प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2019
अंक -49

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

जयतु संस्कृतम्
मन्ये कलि: कारणम् 
 
मार्गेषु प्रतिभा च भाग्यमधुना सत्तासु राराज्यते
ज्ञानी वित्तसुदुर्लभोsज्ञमनुजो लक्ष्मीपतिर्जायते।
आच्छाद्यं बहुमूल्यवस्तु मनुजैर्हट्टे सदोद्घाट्यते
कालोsसौ विपरीततामुपगतो मन्ये कले: कारणात्।।१।।
 
मर्यादा गुरुशिष्ययोरपगता स्नेह: पितापुत्रयो:
दम्पत्याश्च परस्परं सुखमयस्त्यागो गतश्शून्यताम्।
त्यक्त्वा गेहसुपाच्यभोजनमहो पण्यां सदास्वाद्यते
कालोsसौ विपरीततामुगतो मन्ये कले: कारणात्।।२।।
 
संस्कारैस्सुविहीनदुष्टमनुजा जाता: प्रतिष्ठान्विता:
पूजापाठसुकर्मधर्मनिरत: प्राच्यो जडोsजायते।
त्यक्त्वा स्वात्मगतं सुखं मृगसमं सर्वत्र संढूंढ्यते
कालोsसौ विपरीततामुपगतो मन्ये कले: कारणात्।।३।
 
स्वामी मूर्खवरो विवेकरहितो ज्ञानी च तत्सेवको
नम्यश्श्लाघ्यतमोsद्य मूढमनुजो विद्वान्प्रहेयोsभवत्।
शिष्यश्चोच्चपदस्थितो गुरुवरो जातस्सखे!निस्पद:
कालोsसौ विपरीततामुपगतो मन्ये कले: कारणात्।।४।।
 
कस्यापीह न दृश्यतेsत्र मुदिता नैव प्रसन्नाननं
सम्बन्ध: खलु मित्र लोभभरितश्चातुर्ययुक्तोभवत्।
विश्वस्थे न हि विश्वसीति मनुजोsविश्वस्थमैत्रीं गत:
कालोsसौ विपरीततामुपगतो मन्ये कले: कारणात्।।5।।

- डॉ. शशिकान्त शास्त्री
 
रचनाकार परिचय
डॉ. शशिकान्त शास्त्री

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जयतु संस्कृतम् (4)