प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अप्रैल 2019
अंक -50

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

हिन्दी ग़ज़ल में महिला लेखन: सृजन एवं सरोकार
- राहुल प्रसाद

 

इन महिला ग़ज़लकारों की ग़ज़लों में संवेदनशील नारी की वेदना एवं उनके आत्मसंघर्ष का रूप स्पष्ट रूप से झलकता है। साथ ही सामाजिक संवेदना के स्वर भी स्पष्ट सुनाई पड़ते हैं। नारी स्वतंत्रता की पुकार एवं नारी मन की आकांक्षा भी इन ग़ज़लकारों की ग़ज़लों के मुख्य विषय रहे हैं। इन महिला ग़ज़लकारों की ग़ज़लों में ख़ुद को ज़िन्दा रखने की कवायद दिखाई देती है।
ग़ज़ल साहित्य की वह विशिष्ट विधा है, जो अपने सरल मिज़ाज के कारण सबसे अधिक लोकप्रिय एवं शिखर पर विराजमान है। ग़ज़ल की यही सरलता उसे आम लोगों के हृदय में उपस्थापित करती है। समय एवं परिस्थिति के साथ-साथ ग़ज़ल के कहन में भी अनेक परिवर्तन हुए। सुरा-सुंदरी एवं मयख़ानों तक सीमित रही ग़ज़ल आज संसार के अंतिम व्यक्ति के साथ उनकी भावनाओं को अभिव्यक्ति दे रही है।
विभिन्न विमर्शों के बाद महिलाओं ने साहित्य में जिस प्रकार अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज करवाई है, वह ग़ज़ल के क्षेत्र में कम दिखाई पड़ता है। किन्तु इधर कुछ ऐसी भी महत्वपूर्ण पुस्तकें सम्पादित हुई हैं, जिनमें महिला ग़ज़लकारों की ग़ज़लों को सम्मिलित किया गया है। साथ ही कुछ प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में भी महिला ग़ज़लकारों की ग़ज़लें प्रमुखता से छापी जा रही हैं। इन महिला ग़ज़लकारों की ग़ज़लें सरल-सहज एवं अत्यंत पठनीय हैं। वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक विसंगतियों से जुड़ा चित्रण हो अथवा पितृसत्तात्मक व्यवस्था में जकड़ी स्त्री जीवन की  सच्चाई हो या अपने मनोजगत के भावों को प्रकट करने का साहस हो अथवा स्त्री संघर्ष एवं दाम्पत्य जीवन की मनोदशा को प्रकट करने का नैतिक ढंग हो, सभी का दिग्दर्शन इन ग़ज़लकारों की ग़ज़लों में देखने को मिलता है। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य का रेखांकन डॉ. भावना ने किस प्रकार किया है, वह देखने योग्य है–


ये गुस्सा फूट लावा हो रहा है
उन्हें लगता दिखावा हो रहा है
सुना है स्वर्ग जैसी है ये धरती
यहाँ तो खून ख़राबा हो रहा है
वो पानी में दिखाने चाँद लाया
बड़ा अच्छा छलावा हो रहा है
हुई सत्ता की ऐसी ताजपोशी
नगर भर को बुलावा हो रहा है1


वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था का इतना जीवंत चित्रण उनकी सत्ता के प्रति समझ को भी रेखांकित करता है एवं उनकी जन पक्षधरता का भी प्रमाण देता है। हिन्दी के श्रेष्ठ गीतकार गोपालदास नीरज ने लिखा है कि 'इंसान को इंसान बनाने के लिए जीवन में प्यार की कहानी होना आवश्यक है'। लेकिन मीनेष शर्मा का मानना है कि मुहब्बत ज़रूरत अवश्य है किन्तु सामाजिक आवश्यकताएं भी इंसान के अन्दर जिजीविषाएं  पैदा करती हैं। वे लिखती हैं–

मुहब्बत ज़िन्दगी के वास्ते माना ज़रूरी है
ज़रूरत की ज़रूरत भी समझ आना जरूरी है2


केवल इश्क़-मुहब्बत ही नहीं बल्कि समसामयिक विषयों पर भी आज की ग़ज़लकार ख़ूब लिख रही हैं। बेरोज़गारी का दंश हो या ग़रीबी की मार हो, सबकी अभिव्यक्ति इन ग़ज़लों में देखने को मिलती है। सीमा प्रधान की ग़ज़ल के कुछ शेर देखे जा सकते हैं–

