प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अक्टूबर 2015
अंक -47

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कहानी- क्रश-व्रश
निशा और ऋतु के घर की बालकनी एकदम सटकर थी, वे दोनों वहीं से एक-दूसरे को आवाजें लगातीं और घंटों बातें किया करती थीं। वे अक़्सर अपने 'होमवर्क' की चर्चा भी वहीं खड़ी होकर किया करती थीं मगर उस दिन माज़रा कुछ अलग ही था। माँ ने ऋतु को  बालकनी से आवाज़ दी, वह उछलती-कूदती वहाँ पहुँची, देखा तो निशा अपनी बड़ी बहन के साथ अपनी बालकनी में उपस्थित थी। पहुँचते ही माँ ने ऋतु के बाएं गाल पर एक झन्नाटेदार तमाचा रसीद कर दिया, ऋतु गाल पकड़कर सुबकते हुए कुछ देर तक वहां खड़ी रही फिर कुछ न समझ पाने की स्थिति में ही घर के भीतर चली आई। उन तीनों के हाव-भाव बता रहे थे कि ऋतु से शायद कुछ  भयंकर गलती हो चुकी थी और परिणामस्वरूप यह थप्पड़ उसे रसीद किया गया था, आख़िर ऋतु ने किया क्या था? वह इसी सोच में गुम थी।
 
माँ से कुछ पूछने की हिम्मत तो इस उम्र में भी ऋतु में नहीं है, तो तब क्या होती जब वह महज़ दस-ग्यारह बरस की मासूम बच्ची थी। उसने कातर नज़रों से निशा की तरफ  देखा, दोनों की आँखें मिली और ऋतु को कम-से-कम इतना तो समझ आ गया था कि आज जो कुछ भी हुआ है, सब इस निशा की ही रची किसी साज़िश का नतीजा था।
 
ऋतु और  निशा अपने छोटे से कस्बे आबुरोड में चलने वाले लड़कियों के स्कूल की कक्षा छठी में साथ-साथ पढ़ती थीं। उन दिनों उस कस्बे में गिन-चुने स्कूल हुआ करते थे। एक ही सेकेंडरी स्कूल था, जिसमें लड़के व लड़कियाँ साथ-साथ पढ़ते थे, सो कोई और चारा न  देख उन दोनों के माता-पिता ने दोनों का दाखिला उसी स्कूल में करवा दिया था। उन दोनों के पिता रेलवे में अधिकारी थे और इसी के परिणामस्वरूप उनके परिवार तीन मंज़िला सरकारी आवास में से बीच के दो जुड़वाँ मकानों में रहते थे, जिनकी बालकनी आपस में सटी हुई थी। उनकी दोस्ती की एक वजह यह भी थी कि वे जब चाहे बालकनी में से एक दूसरे से बतिया लिया करती थीं।
 
निशा बहुत सुन्दर थी, पढ़ाई में उसकी कुछ खास रुचि तो न थी मगर उसके रंग-रूप से ऋतु ख़ासी प्रभावित रहा करती थी। सर्दियों के रविवारों की हर सुबह वे छत पर दो बाल्टियाँ गरम पानी लिए जा पहुँचती थीं और झाँवे से अपने हाथ-पैर घिसा करती थीं, निशा की तरह गोरे रंग की लालसा में ऋतु ने कई बार अपने हाथ-पैर तक छील डाले थे, नतीजतन कई-कई दिनों तक वह वेसलीन चुपड़-चुपड़ कर अपने ज़ख्मों को सहलाया करती थी, किन्तु निशा जैसा रंग-रूप तो शायद आज तक भी उसका नहीं हो पाया था।
 
निशा की माँ बचपन ही में गुज़र गई थी इसीलिए उन चारों भाई-बहनों की देखभाल के लिए उनकी मासी एक धाय की तरह सारी ज़िन्दगी उन्हीं के साथ रहीं, उनकी अपनी भी कोई औलाद न थी, उस पर विधवा स्त्री, सो उन्हें भी इन अनाथ बच्चों में जीने का एक बहाना-सा मिल गया था। एक अबोला-सा पवित्र रिश्ता निशा के पिता और मासी के बीच ताउम्र बना रहा था। निशा की मासी सभी बच्चों को हमेशा प्रेम से लिपटाए रहती थी।
 
