प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अप्रैल 2019
अंक -48

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

व्यंग्य

कलजुगी काकभुसुंडि

कव्वा, लोमड़ी और गरूड़ इन तीनों का महत्व अनादिकाल से हर युग में बराबर रहा है। भले ही बड़े विचित्र रूप में रहा हो! ये तीनों नायक भी रहे और खलनायक भी। परन्तु सच तो यह है कि इन तीनों रहस्यमयी जीवों ने साथ-साथ दावतें भी खूब उड़ाई हैं। वह भी परभक्षी या सर्वभक्षी के रूप में। ये दिखते तो ऐसे हैं मानो समाज की साफ-सफाई इन्हीं के जिम्मे हो। यही सबसे साफ-सुथरे और भले हों। दरअसल ये तो इनके पेट भरने मात्र का जरिया है। ये खाते भी खूब हैं, बघारते भी खूब और बचा-खुचा छिपाकर भी खूब रखते हैं। इनमें सबसे विचित्र और जन्म-मृत्यु का संगी 'कव्वा' सर्वाधिक चर्चित रहा है। सुभाषितानि में भी सभी नें पढ़ा है-

काकःकृष्णः पिको कृष्णः को भेदो काक पिकयोः
वसन्त समये प्राप्ते काकः काकः पिकः पिकः


वर्तमान काल मे बढ़ते विकिरण, तकनीकी के वर्चस्व एवम् 'गर्मी के माहौल' बोले तो गोल्बल वार्मिंग के चलते ये प्राकृतिक जीव तो अंतर्ध्यान होने की कगार पर हैं परन्तु इनका स्थान कुछ अति विशिष्ट आधुनिक मानवों नें ले लिया है। ये प्रकृति के आधुनिक अप्राकृतिक मानवाकारी जीव शाम होते ही कुलबुलाने लगते हैं। आप भी इनसे रोज रूबरू होते ही होंगे? अजी नहीं होते! तो झट से ले आईए दो बक्से इनसे मिलने के लिये! एक 'इडियट बाक्स' दूसरा 'शट अप बॉक्स' (इनके चालू होते ही इडियट जैसे तो हो ही जायेंगे साथ ही साथ शट अप भी रहेंगे)। फिर तो आपके हाथ का रिमोट भी आपको ही संचालित करना आरम्भ कर देगा। 'कव्वे' की कर्कश चीत्कार में भी 'मधुर कोयलगान' का आभास होने लगेगा। खैर, श्लोक लिखा है तो भाव भी समझ लें। कलयुगी 'सनकादिक ऋषि' उक्त श्लोक के मायने कुछ यूॅं बतलाते हैं।
 

'कव्वा हो या कव्वी, दोनों ही कृष्ण की तरह (चतुर) होते हैं फिर भी इन दोनों को कोई और ही भेद पाता है। भेदने वाले को जानने के लिये बसन्त काल (प्रत्येक पाँच साल में आने वाले जैसा कि आजकल चल ही रहा है) में देखें। जब 'कव्वा' और 'कव्वी' दोनों एक ही होते हैं (जो लोमड़ी को गाने सुनाते रहते हैं।)
ये वर्चुअल डिजिटल छदमी 'कव्वे' जो रात होते ही अपनी डाल पर काला कोट डाले आँख चमकाते, पंजों और कंधों को उचकाते अपनी रामकथा सुनाते हैं। कुछ तो हू-बहू काक जैसे ही दिखने की चाह में 'कलयुगी चक्षु' अर्थात चश्मा भी पहनते हैं। इनके अपने अपने राम हैं। जो पुरूषोत्तम भगवान श्री राम से जाने कितने प्रकाशवर्ष दूर; और असल में रावण की सेना के नायक की तो मानो नाभि में रहते हैं।

 

