प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अप्रैल 2019
अंक -50

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

रोज़ डे पर

कहीं कोई प्रेमी या प्रेमिका तोड़ न ले
मेरे झूमते-गदराए गुलाब रोज़ डे पर
तो चाक-चौबंद खड़ी हूँ
अपने बगीचे के गुलाबों वाले हिस्से में
कुछ लालसा भरी निगाहें झाँकती हैं
मैं व्यस्त-सी मोबाइल उठाए घूमती हूँ
निगाहें थोड़ी देर गुलाबों पर फिसलती हैं
और मायूस हो झुक जाती हैं
मैं न देखने का नाटक करते मन ही मन
अपनी विजय पर मुस्कराती हूँ कि
एक महीन आवाज़ आती है
"आंँटी प्लीज़ एक गुलाब दे दो ना"
मैं सख़्ती से "नहीं" बोल कर घूम जाती हूँ
मायूस निगाहें लौट रही हैं
मैं गर्व से देखती हूँ अपने गुलाबों को
पर जाने क्यूँ पलट कर आवाज़ देती हूँ उनको
वो आते तो हैं
पर अब निगाहें कुछ सहमी-सी हैं
मैं बगीचे का सबसे सुर्ख़ गुलाब उनको दे देती हूँ
उनकी निगाहों में गुलाब के रंग उतर आए हैं
और
मेरी हथेलियों में गुलाब की रूहानी खुशबू
जाने क्यूँ! बस अच्छा-अच्छा लगता है


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दु:ख

दु:ख जो आँखों से टपका कोरे कागज़ पर
मैंने ज़रा-सा नीला घोल दिया और
एक पूरा आसमान पन्ने पर पसर गया
कुछ ख़्वाबों के पंछी यहाँ-वहाँ उड़ने लगे
दुख गिरा था बंजर धरती पर
फूटने लगी थी कोंपलें हरी-हरी
कुछ ज़्यादा बहा तो नदी बन गई
और मैंने काग़ज़ की कश्तियाँ डाल दीं
बस नहीं रोका तो आँखों में भरकर
क्यूँकि
दुख जब आँखों में रुक जाता है
एक रोज़ दिल तक बहकर
बाँध तोड़ सैलाब बन गुज़रता है


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दीवार

ये जो चुपचाप खड़ी दीवार थी
जाने कितने घर बस आए इसके अंदर
और इसने जाने कितने आँगन बाँटे
कब-कब टूटी और कब खड़ी हुई
जाने क्या-क्या जब-तब देखा
आँधी, पानी, सर्दी, गर्मी हर मौसम
प्यार-मुहब्बत झगड़े-झंझट
बस हर पल यूँ ही चुपचाप खड़ी रही
पुरानी होती रही गिर जाने तक
कुछ औरतें भी दीवारों-सी होती हैं।


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चाबियाँ

खुली ड्योढ़ी वाले उस घर के
नन्हे डगमग कदम जब सधने लगे
तो ड्योढ़ी पार कर निकल गए
कुछ जोड़ी चमकीली आँखे
रस्ता देखते धुंधलाने लगीं
और आहिस्ते-से बुझ गईं
फिर
ड्योढ़ी के खुले दरवाज़े पर
कुछ लौटे कदमों ने डाल दिया ताला
दीवारों के
झड़ते पलस्तर के साथ
बुढ़ाता रहा वो ताला भी
बस चाबियाँ ही महफूज़ रहीं
अलमारी के किसी ख़ास कोने में


- नन्दिता राजश्री
 
रचनाकार परिचय
नन्दिता राजश्री

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