प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मार्च 2015
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

भारतीय संस्कृति में ब्रज लोकगीतों का महत्व: आज़र खान
लोक-साहित्य में लोक जीवन और लोक-संस्कृति का चित्रण ही उसकी सबसे बड़ी विशेषता होती है। लोक-साहित्य की रचना अधिकतर सामूहिक रूप में अथवा ऐसे व्यक्तियों द्वारा होती है, जो समाज से अभिन्न रूप से जुड़े होते हैं। अतः उनमें जनजीवन अधिक मुखरता के साथ अभिव्यक्त होता है। यही कारण है कि लोक-साहित्य समाज शास्त्रियों के लिये प्राचीन समाज के अध्ययन की एक प्रमुख सामग्री मानी जाती है और निश्चित रूप से इसमें लोकगीतों की अहम भूमिका होती है। लोकगीतों और लोककथाओं में लोक जीवन का जितना स्वाभाविक चित्रण होता है, उतना अन्यत्र नहीं। सच तो यह है कि किसी समाज का अकृत्रिम और वास्तविक चित्र देखना हो तो उसके लोक-साहित्य का अध्ययन ज़रूरी माना जाता है। लोक कवि मानव को जिस रूप में देखता है, उसका उसी रूप में वर्णन करता है। अतः उसका चित्रण सत्य के अधिक निकट प्रतीत होता है। इतिहास के ग्रंथों में लड़ाई-झगड़ों, राजनितिक संघर्षों का विवरण भले ही मिल जाये परन्तु लोक-संस्कृति के यथातथ्य चित्रण के लिए लोक-साहित्य का अनुसंधान ज़रूरी ही नहीं, अनिवार्य भी है। लोकगीतों, गाथाओं तथा कथाओं में मनुष्य का रहन-सहन, आचार-विचार, खान-पान और रीति-रिवाज़ का सच्चा चित्र देखने को मिलता है। 
लोकसाहित्य में ब्रजभाषा के लोकगीतों का अपना एक अलग ही महत्व है। ब्रज लोकगीतों को उद्देश्य/आधार पर दो भागों में बाँट सकते हैं- एक अनुष्ठान सम्बन्धी, दूसरे मनोरंजन सम्बन्धी। यह कहना बहुत ही मुश्किल है कि मनुष्य ने लोकाचार, व्यवहार और अनुष्ठान में गीतों को इतना महत्व कब से और क्यों देना आरम्भ किया? किन्तु इसमें संदेह नहीं है कि ‘गीत’ किसी भी संस्कार या आचार के आज प्रधान अंग बन गये हैं। शास्त्रों में सोलह संस्कारों का वर्णन है। शास्त्रों से वंचित लोक-मानस भी जाने-अनजाने इन संस्कारों में जीता है। गर्भाधान, पुंसवन, जन्म, जनेऊ, विवाह, और मृत्यु आदि संस्कार से कौन वंचित है। प्रत्येक संस्कार हेतु जन-मानस में अलग-अलग अवसरों पर अलग-अलग गीत बड़े हर्षोल्लास के साथ गाये जाते हैं। ये लोक गीत इन संस्कारों के प्रमुख अंग हैं।
शिशु जब जन्म लेता है, तभी से उसके संस्कार शुरू हो जाते हैं और यह लोक तो गीत गाने के अवसर सदैव ही खोजता रहता है। इस तरह जन्म से लेकर मृत्यु तक वह संस्कारों से घिरा रहता है। धर्म भारतीय लोगों का प्राण है, धर्म का उनके जीवन में प्रमुख स्थान है। विभिन्न संस्कारों के अवसर पर स्त्रियां अपने कोकिल कंठ से गा-गाकर जन-मन का मनोरंजन करती हैं। मृत्यु के अवसर पर अत्यंत ह्रदय-विदारक गीत गाया जाता है परन्तु ऐसे गीतों की संख्या बहुत कम है।
ब्रज प्रदेश में पुत्र के जन्म लेने पर एक पर्व जैसा अनुष्ठान संपन्न होता है। गर्भ धारण करने से लेकर पुत्र-जन्म के समय तक समस्त संस्कार जन्म संस्कारों के अंतर्गत आते हैं। इन संस्कारों में सोभर, पुंसवन, यज्ञोपवीत, मुंडन, छठी, दष्ठौन आदि के गीत आते हैं। छठे दिन होने वाले संस्कार को ‘छठी’ कहते हैं। ब्रज में यही नाम अधिक प्रचलित है-
              “छठी पूजंतर बहू आई सीता,
               छठी पूजंतर बहु आई उर्मिला, 
               छठी पूजंतर बहू आई कहा फलु मांगै,
               माँगै, बारौ झंडूला गोद माँगै।”1 
 