ये बबूल की डालों पर सवार 'कव्वे' दिन रात संख्यात्मक रूप से बढ़ते ही जा रहे हैं। जितने डाल उतने 'कव्वे'। जितने 'कव्वे' उनके उतने नायक! जितने नायक उतनी कथाएँ! जितनी कथाएँ उतने झूठ! जिनका गुणगान ये चतुर काक बहुत ही चालाकी से करते हैं। ये जानते हैं कथा पूरी होने से पहले ही मूर्ख श्रोता सो जायेंगे और अधूरी कथा अमर हो जायेगी। साथ ही यह भी कि ये कथाएँ उन्हें अतार्किक और भ्रमित कर के रखे रहेंगी।
अपनी अपनी कथा के गुणगान में तल्लीन ये 'कव्वे' एक-दूसरे को खूब कोसते, गरियाते और शब्दों से नोचते हैं। इनका आपसी छदम युद्ध पराकाष्ठा तक पहुँचता है। यही सब इनकी टी.आर.पी. अर्थात 'टंके रहो पेड़ पर' की आयु बढ़ाने में जीवन संजीवनी का काम करता है।
मजा तो तब आता है साहब, जब ये अपने जैसे ही दो चार 'कव्वे' अपनी डाल पर और बुलाकर काँव-काँव शुरू कर देते हैं। इस खास 'विमर्श' के लिये एक खास समय तय रहता है, जिसमें अपने पक्ष के सारे 'कव्वे' दूसरे पक्ष के कथानायक की बातों को आडे़ हाथों लेकर टूट पड़ते हैं। चीख-चीखकर दूसरे डाल के 'कव्वे' की कथा और कथानायकों को नोंचना, खुरचना, पंजा मारना, फड़फड़ाना चालू होने के साथ ही अपने झूठ को सच साबित करने के लिये इनका कानफोड़ू काॅंव-काँव श्रोताओं को श्रोता कम दर्शक अधिक बनने पर मजबूर कर देता है। जो अंततः ज्ञान या तथ्यों से इतर मनोरंजन का ही माध्यम बनकर रह जाता है। दूसरे पक्ष को झूठा, फरेबी, मक्कार, निक्कमा, भ्रष्ट, साबित करना मानो इनका एक मात्र ध्येय एवम् जन्मसिद्ध अधिकार बन जाता है। इस सब के चलते, कभी-कभी तो प्रबुद्ध दर्शकगण इन 'कव्वों' को भगाने के निमित्त 'मूर्ख बक्से' पर पत्थर मारने तक को आतुर हो जाते हैं। फिर अपने ही नुकसान कर बैठने की आशंका में मन मसोमकर रह जाते हैं।

 

इनकी काँव-काँव का लाभ लेने इनके वास्तविक कथानायक चालाक 'लोमडि़यों' के रूप धर इन पेड़ो के नीचे डेरा डाले रहती हैं कि कुछ ऐसे टुकड़े इनके मुँह से गिरें जो 'लोमडि़यों' के काम आ सकें। जबकि यह बात वे भी भली-भांति जानती हैं कि उनके मुँह में पड़ा हर एक टुकड़ा इन्हीं कथानायक रूपी 'लोमड़ियों' का दिया हुआ है, जिसे 'कव्वों' ने मात्र उल्टी करना है। नील वर्ण, रक्त वर्ण, स्वेतवर्ण, द्विवर्ण और भी जाने क्या-क्या वर्णी ये 'लोमड़ियाँ' डेरा डाले इन 'कव्वों' पर पैनी नजर रखती हैं।
इन 'कव्वों' की जरा-सी चूक 'लोमड़ियों' को 'लोमश' ऋषि का रूप दे देती है और फिर तो कथावाचक 'कव्वा' शापित होकर 'काकभुशुण्डि' बन सारा जीवन गुमनामी में व्यतीत करता है। सतयुगी कथा से यह 'कलयुगी' कथा बस इतनी-सी भिन्नता अवश्य रखती है कि ये शापित 'काकभुशुण्डि' दुश्मन डाल के 'कव्वे' से सुर में सुर मिलाकर उसी का गीत गाने लगता है और काकगान में ही मग्न रहता है।

