प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी-मार्च 2019 (संयुक्तांक)
अंक -49

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

खेत के धोरे पर खड़ी साँवली लड़की

प्रिय!
आज से कुछ ही दिन पहले
शाम को इसी समय
मेरे सपनों में आई थी
खेत के धोरे पर खड़ी साँवली लड़की

चटक गुलाबी कुर्ता
आसमानी सलवार पहनी हुई
काले व
थोड़े-थोड़े भूरे बाल
उसके कन्धों पर
रह-रहकर हवा संग लहराते,
खेत के मध्य से होकर
कहीं दूर तलक
जाती हुई राह को
उसकी नीली आँखें निहारती रहतीं

चुन्नी के किसी एक छोर पर
बड़े ही प्यार से
मंद-मंद मुस्काती हुई
तर्जनी व अँगूठे से
छोटी-सी गाँठ लगाकर
सफ़ेद दांतों तले दबाती,
छोटे बच्चे के मानिंद
आसमान की ओर
मुट्ठी भर-भरकर रेत उछालती,
भेड़ों के गलों में
बंधी घंटियों की कर्णप्रिय ध्वनि के साथ
रामू चंदणा के गीत गुनगुनाती
बाँहें फैलाकार झूम-झूमकर नाचती
मेमने को अपनी बाहों में भरकर चूमती

खेजड़ी से सांगरी तोड़ती हुई
हाथों में छड़ी घुमाती हुई
खेत के धोरों, भेड़ो व
हरियल घास से बातें करती
जोहड़ी के किनारे बैठकर
औंक भर-भरकर पानी पीती
मानों बुझा लेना चाहती हो
महीनों से जल रही विरह आग को,
पानी में घुटनों तक पाँव डुबोकर
व कुछ कंकड़ लेकर
एक-एक कर
आहिस्ता से जोहड़ी में फेंकती
भौंहे चढ़ाती
आसमान देखती
और इस तरह से कही शून्य में खो जाती

शाम ढलते-ढ़लते
वो अपने हाथों में
थैला, टिफिन, पानी की बोतल
व उधड़े हुए सपनो की गठरी लिए
रेवड़ को टोरती हुई
भारी कदमों से चलती हुई
इन धोरों के बीच कही ओझल हो गई

मेरा सपना टूटा
आँखें खुली
काली रात व
सन्नाटे के सिवाय कुछ भी तो नहीं था

उसके बाद
मेरे रंगीन सपनों में वो कभी नही आई
हाँ, आज कँवारे काग़ज़ पर
उसके नाम की
एक उदासी भरी कविता लिख देता हूँ!


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तारों पर थिरकती उँगलियों की पीड़

कामयचा बजाते-बजाते
मेरी उँगलियों के पेरवे
घिस गए हैं
लोकगीत गाते-गाते
मेरे जवान मधुर कंठ
वृद्ध व रसरहीत हो गए हैं
फिर भी-देर रात तक
लोकगीतों की धुन तैयार करता हूँ

सुबह होने से पहले-पहल
स्नान पानी कर
सिर पर
तुम्हारी यादों की पगड़ी बाँधकर
उस धोरे पर जा बैठता हूँ
जिस पर-
कभी हम दोनों एक साथ
ढ़ोला मारू के दोहे गाया करते थे

इन मखमल जैसे धोरों पर
गीतों के साथ-साथ
हमारा प्यार फला-फूला था
अब इन पर
तुम्हारे पदचिन्ह रह गए है
और उस खेजड़ी की डाली पर
मेरी लम्बी उम्र के लिए
तुम्हारा बाँधा हुआ
बालों का आटलिया लटक रहा है
अब उसका रंग
बहुत फिका पड़ चुका है
मुझे मालूम है
मेरे मरने के बाद
यह भी टूटकर नीचे गिर जाएगा

जेब से तुम्हारी तस्वीर निकालकर
उसे अपलक निहारता हुआ

कामयचा बजाता हुआ
मधुर गाने की कोशिस करता हूँ
पर तुम्हारे बगैर
गाने में नाकाम-सा रहता हूँ

तारों पर थिरकती उंगलियों की पीड़
लोकगीतों की अथाह गहराई
और टप-टप गिरती आंसुओं की बूँदें
इन सब को पर्यटक कहाँ समझ पाते है!


- संदीप पारीक निर्भय
 
रचनाकार परिचय
संदीप पारीक निर्भय

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