बेचकर खूं कुछ कमाता है ग़रीब
मुश्किलों से घर बनाता है ग़रीब
हैं उपेक्षित हर नजर में हर जगह
कब किसी का प्यार पाता है ग़रीब
तन हुआ जर्जर कमां-सी हड्डियाँ
फिर भी सर बोझा उठाता है ग़रीब3


ग़रीबों के प्रति झूठी संवेदनाएँ दिखाने एवं उन पर अत्याचार करने वालों का चित्रण मालिनी गौतम इन शब्दों में करती हैं–

कभी आँखें दिखाते हो, कभी खंजर चलाते हो
ग़रीबों पर बताओ इस तरह क्यों ज़ुल्म ढाते हो
तुम्हारे कारख़ानों में हैं मरते लोग आये दिन
तुम उनकी मौत पर आँसू मगरमच्छी बहाते हो4


आए दिन प्यार के नाम पर हो रहे दैहिक शोषण, जिसकी सबसे ज़्यादा शिकार लड़कियाँ हो रही हैं। उस कटु सच्चाई को ग़ज़लकार कैसे शब्दों में पिरोकर शेर का आकार देता है, इसकी बानगी सीमा शर्मा ‘मेरठी’ की ग़ज़लों में देखी जा सकती है–

तुम उधर उलझे रहे व्यापार में
हो गये मसरूफ़ हम घर-बार में
जिस्म की चाहत को देकर नाम इश्क़
लड़कियाँ अब लुट रही हैं प्यार में 5


सियासतदारों की ख़ुदगर्जी एवं ढुलमुल रवैये के कारण दो देशों के मध्य बढ़ रही नफ़रत की खायी और गहरी होती जा रही है। किन्तु इसका सबसे अधिक दंश एक सैनिक एवं उसके परिवार को झेलना पड़ता है। आखिर उनसे भी तो पूछा जाना चाहिए कि वो क्या चाहते हैं! आज की नितांत समसामयिक परिस्थिति को सरोज व्यास इस रूप में व्यक्त करती हैं–

दिल्ली का दर्द पूछ कराची का दर्द पूछ
दोनों तरफ मची है तबाही का दर्द पूछ
दोनों ही हुक्मरानों से मसले न हल हुए
दोनों ही सरहदों के सिपाही का दर्द पूछ 6


दिलों के मिलन में दुनियादारी का दखल हमेशा रहा है। यों भी कहते हैं कि यदि प्रेम के मार्ग में कठिनाई न हो तो वह प्रेम कैसा? तभी शायद  बोधा ने कहा होगा कि 'प्रेम का मार्ग तलवार की धार पर दौड़ने जैसा है' और मुहब्बतों के शायर जिगर साहब ने इश्क के मार्ग को 'आग का दरिया' बताकर डूब कर जाने की शर्त कही है। प्रेम, मुहब्बत या इश्क कह लें, इस मुआमले में आज की ग़ज़लकार अपने ही अंदाज़ में अपनी भावनाएँ व्यक्त करती हैं। दो दिलों के मध्य दुनियादारी कैसे ख़लल पैदा कर सकती है, उसकी रवानगी दीप्ति मिश्र की ग़ज़लों में देखी जा सकती है–

मैं दिल से मजबूर हूँ अपने और वो दुनियादारी से
दिल दुनिया से जूझ रहे हैं दोनों बारी-बारी से
रिश्तों के इस खेल में इक दिन दोनों की ही हार हुई
वो अपनी चालों से हारा मैं अपनी दिलदारी से 7


प्रेम को स्वीकार करने का साहस एवं लोक-लाज को पीछे छोड़ने की निर्भयता भी इन ग़ज़लों में ब-ख़ूबी देखने को मिलती है। चाहे उसे हिमाकत कहें अथवा रस्म-ओ-रिवाज़ के साथ बगावात कहें, उसे सब स्वीकार है-

वो नहीं मेरा मगर उससे मुहब्बत है तो है
ये अगर रस्मो-रिवाज़ से बगावत है तो है
सच को मैंने सच कहा जब कह दिया तो कह दिया
अब ज़माने की नजर में ये हिमाकत है तो है 8


