प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी-मार्च 2019 (संयुक्तांक)
अंक -50

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

लेख

ग़ज़ल का दूसरा नाम ही बशीर बद्र है


बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है तेरी महफिल कभी ऐसी तो न थी


बहादुर शाह ज़फ़र की ये ग़ज़ल मैंने कई बार सुनी। सुनने में बहुत अच्छी लगती थी मगर समझ में ये न आता था कि आख़िर बात करनी मुश्किल क्यों हो गयी। जैसे मर्जी वैसे कह दो! गद्य में कहो चाहे पद्य में।
पर बहुत बार सुनते-सुनते समझ गयी कि ज़फ़र को प्यार हो गया है किसी से और ये बात कहने में उन्हें बहुत मुश्किल हो रही है। ख़ास बात को कम शब्दों में कहना मगर एहसास गहरे तक करवाना! काम मुश्किल तो है ही। और ये काम हल किया उन्होंने शायरी में। शायरी पढ़ना तो आसान है लेकिन समझना कभी-कभी मुश्किल हो जाता है और लिखना तो और भी मुश्किल।


मैंने लिखने की कोशिश तो नहीं की, पर पढ़ने की कोशिश ज़रूर की। इसी कोशिश का नाम है- फ़ैज़, फ़राज़, ज़फ़र, दाग़, मीर, मोमिन, ग़ालिब, जॉन एलिया, मोहसिन भोपाली और परवीन शाकिर भी।
फ़ैज़ अहमद 'फ़ैज़' को मैंने तब पढ़ा, जब सुना- 'मुझसे पहली-सी मुहब्बत मेरे महबूब न माँग' मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ की आवाज़ में।
छोटी-सी नज़्म क्या है कि किताब-सी पूरी दास्तान मालूम होती है। इश्क़-सा पूरा सुकून दिल को बख्शते हुए जब फ़ैज़ आख़िरी की तरफ बढ़ते हुए कहते हैं-


जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ बाज़ार में जिस्म
खाक़ में लिथड़े हुए खून में नहलाऐ हुए


तो याद आते खुशवंत सिंह की बंटवारे वाली 'ट्रेन टू पाकिस्तान' के फड़फड़ाते हुए पन्ने सीना चाक कर देते हों जैसे।

हम देखेंगे
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिसका वादा है
जो लौह-ए-अज़ल में लिखा है


जैसी हुकुमत को आईना दिखानी वाली कई नज़्मों और तरानों के कारण अक्सर पाकिस्तान जेलों में आना जाना लगा रहता था। ऐसे ही जब जेल में रहते हुए उन्होंने सुना कि मैडम नूरजहाँ ने उनकी नज़्म 'मुझसे पहली-सी मुहब्बत...' इतनी ख़ूबसूरती और शिद्दत से गायी है कि हिन्दुस्तान-पाकिस्तान में हर तरफ इस नज़्म की धूम मच गयी है तो जेल से छूटकर वो सीधे मैडम नूरजहाँ से मिलने उनके घर पहुँच गये। नूरजहाँ के बारे में सब जानते थे कि बिना मेकअप वो किसी भी मुलाकाती से नहीं मिलती। दरबान ने जब कहा कि मैडम! आपसे मिलने कोई फ़ैज़ अहमद आये हैं। तब नूरजहाँ ख़ुद कहती हैं कि फ़ैज़ नाम सुनते ही वो जैसी थी, उसी हाल में बिना सजे-संवरे, यूँ ही खुला सिर बिना दुपट्टे  के नंगे पाँव भागती हुई ख़ुशी में किस कदर फ़ैज़ साहब से लिपट गयी थीं कि इतने बड़े शायर ख़ुद उनसे मिलने आये हैं। जबकि इससे पहले कभी दोनों ने एक-दूसरे को देखा भी न था।

