प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2019
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन
मुझे सोने दो
 
मुझे सोने दो
मैं देख रहा हूँ सपने
बड़ा आदमी होने के सपने
मैं देख रहा हूँ सपने
अगला जन्म उनके लेने के
जिनके यहाँ 
मेरी माँ माँजती है बर्तन
धोती है कपड़़े
जहाँ से मिलती हैं मुझे
बची कुची मिठाइयां 
बासी पुलाव
यदा कदा उतरे हुए कपड़़े
और न जाने क्या क्या 
जिनका नाम तक 
मुझे नहीं मालूम
सोने दो मुझे
मैं देख रहा हूँ सपने
किसी ने बताया है मुझे
कि इस जन्म में
देने से दान
उस जन्म में
मिलता है फल
यों तो था ही क्या मेरे पास
और जो कुछ भी था 
मैंने अपना सब कर दिया है दान
अब मैं शेष रह गया हूँ दधीचि
देख रहा हूँ सपने
सच तो यह है कि
जगा कर भी मुझे
मेरा क्या भला करोगे तुम
कि तुम भी दिखाओगे सपने
कहोगे दुनिया के मुफलिसो!
एक हो जाओ
खोने के लिए 
कुछ भी तो नहीं है 
तु्म्हारे पास
और पाने के लिए है
पूरा आकाश।
फिर थमा दोगे
मेरे हाथों में बन्दूक 
और
तुम बन जाओगे
तानाशाह स्तालिन
अंततः बिक जाओगे गोर्बाचोव
तब मेरे पास
शेष रह जायेगी
आज ही तरह
बिछाने के लिए धरती
ओढ़ने के लिए आकाश
इसीलिए कह रहा हूँ
कि कम से कम 
मुझे देखने तो दो 
प्यारे प्यारे मीठे मीठे सपने
 
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चूहे 
 
देखता हूँ
अपने अपने बिलों को
छोड़ कर भागते चूहे
सोचता हूँ
शायद
भूगर्भ में भी 
चुनाव हो रहे होंगे
 
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अवसाद
 
आसमान!
तुम्हारे और मेर बीच 
हमेशा रही
दुराव की एक छत
इसलिए 
तुम कभी नहीं जान पाओगे मुझे,
मेरे सच को
 
धरती!
मैं हमेशा 
जुड़ा रहा
तेरे सीने से
शिशुवत
इसलिए 
शायद तू न भी कह पाये
मेरे टूट जाने का सच। 
 
हवा !
तू अपने मन माफिक बही
और मैं
रोकते हुए तेरा रास्ता
टूट कर 
बिखर गया
किरिच किरिच 
अब तू
कह देना 
गर्व से
कि अब कोई 
चट्टान शेष नहीं है
पाँव रख कर
खड़ा होने के लिए

 


- राम किशोर मेहता
 
रचनाकार परिचय
राम किशोर मेहता

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