सितम्बर 2015
अंक - 7 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

चीनी कितने चम्मच

मैंने झुंझलाते हुए रिजर्वेशन चार्ट में अपनी सीट देखी, आदत से मजबुर अपने बगल वाली सीट के यात्री का विवरण भी देखने लगा , नाम : रूचि मिश्रा, उम्र , 27 साल. सोचा चलो सफर अच्छा रहेगा, " रूचि मिश्रा" कुछ सुना सा नाम लगा, फिर खुद पर ही हँसते हुए सोचा कि मुझे तो सारे भारत भर की लडकियाँ जानी पहचानी लगती हैं.
दिल्ली वाले मामा ने मेरी शादी के लिए एक लड़की देखी थी और चाहते थे कि मैं आ कर लड़की देख लूँ. माँ की 3 दिन की भूख हड़ताल और पापा के असहयोग आन्दोलन के बाद मैने अपने हथियार डाल दिए थे औरआज कानपुर से दिल्ली जा रहा था. लड़की देखने के बाद कौन-कौन सी कमियाँ निकाल कर रिश्ते के लिए मना करना है उसके 26 बहाने अभी तक मैं सोच चुका था, लगभग 18 लड़कियों को मैं ऐसे ही मना कर चुका था ,
लड़की देखने की औपचारिकता के बाद दिल्ली वाले दोस्तों के साथ मस्ती का फुल प्लान रेडी था.


खैर! ट्रेन चलने के 4 मिनट पहले मुझे अपनी बगल की सीट के लिए आती जो लड़की दिखी, उसे देख कर मैं चौक गया. अरे, ये तो वही है जिसने कल " Kanpur Women's Bank " का उद्घाटन किया था और बतौर पत्रकार मैंने उस कार्यकम को कवर किया था. हाँ, रूचि मिश्रा नाम ही तो था, बैंक ऑफ विमेंस की Zonal Head .काफी अच्छा बोली थी ये कल, मै काफी प्रभावित हुआ था इनके विचारों से ,मैंने ध्यान से रूचि को देखा ,हल्का गोरा रंग माथे को ढ्पाते लम्बे बाल, सफेद कुर्ती, नीली जींस ,माथे पर पेंट की छोटी-सी पीली बिंदी और कोई मेकअप नहीं कोई दिखावा नहीं, आँखों में जिंदगी की वो चमक जो किसी को भी जीना सिखा दे, उसकी सुन्दरता उत्तेजना नहीं, शांति देने वाली थी.


जैसे-जैसे ट्रेन की रफ्तार बढ़ रही थी हमारी बाते भी रफ्तार पकड रही थी, मेरे अंदर का पत्रकार जग गया था और वो रूचि से सवाल पर सवाल किये जा रहा था .
" तो रूचि जी ! आपने अब तक शादी क्यों नहीं की ..? " मैंने बरबस ही सवाल किया .
जवाब देने की जगह रूचि कुछ पलो के लिए मेरे चेहरे को देखती रही जैसे कुछ तलाश रही हो, मुझे लगा गलत सवाल कर लिया है
" मेरा नाम भले ही रूचि हो , लेकिन कभी अपनी रूचि का कुछ नहीं कर पायी, अपने लिए कुछ अपने मन का करना था , इसलिए नहीं की शादी " एक चुप्पी के बाद रूचि ने जवाब दिया .
"मतलब, मैं समझा नही ..? " मैंने उलझन भरे लहजे में पूछा.


रूचि ने कहना शुरु किया " मैं उत्तर प्रदेश के छोटे से जिले से हूँ, छोटे शहरों की लड़कियों को बड़े सपने देखने का हक नही होता, मुझे भी नही था, माँ को 3 बेटियाँ थी , ये उनका वो गुनाह था जिसमें उनकी कोईं गलती नहीं थी, फिर भी उनको हरदम इसकी सजा मिली. हमारे यहाँ लडकियाँ को इसलिए पढ़ाया जाता है ताकि वो पति के लिए तकिये पर " तुम कब आओगे " काढ़ सके, मुझे मैथ पसंद थी लेकिन घर वाले चाहते थे मै होम साइंस पढ़ूँ  मुझे ऊँची कूद पसंद पर सब चाहते थे कि मै लेडिज संगीत में ढोलक बजाना सिखु, मेरे कुछ सपने थे जिन्हें मै पूरा करना चाहती थी ,और घर वाले शादी करके बोझ से छुटकारा "