रचनाकार का एकाकीपन कई बार इतना हावी हो जाता है कि वह उसे अभिव्यक्त किये बिना रह नहीं पाता। सारी दुनिया एक तरफ हो जाए और वह अकेली एक तरफ, उससे भी वह दो-दो हाथ करने में पीछे नहीं रहती। वह अपनी स्थिति को लेकर प्रसन्न है। स्वर्ग का सुख भी उसे ललचा नहीं पाता–

दुखती रग पर ऊँगली रखकर पूछ रहे हो कैसी हो
तुमसे ये उम्मीद नहीं थी दुनिया चाहे जैसी हो
एक तरफ मैं बिल्कुल तनहा एक तरफ दुनिया सारी
अब तो जंग छिड़ेगी खुलकर ऐसी हो या वैसी हो 9


नफ़रतों के बाज़ार में मुहब्बत के फूल बेचना ग़ज़लकार अपना नैतिक दायित्व समझता है। दुनिया चाहे जैसी भी हो, उसे तो केवल सर्वधर्म समभाव एवं परहित का सन्देश सभी तक पहुँचाना है। जन-जन में फ़ैल रही नफ़रत को उसे मिटाना है एवं प्यार का संचार करना है। महाभारत एवं अट्ठारह पुराण लिखने के बाद महर्षि वेद-व्यास ने संसार को जो सन्देश दिया, ऐसा लगता है उर्मिल सत्यभूषण की ग़ज़ल भी उसी का अनुपालन कर रही है–

मैं धरा पर प्यार के कुछ बीज बोना चाहती हूँ
शूल जैसी ज़िन्दगी में फूल होना चाहती हूँ
ढूँढती हूँ प्यार का जल मानवों के बीच रहकर
नफ़रतों के खून के मैं दाग़ धोना चाहती हूँ
कुछ तो ‘उर्मिल’ इस धरा को और मैं सुंदर बना लूँ
बाद इसके ही मैं गहरी नींद सोना चाहती हूँ 10


इन महिला ग़ज़लकारों की ग़ज़लों में संवेदनशील नारी की वेदना एवं उनके आत्मसंघर्ष का रूप स्पष्ट रूप से झलकता है। साथ ही सामाजिक संवेदना के स्वर भी स्पष्ट सुनाई पड़ते हैं। नारी स्वतंत्रता की पुकार एवं नारी मन की आकांक्षा भी इन ग़ज़लकारों की ग़ज़लों के मुख्य विषय रहे हैं। इन महिला ग़ज़लकारों की ग़ज़लों में ख़ुद को ज़िन्दा रखने की कवायद दिखाई देती है। इस सन्दर्भ में डॉ. भावना अपने ग़ज़ल संग्रह ‘शब्दों की कीमत’ की भूमिका में लिखती हैं “ग़ज़ल मेरे लिए साहित्य की विधा भर नहीं, ख़ुद को ज़िन्दा रखने का ज़रिया है। लेखन की अन्य विधाओं की अपेक्षा मैं ग़ज़ल कहने में ज़्यादा सहज महसूस करती हूँ। फ़ारसी में कहते हैं कि जो दिल से उठे और दिल पे गिरे वही शायरी है। शेरों की यही विशेषता मुझे ग़ज़ल कहने को प्रेरित करती है। ग़ज़ल मेरे साथ चलने वाली वह चेतना है, जो हर पल मेरा साथ देती है।”11

ये ग़ज़लें समकालीन हिन्दी कविता के स्वर में स्वर मिलाते हुए आगे बढ़ती हैं। गाँव से शहर आये लोग इस उम्मीद में कि उन्हें दो वक्त की रोटी मयस्सर हो किन्तु शहर की असल सच्चाई से परिचय होने पर स्थिति कितनी विकट है, यह शरद सिंह की ग़ज़ल बयां करती है–


कोई आँसू बहाता है, कोई खुशियाँ मनाता है
ये सारा खेल उसका है वही सबको नचाता है
बहुत से ख़्वाब लेकर गाँव से वह शहर आया था
मगर दो जून की रोटी ब-मुश्किल ही कमाता है 12


