प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी-मार्च 2019 (संयुक्तांक)
अंक -47

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

अमरकांत के उपन्यास साहित्य में यथार्थ
- मधु मीणा


पूर्वी राजस्थान का शहर बलिया। इस जिले ने हिंदी समाज को परशुराम चतुर्वेदी और हजारी प्रसाद जैसी विभूतियां दी। यहीं 1857 के विद्रोह के नायक मंगल पाण्डे का जन्म हुआ। 1942 के आंदोलन में चितू पाण्डे के नेतृत्व में बलिया की क्रांतिकारी भूमिका रही। ऐसे ही महान शहर में अमरकांत का जन्म बलिया के भगमलपुर गांव में सीताराम वर्मा और अनंती देवी के घर 1 जुलाई 1925 को हुआ।
”पत्रकारिता से अपने कैरियर की शुरूआत करने वाले अमरकांत की लेखनीय संवेदना स्वाधीनता संग्राम के अनुभव से प्रौढ़ हुई थी। आगरा से प्रकाशित ‘सैनिक’ में पत्रकारिता के दौरान ही उनकी भेट रामविलास शर्मा से हुई। प्रलेस की गतिविधियों ने उनके लेखकीय सरोकारों को सुस्पष्ट दिशा और तीक्ष्णता प्रदान की। प्रलेस की गोष्ठी में ही उन्होंने अपनी पहली रचना इंटरव्यू सुनाई।“ उनकी संवेदना ‘नई कहानी’ आंदोलन से जुड़ी हुई है। उनकी कहानियाँ और उपन्यास मध्यववर्गीय जीवन के संघर्षों और पीड़ा का प्रामाणिक आख्यान है। ”अमरकांत की रचनाशीलता की उत्तरजीविका इसी तथ्य से स्वयंसिद्ध है कि उनका महत्त्व क्रमशः प्रमाणित और स्थापित हुआ। इसकी परिणति अन्ततः उनको ‘इन्हीं हथियारों से’ के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार की प्राप्ति के रूप में हुई।“


पिछड़े और साधनहीन लोगों की उनकी परिस्थितियाँ किस तरह गढ़ती हैं, इसका यथार्थवादी चित्रण अमरकांत के साहित्य में मिलता है। उनके साहित्य में सामाजिक जीवन की गतिशीलता एवं यथार्थवादी प्रेक्षण मौजूद है, जो आदर्शों से अनुशासित भी है। उनका मानना था कि आदर्श यथार्थ के बीच में से आना चाहिए न कि कोरी कल्पनात्मक भावुकता से। प्रेमचंद के यथार्थोन्मुख आदर्शवाद की ओर वे खिंचने लगे थे। उनके साहित्य में यथार्थ और आदर्श के संबंध में यही मत प्रकाशित होता है कि यथार्थ से संघर्ष करते हुए ही आदर्श का निर्माण संभव है।


साहित्य सृजन उनके लिए मनोरंजन का कर्म नहीं बल्कि एक दायित्वबोध और संसंक्ति का मामला रहा है। उन्हें साहित्य क्षेत्र में ज्ञानपीठ साहित्य अकादमी, सोवियत लैण्ड नेहरू आदि कई पुरस्कार प्राप्त हुए। उनकी प्रमुख कृतियां है - ‘जिंदगी और जोंक’, ‘मौत का नगर’, ‘कुहासा’, ‘तूफान’, ‘कलाप्रेमी’, जैसे कहानी संग्रह तथा ‘सूखापत्ता’, ‘आकाश पक्षी’, ‘ग्राम सेविका’, ‘सुखजीवी’, ‘इन्हीं हथियारों से’, ‘सुन्नर पाण्डे की पतोह’ तथा ‘बीच की दीवार’ जैसे उपन्यासों यथार्थ के प्रति जागरूकता तथा ऐतिहासिकता एवं प्रगतिशील जीवनदृष्टि व्यक्त की है।


