प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी-मार्च 2019 (संयुक्तांक)
अंक -47

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

यात्रा-वृत्तान्त

शाही वैभव की आलीशान वर्तमान मिसाल 'जयविलास पैलेस'

ग्वालियर, मध्यप्रदेश का ऐतिहासिक व जानामाना शहर,,मेरी अगली मंजिल यहाँ तलवार वाले हनुमान जी पर माथा टेक कर सीधे सिंधिया परिवार की थाती"जयविलास पैलेस" और बाद बाकी जैसे गर्मी का आलम मन बनाये वैसे ही था।
मुरैना से ए.बी.रोड़ (आगरा बाम्बे हाइवे) पकड़ते ही मैक्सिमम 45-50 मिनिट बस । गोले के मंदिर से अंदर प्रवेश करते ही रेलवे व बस स्टेंड से आगे मोती बाग चौराहा लेते हैं और वहाँ से सीधा जयविलास पैलेस । यहाँ का बाह्य मुख्य हिस्सा सिंधिया परिवार ने "सरस्वती शिशु मंदिर "को दिया हुआ है,मेरा विशेष लगाव इसी हिस्से से जुड़ा है...मैंने अपनी 'टीचर्स ट्रेनिंग (वर्ग)यहीं पर रहकर संपन्न करी थी, पूरी कट्टर हॉस्टल वाली दिनचर्या का पालन सुबह 4से योगा से शुरु हुआ करती थी।

मुख्य आगम से भीतर जाते में करीनेदार शांत कालोनी बसी हुई है और कालोनी ख़तम होते ही उल्टे हाथ पर जयविलास महल का मुख्य द्वार और सीधे हाथ पर महल के एक हिस्से (जो तब मेहमान ख़ाना हुआ करता था ) का बदला हुआ फाइव स्टार रूप " ऊषा किरण पैलेस " आपकी जेब गरम है तो आप यहाँ रुक कर शाही भोज का परमानंद ले सकते हैं ।


बहरहाल हमारी मंजिल उल्टे हाथ पर थी महल का प्रमुख द्वार सुरक्षा व्यवस्था से परिपूर्ण, हमने गाडी यहीं बाहर पार्क की और चल दिये भीतर दोनों तरफ विशाल क्षेत्र में फैला सुंदर बागीचा और पुरातन संरक्षित धरोहरें,,, मुख्य भवन से बाहर महाराजा माधवराव सिंधिया द्वारा खरीदी गयीं 'रोल्स-रायस' कारों को शीशे के केबिन में रखा गया है व उनकी जानकारी दी गयी है। गेट के ठीक सामने एक तोप लगायी गयी है। पास ही महल के निर्माण वर्ष को प्रदर्शित करता एक बोर्ड लगा है। प्रवेशद्वार के एक तरफ ग्रेनाइट पत्थर पर जय विलास पैलेस 1874 लिखा हुआ है और दूसरी तरफ ग्रेनाइट पत्थर पर महाराजा जीवाजी राव सिंधिया म्यूजियम लिखा हुआ है साथ में दो – दो छोटी तोपे लगी हुई हैं । अन्दर प्रवेश करते ही सीधे हाथ पर टिकट घर है टिकट की दर है 120 रूपये। अगर मोबाइल या कैमरा साथ ले जाना चाहते हैं तो प्रति मोबाइल,कैमरा100 रूपये की राशि शुल्क ,हम एक मोबाइल ही ले गये भीतर , महल के एक हिस्से को म्यूजियम बना दिया गया है जिसकी ट्रस्टी वर्तमान महाराज व सांसद "ज्योतिरादित्य जी की अर्धांगिनी श्रीमती प्रियदर्शिनी राजे सिंधिया "हैं ।


महल के दूसरे हिस्से में प्रवेश निषेध है वहाँ सिंधिया परिवार की बसायत है अभी ।
महल के अंदर प्रवेश करते ही उसकी विशालता , भव्यता और राजसी वैभव के दर्शन होने लगे
....यह महल सन् 1874 में तत्कालीन महाराजा 'जयाजी राव सिंधिया' द्वारा बनवाया गया था। कहते हैं कि उस समय इस महल के निर्माण में एक करोड़ रूपये की लागत आयी थी। 12,40,771 वर्ग फीट में निर्मित इस महल में वर्तमान में 400 कमरे हैं जिसमें से 40 कमरों को म्यूजियम का रूप देकर इसमें सिंधिया राजवंश और ग्वालियर की ऐतिहासिक विरासत को सहेज कर रखा गया है। म्यूजियम का नाम महाराज जीवाजी राव सिंधिया के नाम पर रखा गया है। यह म्यूजियम ही महल का वह भाग है जिसे आम जनता के लिए खोला गया है।