नारी के त्याग, समर्पण एवं सेवा भाव को शब्दबद्ध कर पाना कदाचित् किसी भी कलमकार के लिए आसान काम नहीं है। फिर भी एक पत्नी के रूप में, एक माँ के रूप में उसकी भूमिका एवं उसके महत्व का रेखांकन मालिनी गौतम ने अनूठे अंदाज़ में किया है–

वो औरत रोज़ अपने आप पर यूँ ज़ुल्म ढाती है
स्वयं भूखी रहे पर रोटियाँ घर को खिलाती है
नशे में धुत्त अपने आदमी से मार खाकर भी
बहुत ज़िन्दादिली से दर्द को वो भूल जाती है
जिसे दुनिया में आने से ही पहले मार देते हो
गलाकर जिस्म अपना वो तुम्हें दुनिया में लाती है 13


रसोई में काम करने वाली महिला के स्वप्न उससे आगे के हैं। प्रगतिशीलता के साथ-साथ आगे बढ़ने का जूनून उसके अन्दर धीरे-धीरे घर कर रहा है और वह रसोई घर की चार-दिवारी से निकलकर मुक्त दुनिया के दर्शन करना चाहती है। वह दुनिया के सभी डरों से आज़ाद होना चाहती है। पारिवारिक ज़िम्मेदारी के साथ-साथ सामाजिक गतिविधियों में वह अपनी महती भूमिका दर्ज कराने का भी हुनर रखती है। मीनाक्षी जिजीविषा की ग़ज़लों में स्त्री जीवन की त्रासदी के रंग ब-ख़ूबी दिखते हैं–

रोटी-कपड़ा बच्चे घर-वर से आगे
सोच रही है दिवार-ओ दर से आगे
चूल्हा-चौका झाड़ू-पोछा और बर्तन
देख रही सपना इस मंजर से आगे
लोग कहेंगे ऐसा-वैसा और क्या-क्या
बढ़ आई वो इस डर-वर से आगे 14


प्रेमचंद के होरी से लेकर आज तक किसानों की स्थिति में बहुत अधिक सुधार नहीं हुआ है। कर्ज के बोझ में वह इतना दब चुका है कि अंततः उसे प्राण त्यागने पर विवश होना पड़ता है। नित नए-नए उपन्यास किसानों की स्थिति को लेकर लिखे जा रहे हैं। कविता में भी किसानों की पीड़ा का वर्णन कवियों ने ख़ूब किया है, तो फिर ग़ज़ल उससे अछूती कैसे रह सकती है! कर्ज में दबे किसान की दारुण व्यथा का चित्रण मालिनी गौतम की ग़ज़लों में देखा जा सकता है–

सारा जीवन बीत गया कर्ज नहीं है चुक पाया
देख उजड़ते खेतों को होरी का मन भर आया
दर्द उदासी और घुटन कर्जा कर के बैठे हैं
घर के कोने-कोने में मरघट-सा मातम छाया 15


वस्तुतः इन महिला ग़ज़लकारों की ग़ज़लों में जीवन के सभी रंगों के दर्शन होते हैं। केवल शब्दों की कारीगरी नहीं अपितु अनुभूत सत्य से उपजी ग़ज़ल ने यहाँ आकार लिया है। ग़ज़ल कहन के मौलिक रंग-ढंग के साथ-साथ रदीफ़, क़ाफ़िया एवं बह्र की अच्छी समझ के साथ इनकी ग़ज़ल विकसित हो रही है। बहुत छोटी बह्र में भी बड़ी से बड़ी बात कहने का हुनर इनके पास है। छोटी बह्र की कुछ ग़ज़लें देखी जा सकती है–

हर दिल में मक्कारी देखी
बस मतलब की यारी देखी 16
...................................