शिशु जब बड़ा हो जाता है तो अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुसार तीन, पांच या सात वर्ष के बच्चे का मुंडन करवाया जाता है, जो भारतीय संस्कृति में अति आवश्यक माना जाता है। ब्रज में भी यह संस्कार किया जाता है। मुंडन किसी मंदिर अथवा किसी नदी के किनारे करवाया जाता है, जिसे मुंडन संस्कार कहते हैं-
               “मेरे बालक के सिर पै जरूली, कहो कैसे मुड़े। 
                 देवी के मंदिर जच्चा पुकारै, जरूली मइया। 
                 बुआ-भैना करें आरती, दे देउ बिनकै नेग।”2
 
मुंडन संस्कार का भारतीय संस्कृति में बहुत ही अधिक महत्व है। नारियाँ इस अवसर पर देवी-देवताओं से अपने पुत्र की रक्षा की कामना करती हैं तथा नेग आदि बांटती हैं। “महाकवि कालिदास ने रघुवंशम महाकाव्य में मुंडन संस्कार का उल्लेख किया है। …………………बालक के जन्म के पहले, तीसरे या सातवें वर्ष में ही इस कार्य को सम्पादित किया जाता है। उसमें अधिक विलम्ब करना अनुचित माना जाता है।”3
जन्म के पश्चात विवाह मनुष्य का महत्वपूर्ण संस्कार है। विवाह स्त्री-पुरुष का वह पारस्परिक सम्बन्ध है, जो धर्म और नियमों से आबद्ध है। हिन्दू जाति में विवाह एक धार्मिक प्रथा के रूप में प्रचलित है। “ब्रज में ही नहीं सम्पूर्ण भारतीय समाज में मानव के विविध संस्कारों में जन्म संस्कार के उपरांत विवाह संस्कार अति महत्वपूर्ण संस्कार है। ब्रज लोक-जीवन में इस महत्व के अनुसार ही एक लौकिक अनुष्ठान का प्रभाव सम्पूर्ण वातावरण पर छा जाता है। यही प्रभाव समस्त वातावरण में उत्साह, उमंग और उल्लास भर देता है।”4
भाँवर आदि के कार्यक्रम में स्त्रियाँ मुक्त कंठ से वर या उसकी बरात को गाली या गारी अपने गीतों के माध्यम से देती हैं-
                      “मेरौ पातरिया सौ दुल्हारे मुरलि रह्यौ 
                       मेरौ बिन झग्गा ऐ आयौ रे, मुरलि रह्यौ 
                       तेरी दादी ने बजजा यारू न कीयो रे मुरलि रह्यौ मेरौ
                       तेरी मइयों ने सूजी यारू न कीयो रे मुरलि रह्यौ मेरौ।”5 
 
धार्मिक लोकगीत, ऋतु-गीत, जाति-गीत भी ब्रज में हर्षोल्लास के साथ गाये जाते हैं। ब्रज के धार्मिक लोक-गीतों का आरम्भ भादों की श्री कृष्ण-जन्माष्टमी से होता है। इसे ब्रजवासी बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। विभिन्न ऋतुओं में लोक-मानस द्वारा गाये जाने वाले विभिन्न प्रकार के गीत गाये जाते हैं, जो इनके हर्षोल्लास में अभिवृद्धि करते हैं। “ऋतुओं के देश में गीत के मौसम दो ही हैं- वर्षा और बसंत।”6  शरद ऋतु में ‘कतिकी’ और भजन गाये जाते हैं, वर्षा में राँझा और मल्हार। प्रकृति का रम्य संसार मानव को सदैव अपनी ओर आकर्षित करता है। छायावाद के प्रमुख स्तम्भ- जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के यहाँ तो प्रकृति अर्द्धमानवीय और अर्द्धकल्पना के रूप में व्यंजित है। “विश्व में कोई भी देश नहीं है जहाँ प्रकृति मनुष्य के ह्रदय में नव-चेतना का संचार न करती हो। इसी कारण उनके मन में नवीन चेतना जाग्रत होती है, जो गीत का रूप धारण करती है।”7 पूरे बारह महीने बारहमासा गीत गाया जाता है, इसमें पूरे बारह महीने की ऋतुओं की विविधता के साथ वियोगिनी के मन पर पड़ने वाले प्रतिक्रियात्मक प्रभावों का वर्णन एवं चित्रण रहता है। डॉ. सत्येंद्र का मत है- “साहित्य में षट-ऋतु का जो स्थान है, वही लोक काव्य में बारहमासे का माना जाना चाहिए।”8
सामान्यतः गीत सभी जातियों द्वारा गाये जाते हैं परन्तु कुछ ऐसे भी गीत हैं, जिन पर कुछ विशेष जातियों का विशेषाधिकार होता है। इसी कारण इन्हें ‘जाति-गीत’ की संज्ञा दी जाती है। ब्रज की पावन धरा पर भी विभिन्न जातियां निवास करती हैं। ब्रज लोकगीतों में ज़्यादा तो नहीं परन्तु थोड़े लोकगीत मिल जाते हैं, जो इन जातियों से संबंधित होते हैं। उदहारण के रूप में हम जोगियों को ले सकते हैं, जिनका संबंध सम्पूर्ण ब्रज में ‘जाहरपीर’ के गीत गाने से है। इसी प्रकार माली जाति ‘शीतला माता’ के गीत गाती है। इनके अतिरिक्त ब्रज में बाबा जी, नट, भोपा एवं अन्य जातियों के गीत मिल जाते हैं-
                      “झूठा भोजन छोड़ पुजारी, भजि मन सीताराम-सीताराम।  
                       ये दुनियां एक दम का डेरा, छोड़ मुसाफिर रैन बसेरा    
                       जग-जगा अब हुआ सबेरा, जग में लाये मन को घेरा 
                       उठ भज गोविन्द नाम, भजि मन सीताराम-सीताराम।।”9 
 