हो भी क्यों न ऐसा! ज़मीं से जुड़े मगर फ़लक तक पहुँच रखने वाले इस महबूब शायर से मिलने के लिए किसी सजावट की ज़रूरत क्या भला!
फ़ैज़ साहब की तरह ही पाकिस्तान के अहमद फ़राज भी उर्दू अदब का सबसे बुलंद सितारा बन कर उभरे। उनके कई शेर, कई नज़्में मुंहजुबानी याद हैं मुझे। क्या-क्या जो लिखूं? मगर फिर भी लिख ही देती हूँ कि बहुत पसंद है अहमद फराज साहब की ये नज़्म कि-


कि वो जो रास्ते थे वफ़ा के थे ये जो मंज़िलें हैं सज़ा की हैं
मेरा हमसफर कोई और था मेरा हमनशीं कोई और है


इसी में वो लिखते हैं कि- 'मेरे जिस्मो-जां में तेरे सिवा नहीं कहीं कोई और है'। मुझे फिर भी लगता है इस तरह कि कहीं-कहीं कोई और है।
हो उनकी मशहूर ग़ज़ल 'रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ' या कि फिर 'सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं', इतनी लाजवाब कि हम बार-बार पढ़ के देखते हैं।
माशाअल्लाह क्या लिखा है!


अभी तलक तो न कुंदन हुए न राख हुए
हम अपनी आग में हर रोज़ जल के देखते हैं


और फ़राज़ के साथ-साथ हम फ़रहत शहज़ाद को भी देखते हैं, जिनकी शायरी की कोंपले जब फूटती हैं तो 'अब शहजाद ये झूठ न बोलो वो इतना बेदर्द नहीं" वाला 'नासमझ' भी समझ जाता है कि -

क्या टूटा है अंदर -अंदर, क्यों चेहरा कुम्हलाया है

चलो दिल टूटे तो टूटे मगर देखिये आह भी कितनी अदब से निकलती है शाइरों की!
अदा देखिए ना अकबर इलाहाबादी की।  जो कहते हैं कि-


आह जो दिल से निकाली जायेगी
क्या समझते हो ख़ाली जायेगी


इन्हीं इलाहाबादी साहब का एक और शेर मुझे बेहद पसंद है -

खेंचो न कमानों को न तलवार निकालो
जब तोप मुकाबिल हो अख़बार निकालो


इलाहाबादी तो जम रहा है लेकिन बिहारी भी शायर हो सकते हैं ,ये सच में मुझे इल्म न था और यकीं भी नहीं पर जब मैंने श़ाद अज़ीमाबादी को पढ़ा तो लगा कि सबसे करीबी और बेहतरीन बात तो वही कह गये हैं कि -

ढ़ूंढ़ोगे अगर मुल्कों-मुल्कों मिलने के नहीं  नायाब हैं हम
ताबीर है जिसकी हसरत-ओ- ग़म, ऐ हमनफ़स वो ख्वाब हैं हम


अब कुछ ख्वाब से लगते नामों को भी तब मैंने पढ़ा है । मोहसिन भोपाली की ग़ज़ल -"चाहत में क्या दुनियादुरी इश्क में कैसी मजबूरी" जब मैंने सुनी गुल बहार बानो की आवाज में तो सोचा जानें और क्या -क्या कमाल लिख गये हैं ये  हमारे पढ़ने के वास्ते।

मैं लफ्जों के असर का मो'जिजा हूँ
मुझे देखो मुजस्सम इक दुआ हूँ

लिखने वाले मोहसिन साहब ने ये भी लिखा था - मैं छोटों में बहुत छोटा हूँ लेकिन बड़ों के दरमियां सबसे बड़ा हूँ

सच लगा जब कहते हैं-

यूँ ही ये शाख से पत्ते गिरा नहीं करते
बिछड़ के लोग ज़्यादा जिया नहीं करते


ऐसी ही शायरी का सच रहा होगा जो जॉन एलिया और परवीन शाकिर जल्दी दुनिया छोड़ गये। मगर जितना भी लिख गये, दिलों में रह जाने के लिए बहुत लिख गये। जॉन एलिया के एक शेर पर तो इश्क की जान ही टिकी हो जैसे-