 

म्यूजियम के भूतल पर छह या सात गैलरियाँ हैं जिनमें सिंधिया राजवंश,सिंधिया परिवार की रानियों के चित्र,वंशवृक्ष,रानियों द्वारा इस्तेमाल भिन्न भिन्न वस्तुयें, शाही पालने,सवारियाँ,रथ,चाँदी की बग्घी,चाँदी के सिंहासन,क्रिस्टल फर्नीचर,,राजसी मुहरें,शाही स्तंभ,चिह्न आदि ।
एक गैलरी आर्मरी की है जहाँ गुप्ती,कटार,ढ़ालें,भाले,बरछी,तलवारें और बंदूकें सिंधिया के सरदार ,यूनिफार्म,पोशाकें ,पगड़ियाँ आदि रखे हैं ।
और भिन्न देशों की क्रॉकरी,तोहफे,शो-पीस,दागीने (गहने).....व छोटी,बडी गाड़ियाँ रखी हैं एवं इनडोर स्विमिंग पूल को बंद रखा गया है। प्रथम तल पर इतिहास से सम्बन्धित अनेक वस्तुओं का संग्रह प्रदर्शित किया गया है।
इसके साथ ही महल के दूसरे भाग में हम पहुँचते हैं जिसे 'दरबार हाल' के नाम से जाना जाता है।शाही दरबार यहीं सजा करता था व विशिष्ट निर्णय,संधियाँ यहीं किये जाते थे ।यहाँ का इंटीरियर और फर्नीचर ही अपनी महान गाथा गा रहा है , यहाँ पर राजसी भोजनालय है जिसमें एक साथ बहुत सारे लोगों के खाने की व्यवस्था है। यहाँ नीचे 'चौकी भोज'भी है और 'डायनिंग टेबल'भी...... मेहमानों के साथ यहीं पर खाना खाने का प्रबन्ध है। दरबार हाल की चकाचौंध उस समय के राज घराने के वैभव और विलासिता की दास्तान बयाँ कर देती है ।


वैसे तो जयविलास पैलेस के हर कमरे में झूमर या झाड़ फ़ानूस टाँगे गये हैं लेकिन दरबार हाॅल में लगे फ़ानूसों की बात अलग है,, दुनिया के कुछ सबसे बड़े झूमरों में शामिल इन झूमरों को बेल्जियम के कारीगरों ने बनाया था। अति महत्वपूर्ण बात यह है कि छत में लटके विशालकाय झाड़ – फानूस का वजन लगभग तीन – तीन टन है,,,,,,छत इसका वजन उठा पायेगी या नहीं इसलिए आर्किटेक्ट 'फिलोस' ने छत के ऊपर दस हाथियों को सात दिन तक चढ़ा कर छत की मजबूती को परखा था । संतुष्ट होने के पश्चात इन झूमरों को टाँगा गया । दरबार हाल में जाने की सीढ़ियों के किनारे लगी रेलिंग काँच के पायों पर टिकी हुई है,,एक गार्ड यहाँ पर बैठा दर्शकों से इसे न छूने का आग्रह कर रहा था ..वो सचमुच हिल रही थी,हमने नजर बचा के भाँप लिया था और लगे हाथ फोटू भी खिंचा ली...।
शाही मेहमानों की आवभगत के लिए 'जयाजी राव सिंधिया' ने कुछ अलग करने के मकसद से दुनिया भर से डिजाइन मँगवाये...सब यहाँ सजाये हुये हैं.... इनमें सबसे ख़ास चांदी की छोटी ट्रेन है, यह चांदी की ट्रेन डाइनिंग टेबल पर बिछाई गयी पटरियों पर धीमी गति से चलती है। इसमें क्रिस्टल के डिब्बे हैं जिनमें शाही पकवान रखे जाते थे,,,मैंने कॉलेज समय इसे चलते देखा है टेबल पर,,लेकिन अब इसे काँच के बॉक्स में सुरक्षित कर दिया गया है । इस ट्रेन के ऊपर लगे ढक्कन को खोलने पर यह रूक जाती है और फिर अपनी जरूरत का सामान लेकर ढक्कन लगा देने पर यह फिर चल पड़ती है।


