प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अप्रैल 2019
अंक -48

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

फ़िल्म समीक्षा
राम नाम का डंका पीटती कमजोर ‘राम जन्मभूमि’
 
 
हमारे देश में एक से बढ़कर एक विवाद हुए हैं। कई विवादों ने तो इस देश को वैश्विक धरातल पर शर्मसार भी किया है। ऐसा ही एक विवाद 6 दिसम्बर 1992 का भी है। जब सत्ता के गलियारों से एक बयार बही। मुद्दा था राम जन्मभूमि का। इस मुद्दे ने वर्षों से सुप्त धार्मिक जनता में एक ऐसी अलख जगाई जिसके नाम पर आज भी राजनेता अपनी रोटियाँ सेकते आ रहे हैं। अब इसे तो राम स्वयं ही बेहतर जाने कि यह उन्हें वर्षों तक सत्ता पर काबिज रखेगा या नहीं। हमारा देश वैसे ही अनेक विचित्रताओं से भरा पड़ा है। जगह-जगह उग आए मंदिर मस्जिद और गुरूद्वारे आज धार्मिक और मानिसक शांति का केंद्र होने के बजाए एक-दूसरे  को गिराने का मूल कारण अवश्य बन रहे हैं। खैर विवाद तो होते रहे हैं और आगे भी होते रहेंगे। लेकिन धर्म के नाम पर खेला गया यह खूनी खेल जब तक जनता के समझ में आएगा तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। 
 
अब राम या अल्लाह थे या नहीं इस पचड़े में तो नहीं पड़कर यह फिल्म देखी जाए तभी उचित है। किन्तु ऐसे मुद्दों पर जब फिल्म बनाई जाती है तो उसका गहरा असर धर्मभीरुओं पर अवश्य पड़ता है। ‘राम जन्मभूमि’  फिल्म भी रिलीज होने से पहले कई दिनों तक ठंडे बस्ते में पड़ी रही और आखिरकार पद्मावत रिलीज की तरह कोर्ट को आगे आकर कहना पड़ा कि सहनशीलता बनाए रखें। भले फिर फिल्म देखते समय आप सहनशील रहे या नहीं। इस तरह की फिल्में जब कमर्शियली हिट साबित ना हों तो समझना चाहिए कि अब जनता भी इस मुद्दे को सड़ा-गला समझ बिसराने लगी है। 
 
फिल्म की कहानी बाबरी मस्जिद विध्वंस और राम मंदिर निर्माण के कारण उपजे तनाव पर आधारित है। इसके साथ-साथ तलाक और हलाला की कहानी भी इसलिए बुनी हुई लगती है ताकि दर्शकों को बेजा सवाल उठाने का मौका न मिले। वसीम रिजवी निर्मित तैयार हुई इस फिल्म के माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि उस स्थान पर कोई मस्जिद थी ही नहीं। निर्माता, लेखक, निर्देशक वसीम रिजवी की यह फिल्म अयोध्या काण्ड में कारसेवकों पर गोलियों की बौछार से शुरू होती है। और अंत तक आते-आते हमारे दिमाग में फिर वही प्रश्न से सुलगाने लगती है। 
 
इतिहासकारों की मानें तो आज से करीबन पाँच हजार से भी अधिक साल पहले भगवान राम का जन्म अयोध्या में जिस जगह हुआ था। वहाँ पहले से बने मंदिर को तोड़कर बाबर के कहने पर 15वीं सदी में वहाँ बाबरी मस्जिद का निर्माण करवाया गया। उस समय में मंदिर को बचाने के लिए हिन्दू राजा महताब सिंह बद्रीनारायण ने युद्ध भी लड़ा था। राम मंदिर को केंद्र में रखकर बनाई गई यह पहली फीचर फिल्म है। सिने कास्ट प्रोड्क्शन के बैनर तले बनी तथा सनोज मिश्रा के निर्देशन में तैयार हुई यह फिल्म राजनीतिक रोटियाँ सेकने वालों पर करारा प्रहार करती है। हिन्दू और मुसलमान दोनों धर्मों की खामियों को पर्दे पर बड़ी खूबसूरती और नजाकत के साथ उतारा गया है। 
 
हर कदम पर पारदर्शी शीशे के समान खरी उतरने वाली यह फिल्म धर्मान्धों को अवश्य दिखाई जानी चाहिए। हलाला के नाम पर अपने ही ससुर के साथ सोना फिल्म को भावुकता की चाशनी जरुर चटा जाता है। एक और जहाँ इसमें राम जन्मभूमि के लिए लड़ते लोग और उनकी नारे बाजी का विवाद है तो वहीं दूसरी और इसमें हलाला जैसी कुप्रथाओं पर से भी पर्दा उठाया गया है। मनोज जोशी, गोविंद नामदेव आदि को छोड़ दें तो फिल्म में कोई बड़ा कलाकार भी नजर नहीं आता। राजवीर सिंह, तृषा सचदेवा और आदित्य जैसे छोटे कलाकारों के साथ मिलकर बनाई गई छोटे बजट की यह फिल्म हमें इतिहास में लेकर जरुर जाती है। किन्तु यह आपके हाथों में धार्मिक नमी बिल्कुल भी पैदा नहीं कर पाती। गोविंद नामदेव और मनोज जोशी इस तरह की फिल्मों के लिए उपयुक्त कास्ट साबित होते हैं। 
 
फिल्म की कास्टिंग मामले में रिसर्च करने के बजाए फिल्म में कुछ तथ्यपरक जानकारियाँ कहानी के माध्यम से कही जाती तो इसका प्रभाव गहरा हो सकता था। म्यूजिक फिल्म का साथ बीच-बीच में छोड़ता नजर आता है। और गाना तो एक भी ऐसा नहीं है जिसे आप दोबारा स्टेट्यून करना चाहें। धार्मिक आयोजनों में इस तरह के गाने अपनी चमक अवश्य बिखरते हैं। धर्म के आवरण में लिपटी इस तरह की जहरीली चीजों से जितना दूर रहें उतना आपकी सेहत के लिए बेहतर होगा। फिल्म एडिटिंग, कास्टिंग, कहानी, म्यूजिक, सिनेमेटोग्राफी, डायलोग,सेट-लोकेशन, कैमरा के मामले में हर्फ़-दर-हर्फ़ खरी नहीं उतरती। लेकिन यह जनमानस को झकझोरने की क़ुव्वत रखती है।

 


- तेजस पूनिया