैँ

नज़र से ओझल होने से
कोई दिल से दूर नहीं होता


- रजनी छाबड़ा
 
रचनाकार परिचय
रजनी छाबड़ा

पत्रिका में आपका योगदान . . .
कविता-कानन (1)मूल्यांकन (1)