प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2019
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

गीत-गंगा

कह रहे हैं दो नयन

पीर पर्वत-सी विरह की सह रहे हैं दो नयन।
लौट आओ लौट आओ कह रहे हैं दो नयन।।

दर्द का संवेग दिल में वेग पाकर जग रहा है,
धैर्य का अविचल किला भी आज हो डगमग रहा है।
इस प्रतीक्षारत हृदय को यह समझ आता नहीं है,
एक दिन में एक युग जैसा समय क्यों लग रहा है।

डूबकर पावन प्रणय में
एक अनजानी प्रलय में
दर्द की मीनार बनकर ढह रहे हैं दो नयन।
लौट आओ लौट आओ कह रहे हैं दो नयन।।

धड़कनों की तीव्रता में एक असहज वेदना है,
वेदना से मुक्ति पाने छटपटाती चेतना है।
वेदना से चेतना को मुक्ति आखिर कब मिलेगी,
मुक्ति पाकर हर्ष में इन आँसुओं को खेलना है।

अश्रु का अवतार लेकर
मौत को भी हार देकर
एक आभासी नदी में बह रहे हैं दो नयन।
लौट आओ लौट आओ कह रहे हैं दो नयन।।

ये प्रतीक्षा का हिमालय कम नहीं हो पा रहा है,
बिन बुलाये याद का सागर उमड़कर आ रहा है।
बन गया है प्रेम का मंदिर मेरा अंतःकरण ही,
मौन स्वर में प्रेम की चौपाइयाँ नित गा रहा है।

थाल पूजा का सजाकर
दीप चाहत का जलाकर
नाम ले लेकर तुम्हारा रह रहे हैं दो नयन।
लौट आओ लौट आओ कह रहे हैं दो नयन।।


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प्राण के अवशेष तो इस देह में हैं शेष लेकिन

मैं तुम्हें आवाज देता हूँ सुनो तुम सुन सको तो,
मौन जिह्वा हो गयी है कंठ में वाणी नहीं है।
प्राण के अवशेष तो इस देह में हैं शेष लेकिन,
अश्रु के सूखे कणों में शेष अब पानी नहीं है।।

कुछ कहा जाता नहीं है आ गयी ऐसी घड़ी है,
एक इमारत आँधियों की चोट खाकर गिर पड़ी है।
हम धराशायी धरा पर पाँव फैलाये पड़े हैं,
गर्जना कर लीलने को मौत सिरहाने खड़ी है।

जान ली ऊँचे गगन ने
जान ली बहते पवन ने
किंतु तुमने ही न क्यों हालत मेरी जानी नहीं है।
प्राण के अवशेष तो इस देह में हैं शेष लेकिन,
अश्रु के सूखे कणों में शेष अब पानी नहीं है।।

घनघनाकर मंदिरों की घण्टियाँ चुप हो गयी हैं,
चर्च की दीवार गहरे में उतरकर खो गयी हैं।
वेदना में डूब गुरुद्वारा प्रकम्पित हो गया है,
छटपटाकर मस्जिदों की गुम्बदें भी रो गयी हैं।

दर्द की सुनकर कहानी
हो गए सब पानी-पानी
एक तुम ही हो कि जिसने पीर पहचानी नहीं है।
प्राण के अवशेष तो इस देह में हैं शेष लेकिन,
अश्रु के सूखे कणों में शेष अब पानी नहीं है।।

छोड़कर अपनी जमीं नभ से सितारे आ गये हैं,
तोड़कर तटबंध नदियों के किनारे आ गये हैं।
जिंदगी और मौत में फिर से महासंग्राम जारी,
कौन जीते देखने को देव सारे आ गये हैं।

प्यार की खुश्बू है जब तक
मौत से है युद्ध तब तक
जिंदगी पर मौत की ये जीत आसानी नहीं है।
प्राण के अवशेष तो इस देह में हैं शेष लेकिन,
अश्रु के सूखे कणों में शेष अब पानी नहीं है।।


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प्रेम मुहब्बत की ये दुनिया तेरे लिए नहीं है बेटे!

प्रेम मुहब्बत की ये दुनिया तेरे लिए नहीं है बेटे!
अच्छा होगा इस दुनियाँ के अपने सारे ख्वाब मिटा दे।
मन को विचलित करने वाली सब यादों में आग लगा दे।।

माना यह आसान नहीं है
फिर भी कोशिश करनी होगी।
ठहरे जीवन को गति देने
गम की शाख कतरनी होगी।।

मत कुरेद पीड़ा ही होगी
दिल के सारे ज़ख्म दबा दे।
प्रेम मुहब्बत की ये दुनिया तेरे लिए नहीं है बेटे!
अच्छा होगा इस दुनिया के अपने सारे ख्वाब मिटा दे।
मन को विचलित करने वाली सब यादों में आग लगा दे।।

अच्छा तू ही बता कि ऐसे
अश्क बहाने से क्या होगा!
इस मासूम सुकोमल दिल का
दर्द बढ़ाने से क्या होगा।।

बस इतनी ही सजा बहुत है
खुद को और न अधिक सजा दे।
प्रेम मुहब्बत की ये दुनिया तेरे लिए नहीं है बेटे!
अच्छा होगा इस दुनिया के अपने सारे ख्वाब मिटा दे।
मन को विचलित करने वाली सब यादों में आग लगा दे।।

यह तो नहीं जरूरी पगले
हर चाहत पूरी हो जाये।
जग में अब तक हुआ न कोई,
जिसका मन चाहे वो पाये।।

टूटे-फूटे बिखरे दिल को
कोई रस्ता नया दिखा दे।
प्रेम मुहब्बत की ये दुनिया तेरे लिए नहीं है बेटे!
अच्छा होगा इस दुनिया के अपने सारे ख्वाब मिटा दे।
मन को विचलित करने वाली सब यादों में आग लगा दे।।


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प्रेम मुहब्बत की दुनिया में

कभी हँसी खिलती चेहरे पर
कभी उदासी छा जाती है,
ऐसा ही होता है बेटे!
प्रेम मुहब्बत की दुनिया में।

कोई तन की सुंदरता लेकर इस दुनिया में आता है।
कोई मन की सुंदरता लेकर इस दुनिया में जाता है।।
तन की सुंदरता के आगे
मन की सुंदरता मर जाती,
ऐसा ही होता है बेटे!
प्रेम मुहब्बत की दुनिया में।

बार-बार मरते हैं फिर भी बार-बार जीना पड़ता है।
नहीं चाहते हुए हलाहल बार-बार पीना पड़ता है।।
गम की जहरीली गैसों से
साँसें हो जाती हैं दूभर
ऐसा ही होता है बेटे!
प्रेम मुहब्बत की दुनिया में।

भावुक मन के स्वप्न सुकोमल निर्दयता से मर जाते हैं।
पावन बेशकीमती आँसू मोती बनकर झर जाते हैं।।
लाख गलतियाँ करता कोई
फिर भी दिल दे देता माँफी,
ऐसा ही होता है बेटे!
प्रेम मुहब्बत की दुनिया में।


- अवशेष मानवतावादी
 
रचनाकार परिचय
अवशेष मानवतावादी

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