" ह्म्म्म्म ..." मैंने एक लम्बी साँस ली और पैंट्री वाले से 2 चाय लाने के लिए बोला ,
" फिर ? "
" फिर क्या ? हर हफ्ते नीलामी वाले आने लगे, रुचि हल्की मुस्कान के साथ बोल रही थी , " जब लड़के वालो को आना होता था तो बेडशीट बदली जाती थी, कमरों के परदे बदले जाते थे ,काश हम खुद को भी बदल पाते ,बोन चाइना वाले कप निकाले जाते ,और एक लाल साड़ी में मुझे पैक करके उनके सामने बिठा दिया जाता , माँ पापा मेरे उन गुणों का बखान शुरू कर देते जो मुझेमें है मुझे पता भी नही था, तरह-तरह के सवाल होते, पसंद-नापसंद पूछी जाती ( काश कभी कोई मेरी पसंद भी पूछता ) किसी को शाकाहारी बहू चाहिए थी तो किसी को मांसाहारी, किसी हो घर सम्हालने वाली तो किसी को नौकरी वाली, मोल भाव होता( हर लड़के की एक market value है ये मुझे पहले नहीं पता थी ) और इन सब के बीच में, मैं हो कर भी नही होती थी, मुझे इस नीलामी में सिर्फ 5 शब्द बोलने की इजाजत थी ताकि किसी को ये न लगे कि मै गूंगी तो नही, जानते हो वो 5 शब्द क्या थे .? "

 

" नहीं आप बताये ? " मै खुद को अजीब-सी बैचेनी में घिरा पा रहा था, उन दर्जनों लडकियों के चेहरे मेरी आँखों के सामने आ रहे थे जिन्हें मैंने किन्ही-न-किन्ही वजहों से मना कर दिया था .
" चीनी कितने चम्मच लेगे आप ? " रूचि ने मुस्कुराते हुयी बोली ?
" मतलब " ??
" चीनी कितनी चम्मच लेगे आप " यही वो 5 शब्द थे जो मुझे अपनी नीलामी के दौरान बोलने थे, " रूचि ने मेरी आँखों में देखते हुए बोला .
"...जी " मै बस इतना ही बोल सका
" शुरू में कुछ दिन तो सब साथ थे ,फिर ..
देखे जाने के अगले दिन तक कोई-न-कोई नयी वजह आ जाती थी, जिस की वजह से रिश्ता नही हो सकता था, हर बार रिश्ता टूटने के बाद पिता जी, माँ को शराब पी कर पीटते थे , जिस रिश्ते के होने की जितनी उम्मीद होती उसके न होने पर माँ को मार उतनी ही ज्यादा पड़ती थी , पिता माँ को हम सब के बकरी कह के बुलाते थे क्योंकि उनका वक्षस्थल छोटा था, इसलिए वो उन्हें कभी सम्पूर्ण स्त्री लगी ही नही "

 

मैं नि:शब्द-सा सिर्फ उसे सुन रहा था ,शायद उस से नजरे मिलाने की हिम्मत नही थी मुझ में. मेरे सारे सवाल दम तोड़ चुके थे।
एक छोटी चुप्पी के बाद रूचि ने फिर बोलना शुरू किया " जब 23वी बार भी मेरी नीलामी असफल रही तो पिता जी ने गुस्से में माँ का सर फोड़ दिया , मुझे भी मारा जिसका निशान अभी भी मेरे चेहरे पर है , " मैंने न चाहते हुए भी उसके चेहरे को देखा, माथे पर एक चोट का निशान था ,जिसे रूचि ने बहुत सफाई से बालो से छुपा रखा था . " ये चोट तन से ज़्यादा मन पर थी , मै माँ जैसी जिंदगी नही गुजरना चाहती थो,मै अपने कल को किसी और के हाथो में नही दे सकती थी, अब खुद को और नीलाम नही करवा सकती थी, मैंने घर छोड़ने का फैसला किया और उसी दिन उस घर को हमेशा के लिए छोड़ दिया. जो हूँ  आपके सामने हूँ  .. " आँखों में हल्की नमी के साथ रूचि ने अपनी बात खत्म की.

 

2 मिनट की चुप्पी के बाद मैंने पूछा " और माँ ?"
वो भरे गले से बोली " बस यही गम है कि मै माँ को अपने साथ न ला सकी, मैंने उन से कहा था, मेरे साथ चलो पर अपना घर छोड़ कर आने को तैयार न हुयी ,... अपना घर जिसने उन्हें कभी अपना माना ही नही .."

 

मुझे लग रहा था कि मेरे सामने रूचि मिश्रा नहीं एक आइना रखा है जिसमें अपना वो रूप देख रहा हूँ , जिस से मैं  बिलकुल अनजान रहा , मैंने मामा को sms कर दिया था. मैं  लड़की नही देखना चाहता, मुझे अभी शादी नही करनी और अब मैं  किसी लड़की की नीलामी में शामिल नही होना चाहता ! पैंट्री बॉय चाय दे गया था, चाय बनाते हुए अचानक से मेरे मुँह से निकला " चीनी कितनी चम्मच लेंगी आप ...? "


- मृदुल पाण्डेय

रचनाकार परिचय
मृदुल पाण्डेय

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कथा-कुसुम (2)