अमरकांत हिंदी कथा साहित्य के ऐसे विशिष्ट रचनाकार है जिन्होंने अपनी लेखनी से सामाजिक अस्मिता के व्यक्ति और समष्टि तत्त्वों को समायोजित करते हुए सामाजिक यथार्थ को रेखांकित किया है। अमरकांत को प्रगतिशील रचनाकार की द्वन्द्वात्मक दृष्टि प्राप्त थी। अतः अमरकांत ने प्रेमचंद की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए साधारण अंदाज में रचनाएं लिखीं। उनके कथासाहित्य में ग्रामीण और शहरी जीवन की विंडबनापूर्ण स्थिति तथा सामाजिक जन-जीवन की संवेदनात्मक गहराई देखी जा सकती है।
वस्तुतः ‘समाज’ शब्द का प्रयोग विशिष्ट अर्थ में किया जाता है। यहाँ व्यक्ति के बीच पाये जाने वाले सामाजिक सम्बन्धों के आधार पर निर्मित व्यवस्था को समाज कहा गया है। जब असंख्य सामाजिक सम्बन्धों का जाल अनेक रीतियों एवं सामाजिक मूल्यों द्वारा व्यवस्था में बदल जाता है तो उसे समाज कहते है।“ चूंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, साहित्यकार भी समाज का ही एक अंश है और समाज में रहते हुए वह अनेक प्रकार के घात-प्रतिघातों को झेलता हुआ सामाजिक परिदृश्य प्रस्तुत करता है। समाज में घट रही घटनाओं व समस्याओं का यथार्थ चित्रण करना ही साहित्यकार का दायित्व है।


वस्तुतः यथार्थ जीवन की सच्ची अनुभूति है। समाज में व्याप्त बुराईयों, रूढि़यों, कुरूतियों इत्यादि का यथार्थ रूप में चित्रण करना ही सामाजिक यथार्थ का परिचायक है। सामाजिक यथार्थ की मान्यता है कि - ”लेखक समाज विकास की द्वन्द्वात्मक भूमिका को अपनाकर ही यथार्थ चित्रण की ओर अग्रसर हो।“
समाज की यथार्थपरक अनुभूति वैसे तो गद्य की सभी विधाओं में देखी जा सकती है किंतु उपन्यास इसकी अभिव्यक्ति को व्यापक फलक प्रस्तुत करता है। कहा भी गया है कि - ”उपन्यास गद्य की एक विशिष्ट यथार्थ दृष्टि को प्रस्तुत करता है जो उसी की पहुँच में है, काव्य, नाटक, चित्रकला अथवा संगीत द्वारा संभव नहीं।“
”उपन्यास में वर्णित समाज भी मानव समाज होता है, सामान्य मानव की तरह ही उसके पात्र भी उस समाज में अंत क्रियायें करते हैं, संबंधों की स्थापना करते हैं, विभिन्न घात-प्रतिघातों संघर्षों का मुकाबला करते है। उपन्यास का सृष्टा सामाजिक प्राणी होता है और समाज से ही अनुभूतियां ग्रहण करता है। उपन्यास के अस्तित्व का मूल आधार जीवन का पुनर्सजन है। इस प्रकार उपन्यास मानव जीवन और सामाजिक संदर्भो की भावाभिव्यक्ति भी करता है।