ये मुझे चैन क्यों नहीं पड़ता
एक ही शख्स था जहान में क्या


इस जहान के अलावा आसमां के लिए भी है कुछ कि-

यूँ जो तकता है आसमान को तू
कोई रहता है आसमान में क्या


इन सभी शायरों के कलाम को हमने लगभग किसी न किसी फ़नकार की आवाज़ में सुना ही है। लेकिन वो शायर जिनकी ग़ज़लों को बेश़क जगजीत सिंह, हरिहरन और भी न जाने किस-किसने आवाज दी है, पर यकीन मानिए उनकी अपनी आवाज़ और तरन्नुम के सिवा हमें किसी और की आवाज़ में सुनना गवारा न हुआ उन्हें ग़ज़ल की दुनिया में डा.बशीर बद्र साहब कहा जाता है।


8-10 साल की उम्र में भी हम रात 1-2 बजे तक जाग लिया करते थे दूरदर्शन पर उनका मुशायरा सुनने। पापा साहित्यिक अभिरूचि के व्यक्ति हैं। कवि-सम्मेलन, मुशायरा वगैरह सुनने का  बहुत शौक है उन्हें। लेकिन उनके साथ-साथ इतनी छोटी उम्र में ही मैं कब गीत, कविता, शायरी, ग़ज़ल सुनना पसंद करने लगी, मुझे पता न चला।
फिर तो गोपालदास नीरज, बालकवि बैरागी, हरिओम पंवार, सुरेश नीरव, अंबर खरबंदा जैसे कई नामचीन शायरों को रूबरू उनका कलाम पेश करते हुए भी सुना। लेकिन अफ़सोस कि अपने पसंदीदा हरदिल अजीज शायर बशीर बद्र साहब को रूबरू न सुन पाई।


चलो ख़ुशनसीबी फिर भी कि देश-विदेश में उनकी शिरकत वाले मुशायरों की रिकार्डिंग उपलब्ध है। कितनी-कितनी बार सुनती हूँ, देखती हूँ कि किस तरह उनका वक्त, उनका कलाम पूरा होने के बाद भी श्रोताओं की फरमाइश पर उन्हें दुबारा-दुबारा बुलाया जाता था और तरन्नुम से पढ़ने की तो विशेष फरमाइश की जाती थी। क्या दीवानगी थी सुनने वालों में उनके वास्ते हर जगह। हिन्दुस्तान, पाकिस्तान, दुबई, लंदन, कनाडा दुनिया के हर कोने में जहाँ-जहाँ मुशायरे होते हैं वहाँ-वहाँ हर तरफ।
मेरे दिल के सबसे करीब बशीर साहब की शायरी। करीब क्या! यूँ कहिये इश्क है मुझे उनकी शेरो-शायरी से। क्योंकि मेरी जिंदगी का हिस्सा, मेरे दिलो-दिमाग पर गहरा हक रखने वाली मेरी पसंदीदा चीज़ों पर उन्होंने ही सबसे बेहतरीन लिखा है।


फूल, परिंदे, बगीचा, तितली, तारा, चांद, जुगनू तो हमेशा से ही अच्छे लगते हैं, पर पतझड़ भी भाने लगा जब उन्होंने लिखा कि-

नाम उसी की नाम सवेरे-शाम लिखा
शेर लिखा या ख़त उसको गुमनाम लिखा
उस दिन पहला फूल खिला
पतझड़ ने जब पत्ती -पत्ती जोड़ के तेरा नाम लिखा


सच में मुझे भी ऐसा ही लगा जब उन्होंने लिखा-

मुझे यूँ लगा कि खामोश खुशबू के होंठ तितली ने छू लिये
इन्हीं ज़र्द पत्तों की ओट में कोई फूल सोया हुआ न हो


उनके तरन्नुम का ही कमाल है कि बिना बात के भी लहराती हो  गुड़हल की कली चाहे,पर दिल से निकलता है-