ऋतु की माँ एक सुघड़ गृहणी थी, मोहल्ले की अन्य महिलाएँ खाली वक़्त में उनसे ऊनी सिलाई, बुनाई व क्रोशिया आदि सीखने आया करती थीं। उन्हें हमेशा एक लीक से बंधी ज़िन्दगी पसंद थी और उनकी सखियाँ उनकी इसी आदत की कायल भी थीं। बचपन में ऋतु को उनकी इस आदत से बहुत कोफ़्त हुआ करती थी, हालाँकि जीवन के इस मोड़ पर आकर वह स्वयं भी आज माँ के उन्हीं गुणों को आजमाती है।
 
बहरहाल उस शाम निशा ऋतु को खेलने के लिए भी बुलाने नहीं आई। ऋतु अगली सुबह होने का इंतज़ार करने लगी, जब वे दोनों साथ-साथ स्कूल जाती थीं। रेल्वे ट्रैक के साथ-साथ चलते हुए वे दोनों पैदल ही स्कूल आया-जाया करती थीं, स्कूल आते-जाते वक़्त उनकी बातों का काफी सारा हिस्सा यहीं से शुरू होकर वापिसी में फिर यहीं पर ख़त्म हुआ करता था किन्तु उस दिन निशा और ऋतु दोनों आगे-पीछे चल रहीं थीं जैसा कि वे अक़्सर एक-दूसरे से नाराज़ होने की स्थिति में किया करती थीं। ऋतु ज़रा तेज़ कदमों से चलकर निशा के साथ हो ली, रुआंसी होकर उसने निशा से पूछा, "तुमने कल माँ से मेरी क्या शिकायत लगाई थी?"
 
जवाब में वह तनिक गुस्से में बोली "तुम कक्षा में उस भूपेंद्र से बात क्यों करती हो?"
 
ऋतु का बाल मन उस वक़्त तो यह कतई भी न समझ पाया था कि बिना कारण पड़े उस थप्पड़ और भूपेंद्र से बात करने  में भला क्या ताल्लुक हो सकता है?  हाँ, मगर उस दिन निशा ने उससे यह वचन लिया था कि ऋतु फिर कभी भूपेंद्र से बात नहीं करेगी। ऋतु वचन की पक्की निकली, आख़िर वह निशा की दोस्ती खोना जो नहीं चाहती थी।
 
भूपेंद्र भी उन्हीं की कक्षा में पढ़ता था, वह लड़कियों की ठीक पीछे वाली पंक्ति में बैठा करता था। स्वभाव से वाचाल-सा लड़का जो ऋतु से कुछ अधिक और निशा से कुछ कम बात किया करता था। उस थप्पड़ ने ऋतु को गंभीर बना दिया था। अब वह भूपेंद्र की बातों को अनसुना कर दिया करती थी और सिर झुकाए अपनी पढ़ाई में लगी रहती थी या फिर चुपचाप उन दोनों की बातें सुना करती थी।
 
एक दिन भूपेंद्र ने निशा से पूछा "ए सुन-सुन, बता तो, हमारे कस्बे में कौनसा सिनेमा आया है?"
निशा उसकी तरफ देखने लगी थी, उसकी अनभिज्ञता देखते हुए ऋतु ने कॉपी के अंतिम पन्ने पर सिनेमा का नाम लिखा और कॉपी धीरे से निशा की तरफ सरका दी थी।
अब पीछे मुड़कर निशा चहकते हुए बता रही थी "सुन....... भूपेंद,  हमारे कस्बे में  सिनेमा आया है- मैं तुलसी तेरे आँगन की" 
 