अमरकांत का उपन्यास साहित्य आज केे सामाजिक परिदृश्य की विस्तृत झांकी प्रस्तुत करता है। निस्संदेह उनके उपन्यास साहित्य के भीतर से जीवन की यथार्थ धड़कनों को सुना और महसूस किया जा सकता है। उनके साहित्य में रोजी-रोटी तथा प्रेम-कलह की समस्याओं से लेकर सामाजिक बुराईयों की समस्यओं का भी यथार्थ अंकन हुआ है। युगबोध व युग सत्य को अमरकांत ने सदैव प्राथमिकता दी है। समाज के हर तबके के व्यक्ति की आस्थाए-शंकाएँ, आशाएँ-निराशाएँ आदि सब अपने यथार्थ रूप से उभरकर सामने आते है। उनकी रचनाएं मानव-मूल्यों के संरक्षण एवं सामाजिक नव-निर्माण के उत्कृष्ट आकांक्षा की रचनाएं है। उनका उपन्यास साहित्य कल्पना के वायवी वातावरण की संरचना नहीं करता अपितु व्यावहारिक व वास्तविक जिंदगी से उनका सीधा संबंध है। मध्यमवगी्रय तनावों अन्तर्विरोधो एवं संक्रमण की स्थितियों को संवेदना की गहराई से अनुभव कर उन्होंने अपने साहित्य का सृजन यथार्थ के व्यापक स्तर पर किया है।


उन्होंने उपन्यास साहित्य में सामाजिक बुराईयों यथा - छूआ-छूत, जाति-पाति, रूढि़यों, संयुक्त परिवारों का विघटन, रिश्ते-नातों का परिवर्तित रूप, प्रेम-विवाह, अनमोल-विवाह, टूटते दाम्पत्य संबंधों, अनैतिक संबंधों, बाल-विवाह इत्यादि पर दृष्टिपात किया है। अमरकांत के उपन्यास ‘कंटीली राह के फूल’, ‘बीच की दीवार’, ‘काले-उजले दिन’ इत्यादि में इन प्रमुख समस्याओं को उजागर किया है। समाज के धुंधले पक्ष के साथ-साथ समाज के उजले पक्ष को अमरकांत ने अपने साहित्य में स्थान दिया है। आज की नारी समाज में अपनी दिशाओं को खोजती हुई दिखाई देती है। वह अपने प्रति हो रहे शोषण से मुकाबला करती है तथा समाज में अपनी पहचान स्थापित करती है। उनके उपन्यांस ‘ग्राम सेविका’ की ‘दमयन्ती’, ‘सुन्नर पाण्डे की पतोह’ की ‘राजलक्ष्मी’ तथा ‘लहरे’ उपन्यास की ‘बच्चीदेवी’ इसका ज्वलंत उदाहरण है। अमरकांत ने जहाँ एक ओर ‘आकाशपक्षी’ उपन्यास में सामन्ती लोगों की विकृत मनोदशा का यथार्थ चित्रण किया है तो दूसरी ओर ‘इन्हीं हथियारों से’ उपन्यास में साधारण तबके के लोगों द्वारा आजादी की लड़ाई में कूद पड़ने तथा अपनी-अपनी क्षमतानुसार सहयोग करने का यथार्थ वर्णन प्रस्तुत किया है। निःसन्देह अमरकांत के उपन्यास समाज की यथार्थ झांकी प्रस्तुत करने में सफल रहे है।


 

 

संदर्भ सूचि-
1. डाॅ. सरोज सिंह, अमृत लाल नागर की कथा दृष्टि के समाज शास्त्रीय आयाम, पृ.सं.-2, राका प्रकाशन, प्रथम संस्करण-2007, इलाहाबाद-2
2. शिव कुमार मिश्र, यथार्थवाद, पृ.सं. - 67
3. डाॅ. प्रताप नारायण टंडन, हिंदी उपन्यासों में कथा-शिल्प का विकास, पृ.सं. 55, हिंदी साहित्य भंडार, लखनऊ, पृ.सं. 1956
4. डाॅ. सरोज सिंह, अमृत लाल नागर की कथा दृष्टि के समाजशास्त्रीय आयाम, पृ.सं. 12-13
5. डाॅ. ऋषिकेश राय, हिंदी के गोर्की थे अमरकांत (आलेख) से पृ.सं. 117-118, हिंन्दी पत्रिका, छपते-छपते दीपावली विशेषांक-2014


- मधु मीणा
 
रचनाकार परिचय
मधु मीणा

पत्रिका में आपका योगदान . . .
आलेख/विमर्श (1)