 

साथ ही इन 'कव्वों' के ऊपर एक 'गरूड़' भी होता है, जो इन 'कव्वों' को निर्देशित, नियंत्रित और अभिमंत्रित करता रहता है। इन 'गरूड़ों' का सीधा सम्बन्ध पेड़ के नीचे वाली ‘लोमड़ियों‘ से होता है, जिनके साथ उन्हें मृत जीवों का बचा-खुचा, सड़ा-गला माँस दावत के रूप में हर रोज या आये दिन मिल बाँटने का अवसर मिलता है। एक-दूसरे की कृपा पर जीवित ये परजीवी खुद को भले ही सहजीवी कहें पर हमेशा मासूमों और बेकसूरों का ही माँस भक्षण करते हैं।
असली वाला बसन्त काल तो इन 'कव्वों' का कभी आता ही नहीं सो इनकी असल पहचान छुपी ही रहती है। वर्ष भर कृष्ण वर्ण का लाभ लेकर कोयल बने घूमते हैं। इस सब में इनके ‘गरूड़ों‘ का बड़ा हाथ होता है, जो इनका वही रूप रंग और आकार दिखाते हैं जो वो दिखाना चाहते हैं। नाना प्रकार की अफ्सरायें इनके श्रृंगार को सदैव तैयार रहतीं हैं ताकि काकवाणी गुजांयमान रहे। हाॅं, श्राद्धपक्ष इनका हर रोज समझो जब तक ‘गरूड़‘ महाराज और चतुर ‘लोमड़ी‘ का प्रसाद है। हर रोज खीर और पूड़ी की दावत साथ ही सोशल मीडिया में पूजनीय भी बने रहते हैं। हाँ, आका लोगों नें जरा नजरें क्या तरेरी कि भुखमरी का दौर शुरू।


सावधान! ‘लोमड़ियों‘ ‘कव्वों‘ और ‘गरूड़ों‘ की तिकड़ियाँ किसी के भी छक्के छुड़ा सकती हैं। पलट-पलट कर, उलट-उलट कर, झपट-झपट कर ये ऐसी चिल्पों मचाते हैं कि देखने सुनने वाले जातक का मन मस्तिष्क शून्य हो जाय और ‘कव्वाराग‘ ही जीवन का अंतिम सत्य लगने लगे। इनकी ‘कव्वाहट‘ के आगे सामान्यजन का अपनी मन्दबुद्धि पर तरस खाना रोज की बात हो चुकी। ये किसी का भी मार्ग बदल सकते हैं। सिर्फ अपनी काँव-काँव से जगाकर रात को दिन और दिन को रात साबित करना इनके बांये पंजे का काम है। अपना उल्लू सीधा करने के बाद सभी को उल्लू बनाते हुये उसी साँस में यह भी साबित कर देते हैं कि ये ही हैं सर्वजन, बहुजन, गरीबजन, पहाड़जन, मैदानजन, अल्पजनों और निर्जनों के असली खेवनहार जबकि ये असली खेवनहार तो दुर्जनों के होते हैं।
हाॅं तो कलजुगी ‘काकभुसुण्डी कथा‘ के प्यारे उमास्वरूपा श्रोतागणो! आजकल वही बासन्ती बयार है। ‘कव्वे‘, ‘कव्वियाँ‘, अपनी-अपनी ‘लोमड़ियों‘ के लिये ‘कव्वागान‘ में लगे हैं। सब कुछ शबाब पर है। इन्हें खूब सुनें! मजे लें!
परन्तु सावधान! करना अपने ही ‘मत‘ की- मतलब मन की।


- भुवन कुनियाल
 
रचनाकार परिचय
भुवन कुनियाल

पत्रिका में आपका योगदान . . .
व्यंग्य (1)