प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी-मार्च 2019 (संयुक्तांक)
अंक -49

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

व्यंग्य

मेरी लाइक से उसकी लाइक अधिक क्यों!

सबसे पहली द्विविधा यह आ रही है कलम उठाने में या की बोर्ड पर अंगुलियाँ थिरकाने में कि लाइक को स्त्रीलिंग माना जाए या पुल्लिंग। भाषा के मामले में अपनराम हैं बड़े फिस्सडी। है तो हर मामले में फिस्सड़ी पर अभी यह कमी विशेष रूप से खल रही है। अंग्रेजी और हिंदी की बात क्या करूँ, अपनी मातृभाषा मगही पर भी पकड़ नहीं है मेरी। वैसे एक मामले में मगही मुझे बहुत प्यारी है। उसमें लिंग निर्णय का झंझट नहीं है। हिन्दी में ‘हवा बहता है’ या ‘बहती है’ पर बहस हो सकती है पर मगही में हवा बह हई। झमेला सिर्फ इतना ही नहीं है। हिंदी के शब्दों  को तो फिर भी जान समझ लो तो परेशानी न हो पर दूसरी भाषा के शब्द आ जाएं तो और झमेला। मेरी समस्या फिलहाल यही है।
मेरी साड़ी से उसकी साड़ी सफेद क्यों के तर्ज पर क्या मेरी लाइक से उसकी लाइक अधिक क्यूँ या फिर मेरे लाइक से उसके लाइक अधिक क्यूँ में कौनसा शीर्षक सही होगा।


वैसे झमेला सिर्फ लिंग निर्णय में नहीं है। मात्रा और भांति-भांति उच्चारण वाले अक्षर जैसे न या ण, स, श, और ष में कौन, ई या यी, ए या ये ढेर सारी समस्याएँ हैं। लगा था कि पत्राचार कोर्स से एम. ए. कर लूँ तो शायद समस्या का समाधान हो जाए। अतः हिंदी में एम. ए. किया फिर अंग्रेजी में भी घीच-घाच के कर पाया। संस्कृत में रामः, रामौ, रामाः तथाति तः अंति से आगे लाख प्रयास के वावजूद नहीं बढ़ पाया। वैसे प्रयास कम किया आस ज्यादा लगाए रखा। अतः जैसे ढाक के तीन पात ही होते हैं वैसे ही मेरी स्थिति रह गई। अतः साहित्याचार्यों वैयाकरणों आदि से अग्रिम क्षमा माँगकर आगे बढ़ूँ।

तो मेरी परेशानी यह है कि उसकी लाइक मेरी लाइक से अधिक क्यों? क्यों?? क्यों???
विवेचन करने पर लाइक कम होने के कारण और बढ़ाने के उपाय जो मैं समझ पाया वह निम्नवत हैं-
लाइक के बदले लाइक मिलेगा। सुना है न आपने कि आप दूसरे से जैसा व्यवहार पाना चाहते हैं उससे वैसा ही व्यवहार करें। तो लाइक चाहते हैं तो दूसरों के पोस्ट को लाइक करना शुरु कर दें। तुम एक पैसे दोगे वो दस लाख देगा जैसी बात यहाँ नहीं है तुम सौ लाइक दोगे वो एक लाइक देगा, अतः लाइक की बारिश कर दो माउस या फिंगर टिप से।


इसी तर्ज पर जहाँ तक संभव हो लम्बी और प्रशंसात्मक टिप्पणी लिखें। यदि समय के अभाव से हर आज के हर शख्स की तरह आप भी त्रस्त हैं तो भी हर पोस्ट पर सुंदर, अतिसुंदर, लाजवाब आदि संक्षिप्त टिप्पणी अवश्य लिखें। इससे आपकी गार्ह्यता बढ़ेगी और आपको अधिक लाइक मिलेंगे।
मेरा अनुभव कहता है कि महिलाओं के पोस्ट को लाइक करने की आवश्यकता नहीं, लाइक पाने की प्रत्याशा में। क्योंकि उनकी समझ में लाइक पाना उनका जन्मसिद्ध अधिकार है और वे लाइक के बदले लाइक देने से रहीं। किसी और इरादे से लाइक करते हों जैसे मन में लड्डू फोड़वा कर मन मीठा करने के लिए तो बात अलग है।


हर पोस्ट के साथ अधिकतम लोगों को टैग करें। वैसे कुछ लोग आपको टैगासुर का खिताब देंगे पर इससे विचलित न हों। जिन्हें टैग करेंगे उनमें जो आपको सहन करने वाले होंगे वे लाइक करेंगे, जो सहन करने वाले नहीं होंगे वे अनफ्रेंड कर देंगे। लाइक न करने वाले मित्र से अमित्र भले। मित्रों की संख्या कम से कम पाँच हजार होनी चाहिए। वैसे यह अधिकतम सीमा है इसलिए पाँच हजार की बात की जा रही है। जैसे ही सीमा बढ़े और मित्रों की संख्या बढ़ाएं वैसे ही जैसे सरकारी कर्मचारी सीमा बढ़ते ही ऋण की रकम बढ़वा लेते हैं।

फेसबुक फ्रेंड के मिज़ाज को समझें। कभी-कभी अच्छी बात का भी बुरा प्रभाव हो सकता है। ऐसा मेरा व्यक्तिगत अनुभव है और बगैर कोई फीसलिए आपकोबतारहाहूँ जैसा नेता बिना स्वार्थ के जनता की सेवा करते हैं। एक व्यंग्यकार को मैंने किसी पोस्ट में वरिष्ठ कह दिया था। उसके बाद से उन्होंने मुझसे फेसबुकीय नाता लगभग तोड़ ही लिया है। पहले हर पोस्ट पर सबसे पहला लाइक उन्हीं का आता था। पर पता नहीं वरिष्ठ शब्द से क्या परेशानी हुई उन्हें। नेता कहने पर नेता के अलावा हर आदमी उसे गाली मानता है। कहीं वरिष्ठ संबोधन का ऐसा ही कुछ असर तो नहीं हुआ? वैसे तो कुछ मित्र व्यंग्यकार कहने पर भी नाराज होसकतेहैं। अतः फेसबुकीय मित्र के मिज़ाज को समझकर ही टिप्पणी करें।

दोस्त का दोस्त दोस्त हो या न हो, दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। अतः देख लें कि आपके दुश्मन का दुश्मन कौन है और कितने हैं। फिर उस दुश्मन (हालाँकि फेसबुक में सभी फ्रेंड ही कहलाते हैं या आगे चलकर हो सकता है फ्रेंड के साथ एनिमी बनाने का सुअवसर भी मिले) के पोस्ट पर कड़ी प्रतिक्रिया दें। उसका दुश्मन आपका दोस्त बन जाएगा और आपके पोस्ट को लाइक देगा।
तो सिद्धांत रूप में मैं इन बातों को मानता हूँ। व्यवहार में इन पर अमल करपाऊँ या नहीं यह अलग बातहै।आप भी देख समझ लें।

 


- विनय कुमार पाठक
 
रचनाकार परिचय
विनय कुमार पाठक

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