भूपेंद्र ने फिर हंसकर कहा था "अच्छा जी ...तू तुलसी मेरे आँगन की? और फिर वह अपने साथियों के साथ तालियाँ पीटकर जोर-जोर से हँसने लगा था। निशा भी शरमाकर हँसने लगी थी। सिनेमा के नाम के माध्यम से जैसे उसके मन का कोई सन्देश शब्दों में पिरोकर भूपेंद्र तक पहुँच गया था। इस निरी बेतुकी बातचीत को सुनकर निशा का गुलाबी हो जाना, ऋतु को उस उम्र में समझ नहीं आया था। निशा भी तो उस वक़्त अपने शर्माने का राज़ शायद ही समझी थी। लड़कियाँ उस गुलाबी उम्र की चटखन में वह सब कहाँ जान पाती हैं? वह अनजाना अहसास जो उनके मन और तन पर से गुजरता हुआ उन्हें जवान बना जाता है, उनके सपनों को परिपक्व कर जाता है।  हाँ, किन्तु मौसम की धूप दिखाने के लिए उन अहसासों को फिर-फिर से धो-पोंछकर रखती जाती हैं....वही सब अहसास जो वे सबसे छुप-छुपाकर अपने घर के आँगन में या कहीं घर के पिछवाड़े में संजोकर रखती हैं ....कुछ कच्च्पक्का-सा मन..कुछ अधकच्चे-से सपने...कुछ इठलाने के राज़...कुछ शर्म-हया की बात....बहुत कुछ जो उनका निजी होता है, कभी-कभी ऐसा ही बेतुका होता है।
 
भूपेन्द्र हर शाम रेलवे कॉलोनी से होकर गुजरता था, बाज़ार आना-जाना हो तो एक यही रास्ता था, जिस पर से सभी को होकर आना-जाना पड़ता था। फिर क्या था...हर शाम वे दोनों छत पर खड़ी होकर "हरी कमीज़" का इंतज़ार किया करती थीं। यह नाम भी उसे  निशा ने ही  दिया था, कहती थी....."देख हरी कमीज़ में कितना सुन्दर लगता है।" वाकई में वह किसी राजकुमार-सा लगता था मगर निशा को दिए वचन के बाद ऋतु ने हरी कमीज़ से बात करना बंद कर ही दिया था, उस पर कोई 'कॉम्पलिमेंट' या 'कमेंट' न करना भी उसके और निशा के बीच मौन समझौते में शामिल था।
 
हर शाम वे दोनों साइकिल चलाने भूपेंद्र की गली में जाया करती थीं, उस वक़्त साइकिल चलाना ऋतु का शगल हुआ करता था। निशा तो पीछे की सीट पर बैठकर भूपेंद्र की आवाजाही पर नज़रें गड़ाए रहती थी। अगर वह अपने घर के बाहर खेलता दिख जाता तो वह चहक उठती थी "देख-देख वह खेल रहा है" और किसी शाम, अगर वह दिखाई न दे तो रात देर तक ऋतु की शामत आई रहती थी, वह बार-बार बालकनी से आवाजें दे-देकर उसे परेशान किया करती थी आखिरकार ऋतु उससे अगली शाम का इंतज़ार करने का दिलासा देकर पीछा छुड़वा लिया करती थी।
 
कुछ बरस बाद निशा के पिता का तबादला अजमेर हो गया था और फिर तो दोनों ही सखियाँ बिछुड़ गई थीं। उन दिनों नौवीं कक्षा में ही संकाय निर्धारित करने के लिए विषय चुने जाते थे, सो ऋतु और भूपेंद्र अलग-अलग कक्षाओं में चले गए।
 
ऋतु कॉलेज के प्रथम बरस में थी, जब सुना कि निशा की शादी उसी के पसंद के किसी लड़के से हो गई थी। कुछ दिन दोनों सखियां पत्राचार व फ़ोन पर संपर्क में रहीं, फिर  ऋतु अपनी पढ़ाई में व्यस्त होती गई और अंततः उन दोनों का संपर्क टूटते-टूटते बिलकुल ही छिटककर रह गया था।
 
आज साहित्य-जगत में ऋतु की एक पहचान बन रही है, ऐसे ही किसी दिन प्रकाशित कहानी पर उसका मोबाइल नंबर देख कर, उसके पास एक फ़ोन आया था-
 
"क्या आप ऋतु सहाय हैं?"
याद है, हम साथ-साथ पढ़ते थे?
आप और निशा दोनों सहेलियां थीं?
आप सिलाई के इम्तेहान में मेरे हिस्से के काज-बटन टांक दिया करती थीं?
 