इस प्रकार भारतीय संस्कारों में ब्रजभाषा के लोकगीतों के महत्व को हम देख सकते हैं। भारत में गर्भाधान से जन्म और फिर मृत्यु तक अनेक संस्कारों का निर्वाह होता है और प्रत्येक संस्कार में ब्रज के लोकगीतों के माध्यम से जन-मानस हर्षोल्लास और शोक आदि मनाते हैं। बच्चे के जन्म के समय जन्मगीत उसके बाद मुंडन गीत, विवाह के अवसर पर विवाह गीत, हल्दी के गीत, भांभर के गीत, गारी के गीत भी प्रचलित हैं। इनके अतिरिक्त ब्रजभाषा के धार्मिक लोकगीत, ऋतु-गीत, जाति-गीत आदि ब्रजभाषा में गाये जाते हैं, जिनका भारतीय संस्कारों में विशेष महत्व है। भारत में इन गीतों के बिना कोई भी संस्कार अधूरा-सा प्रतीत होता है।
 
 
 
 
 
सन्दर्भ-
1. उद्धृत- डॉ. कुन्दनलाल उप्रेती, लोक साहित्य के प्रतिमान, प्रथम संस्करण 1971, भारत प्रकाशन मंदिर, अलीगढ़, पृ. 262 
2. उद्धृत- डॉ. हरिसिंह पाल, ब्रज लोक-काव्य:सामाजिक सन्दर्भ, संस्करण 2005, नीरज बुक सेंटर, पृ. 139
3. कालिदास, उद्धृत- डॉ. इंदु यादव, लोक साहित्य, प्रथम संस्करण 2004, साहित्य रत्नालय, कानपुर, पृ. 42
4. डॉ. हर्षनंदनी भाटिया, ब्रज संस्कृति और साहित्य, प्रथम संस्करण 1995, ज्ञान गंगा, दिल्ली, पृ. 162
5. उद्धृत- डॉ. मालती शर्मा, ब्रज के लोक संस्कार गीत, प्रथम संस्करण 2009, अनुभव प्रकशन ग़ाज़ियाबाद, पृ. 254
6. डॉ. हीरालाल तिवारी, गंगा घाटी के गीत, प्रथम संस्करण 1980, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, पृ. 37
7. डॉ. इरशाद अली, मुस्लिम लोकगीतों का विकासात्मक अध्ययन, प्रथम संस्करण 1985, अनुभव प्रकाशन, कानपुर, पृ. 201
8. डॉ. सत्येंद्र, लोक-साहित्य विज्ञान, प्रथम संस्करण 1962, शिवलाल अग्रवाल एंड कंपनी (प्रा.लि.), आगरा, पृ. 138
9. उद्धृत- डॉ. शिवचंद प्रसाद, ब्रज एवं भोजपुरी लोक साहित्य की लोक मूलक सांस्कृतिक चेतना का तुलनात्मक अध्ययन, साहित्य संस्थान, ग़ाज़ियाबाद, पृ. 110

- आज़र ख़ान