फ़ितरत को इंसानी रख
आँखों में कुछ पानी रख
बंगले के इक हिस्से में
कोई याद पुरानी रख 17


       और

देखो तो दीवार कहाँ है
दो धारी तलवार कहाँ है
तुम भी इंसा हम भी इंसा
सोचो तो तकरार कहाँ है 18


चाय की दुकान हो अथवा कोई ढाबा हो, बच्चे हर जगह श्रम करते हुए दिखाई देते हैं। दुकानों में काम करने वाले छोटुओं की स्थिति को एक संवेदनशील ग़ज़लकार कैसे अपने नज़रिये से देखकर उसे ग़ज़ल का रूप देता है, उसका सजीव चित्रण डॉ. भावना की ग़ज़लों में दिखाई देता है। पूरा का पूरा बिम्ब मानो आँखों के सम्मुख उपस्थित हो जाता है–

जिसे पढ़ने को जाना है उसे नौकर बनाती है
हर एक छोटू के बचपन को ग़रीबी लील जाती है
कहाँ हैं खींचकर लाती लकीरें अपने हाथों की
ये किस्मत आदमी से बेवजह क्या-क्या कराती है 19


22 मई 2016 को जनसत्ता (दैनिक समाचार-पत्र) में छपे लेख ‘हिंदी गजल और आलोचकीय बेरुखी’ में ज्ञानप्रकाश विवेक वाजिब चिंता व्यक्त करते हुए लिखते हैं– ‘उर्दू में ग़ज़ल शायरी की प्रमुख विधा है। मगर वही ग़ज़ल जब हिन्दी (देवनागरी) में आती है तो हाशिये की विधा बनकर रह जाती है । हिन्दी काव्य जगत में कवि जितने आत्मसमान एवं रुतबे के साथ चर्चा में रहते हैं, पत्र-पत्रिकाओं में एक साथ कई पृष्ठों में छपते हैं वह माहौल कभी हिन्दी ग़ज़लकारों को हासिल नहीं हुआ।’ यह बात हिन्दी ग़ज़ल एवं ग़ज़लकारों के सम्बन्ध में रेखांकित की गयी है, उसमें भी यदि बात केवल महिला ग़ज़लकारों की हो तो स्थिति का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। बावजूद इसके इन महिला ग़ज़लकारों ने साहित्यिक दुनिया में एक अलग पहचान बनायीं है। जीवन के हर सुख-दुःख, हँसी-ख़ुशी, सभी रंगों को ग़ज़ल में भरकर देश दुनिया में पहुंचाने का सराहनीय कार्य किया है।
उम्मीद कर सकते हैं कि आगे और भी महिला ग़ज़लकार नए तेवर के साथ साहित्यिक दुनिया में प्रवेश करेंगी और अपनी ग़ज़लों से पाठकों को रूबरू करवाएंगी।





सन्दर्भ:-
1. शब्दों की कीमत, डॉ. भावना, अंतिका प्रकाशन, पृष्ठ संख्या-78
2. 101 महिला गज़लकार, संपादक- के. पी. अनमोल, किताबगंज प्रकाशन, पृष्ठ संख्या-132
3. वही, पृष्ठ संख्या-183
4. समकालीन महिला ग़ज़लकार, संपादक- हरेराम समीप, हिंदी साहित्य निकेतन, पृष्ठ संख्या-138
5. 101 महिला गज़लकार, संपादक- के. पी. अनमोल, किताबगंज प्रकाशन, पृष्ठ संख्या-186
6. समकालीन महिला ग़ज़लकार, संपादक- हरेराम समीप, हिंदी साहित्य निकेतन, पृष्ठ संख्या-25
7. वही, पृष्ठ संख्या-61
8. वही, पृष्ठ संख्या-63
9. वही, पृष्ठ संख्या-64
10. वही, पृष्ठ संख्या-18
11. शब्दों की कीमत, डॉ. भावना, अंतिका प्रकाशन, पृष्ठ संख्या-4
12. समकालीन महिला ग़ज़लकार, संपादक- हरेराम समीप, हिंदी साहित्य निकेतन, पृष्ठ संख्या-99
13. वही, पृष्ठ संख्या-117
14. वही, पृष्ठ संख्या-124
15. वही, पृष्ठ संख्या-138
16. वही, पृष्ठ संख्य-137
17. वही, पृष्ठ संख्या-114
18. 101 महिला ग़ज़लकार, संपादक- के. पी. अनमोल, किताबगंज प्रकाशन, पृष्ठ संख्या-207
19. शब्दों की कीमत, डॉ. भावना, अंतिका प्रकाशन, पृष्ठ संख्या-135


- राहुल प्रसाद
 
रचनाकार परिचय
राहुल प्रसाद

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