तुझे भूल जाने की कोशिशें कभी कामयाब न हों सकीं
तेरी याद शाखे गुलाब है जो हवा चली तो मचल गयी

आसमान में शाम को घर लौटते परिंदो पर वो लिखते हैं- 

कोई नगमा धूप के गाँव-सा, कोई नगमा शाम की छाँव-सा
ज़रा इन परिंदो से पूछना ये कलाम किसका कलाम है


फूल,परिंदे और गाँव पर  ग़ज़ल का कहीं भी  किसी और शायर से न सुना हुआ न कहा हुआ बशीर साहब का ये  लहज़ा कितना नया - नया ! तब जबकि वो ऐसे शहर के रहवासी हैं जहां के लिए वो लिखते हैं-

है अजीब शहर की जिन्दगी न सफर रहा न क़याम है
कहीं कारोबार-सी दोपहर कहीं बदमिज़ाज-सी शाम है

शायर का दिल है भई ! जब महसूस की होंगी जिन्दगी की तमाम दुश्वारियां तभी तो खयाल आया होगा-

मैं तमाम तारे उठा-उठा के गरीब लोगों में बाँट दूँ
कभी एक रात वो आसमां का निजाम दें मेरे हाथ में


और इसी संवेदनशील नाजुक दिल शायर का मेरठ में जब दो बार घर जला दिया गया तो बेखौफ कहा उन्होंने-

बड़े शौक से मेरा घर जला कोई आँच तुझपे न आयेगी
ये जबां किसी ने खरीद ली ये कलम किसी का गुलाम है


सियासतें ही हैं जो सिर्फ कागज - कलम से मतलब रखने वाले  ज़हीन लोगों को भी मजहबों में तौलकर देखती है ।
लिखते हैं वो ऐसी ही सियासत पर -


वही तख्त है वही ताज है वही ज़हर है वही जाम है
ये वही ख़ुदा की ज़मीन है ये वही बुतों के निजाम हैं


सियासत पर लिखा तो सूफीयाना अंदाज कैसे अलहदा रह सकता है ?  सच लिखते हैं कि -

मीर,कबीर ,बशीर इसी मकतब के हैं
आ दिल के मकतब में अपना नाम लिखा


किसे कहा जाने कि-  

यूं ही बेसबब न फिरा करो , कोई शाम घर भी रहा करो
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है उसे चुपके-चुपके पढ़ा करो


लेकिन अपने लिए कहते हैं कि -

मुझे खुदा ने ग़ज़ल का दयार बख्शा है
ये सल्तनत  मैं मुहब्बत के नाम करता हूँ

ग़ज़ल का दूसरा नाम ही बशीर बद्र है। हम कितना भी औरों पर पढ़ लें, लिख लें मगर उन पर कुछ न लिख पायेंगे सिवाय उन्हीं की लिखी एक लाइन के कि-
कोई एक मिसरा न कह सका कभी उस ग़ज़ल के जवाब में

बशीर साहब के अलावा बेशक़ लिखने वाले और भी हैं। क्योंकि जब तक दुनिया है, इंसान हैं और भावनाएँ हैं तो शायरी लिखी ही जायेगी। लिखें,  ज़रूर लिखें मगर ऐसा जो दिलों में हलचल मचा दे, दिमाग को दर्द न दे। ज़रूरत न होने पर भी बेवजह प्रभाव उत्पन्न करने की नीयत से उर्दू, फ़ारसी के क्लिष्ट शब्द न ठूंसे जायें। शेर का मतलब बूझने के लिए हर्फ़-हर्फ़ का अर्थ न पूछना पड़े।


प्रताप सोमवंशी कहते हैं-

मिलने की तुझसे कोई सूरत तो बची रहे
बेहतर है दोनों ओर ज़रूरत बची रहे


ज़रूरत तो हमेशा है पढ़ने की, बशर्ते लिखा जाये दिल से 'जो' असर करे दिमाग पर।


- प्रतिभा नैथानी
 
रचनाकार परिचय
प्रतिभा नैथानी

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