वह कहने लगा, अरे ! आप रायटर हो गईं?
ऋतु ने उसे पहचान लिया था।
उसने कहा "यस आय एम ऋतु सहाय...अब पति के सरनेम के साथ लिखती हूँ।"
फिर तो बचपन की बहुत-सी बातें होती रहीं, बीच-बीच में निशा का जिक्र भी आता रहा और वे दोनों बचपन की बातें याद कर-करके खूब हँसते रहे।
 
दरअसल गर्मी की छुट्टियों में जब सब बच्चे खेलने में व्यस्त होते थे तो छुट्टियों से पहले ही ऋतु का दाखिला क्रमशः सिलाई, कढाई, पेंटिंग आदि कक्षाओँ में करवा दिया जाता था। ऋतु की माँ का मानना था, लड़कियों को पढ़ाई के साथ-साथ ये सब हुनर भी सीखने चाहिए। हालाँकि ऋतु का मन इन कामों में बिलकुल नहीं लगता था, उसके मन में तो हमेशा पढ़ने की लगन लगी रहती थी। किन्तु माँ की आज्ञा की अवहेलना करना उसके बस में न था, उसी के फलस्वरूप ऋतु सिलाई की कक्षा में निशा की ख़ुशी की खातिर भूपेंद्र के रुमाल पर काज-बटन कर दिया करती थी।
 
भूपेंद्र के फोन से बरसों पूर्व अपनी माँ के हाथ से खाए थप्पड़ का दर्द ऋतु के गाल पर फिर उभर आया था, साथ ही ये प्रश्न भी कि दस-ग्यारह की वय में अपने सहपाठी से बात करने की एवज में खाया वह थप्पड़ क्या वाकई उचित था? जिसका दर्द उसके जेहन में ज्यों-का-त्यों अंकित होकर रह गया था।
हाँ, मगर उस थप्पड़ के साथ दी गयी हिदायत कि "ख़बरदार जो लडकों से चूं-चपड़ की तो" से इतना अवश्य असर हुआ था कि वह अपनी पढ़ाई के प्रति और ज्यादा  गंभीर होती चली गई थी। आज इस मुकाम पर पहुंचकर ऋतु अपने पति और दो प्यारे बच्चों के साथ प्रसन्न है...वह अपने जीवन से संतुष्ट है।
 
एक दिन फिर सुबह-सुबह भूपेन्द्र का फ़ोन आया।
वह कहने लगा "तुम कोई कहानी क्यों नहीं लिख देती इस किस्से पर?"
हाँ, किन्तु उसकी एक ही शर्त थी कि उसके पात्र का नाम न बदला जाए, हालांकि प्राएवेसी के चलते उसका यह अनुरोध ऋतु को अमान्य था।
ऋतु के बच्चों ने जब इस कहानी का कच्चा खाका सुना तो हँसते हुए कहने लगे "मॉम ...यू पीपुल वर सो नॉटी एंड डोंट यू थिंक निशा आंटी हेड क्रश ऑन हिम....?"
 
वह मन ही मन सोचने लगी, अगर निशा को 'क्रश' था तो फिर बरसों तक यह कहानी उसके अपने अंत:करण में क्यों ज़िंदा रही? एक फ़ोन भर से उसके गाल पर पड़े बरसों पुराने जख्म क्यों हरे हो उठे? या शायद....वे जख्म कभी सूखे ही नहीं थे...वे शायद वहीँ थे ...हमेशा.... हमेशा।
 
ऋतु ने बच्चों से कहा, "अरे नहीं ...हमारे समय में कहाँ यह सब क्रश-व्रश होता था।"

- रजनी मोरवाल
 
रचनाकार परिचय
रजनी मोरवाल

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कथा-कुसुम (2)