सिंधिया राजवंश के शासक जयाजी राव 8 वर्ष की उम्र में ही ग्वालियर के महाराज बने। बड़े होने पर जब इंग्लैण्ड के शासक एडवर्ड सप्तम् भारत आये तो महाराज ने उन्हें आमंत्रित किया। उनके स्वागत के लिए ही जयविलास पैलेस के निर्माण की योजना बनाई गयी। इसके लिए नाइटहुड की उपाधि प्राप्त एक फ्रांसीसी आर्किटेक्ट मिशेल फिलाेस को नियुक्त किया गया जिसने 1874 में जयविलास पैलेस का निर्माण किया।
पैलेस में महीने में दो दिन– महीने के दूसरे और चौथे शनिवार की शाम 6.30 से 8.30 बजे तक साउण्ड और लाइट शो का आयोजन किया जाता है। इस क्रम में म्यूजियम और पूरे महल को बिजली की लाइटों से रोशन किया जाता है। झूमरें जगमगा उठतीं हैं और उस रोज़ चाँदी की ट्रेन भी चल पड़ती है।
महल के पूर्वी भाग में एक और गैलरी बनायी गयी है जिसमें भारत में पायी जाने वाली बाघों की विभिन्न प्रजातियों की असली डमी को दर्शाया गया है,पहले बहुत थी ये अब घटा दी गई हैं ,,,कुल मिलाकर पूरा जयविलास पैलेस घूम लेने के बाद इसकी ऐतिहासिकता और महत्व का पता तो चलता ही है साथ ही प्राचीन राजघरानों के विलासिता पूर्ण जीवन शैली के बारे में भी जानकारी व अनुमान लगाना आसान हो जाता । उस समय (1874) इस महल की कीमत करीब 1 करोड़ (200 मिलियन डॉलर) रुपए आँकी गई थी। जयविलास पैलेस यूरोपीय आर्किटेक्ट और डिजाइन का एक नायाब नमूना है। इसका निर्माण 'नाइटहुड 'की उपाधि से सम्मानित सर 'माइकल फिलोसे 'ने किया था।
एक ख़ास बात कि यहाँ 'नियो क्लासिकल रूम'नाम से एक कोना भी है जिसमें भोग-विलास की सेडक्टिव मूर्तियाँ और मशहूर सेमी-न्यूड पेंटिंग्स भी हैं,,।(कुछ सालों पहले तक ये पूरा कमरा जिसमें कुछ ऐसा रहा होगा कि सिर्फ़ एडल्ट्स को ही देखने की अनुमति थी ,अब कुछ स्कल्पचर ओपन हैं )


यहाँ मेरी पसंदीदा जगह सिंधिया परिवार का पूजाघर ...बेहद सुंदर और ...."रानी चिनकू राजे जी जो कि बस तीन फुट की थीं,उनकी नन्ही नन्ही एंटीक फर्नीचर और इस्तेमाल की वस्तुये,कंघे,इत्र,पॉटरी,वस्त्र और चुन्नु से ढेर सारे जूते बल्कि बाथरूम एक्सेसरीज तक संग्रहित हैं ।
एक गैलरी पूर्व महाराज "माधवराव जी"की इस्तेमाल की गई पेनों,कागजों,गोल्फ स्टिक्स,दस्ताव़ेजों, ऐश ट्रे'ज, कंघियों,लाइटर्स,सिगारों, गोगल्स,स्टाम्पों,ताशपत्ते,कलाई घडियाँ,टाइयाँ,स्कार्फ,गोल्फ कैप,राजसी पोशाक और बहुत से वैभव युक्त वस्तुओं से भरी है ।यह नयी गैलरी है मैंने पहली बार अभी देखी,,,शायद से महाराज के बाद बनाई गयी ।
बच्चों की भी गैलरी है...उनके भिन्न खिलौनों व फर्नीचर वाली...अपन को तो इसे देख गाना सूझ गया था,,लकडी की काठी,काठी पे घोड़ा....हा हा ।


देखने को क्या कुछ नहीं,,, विदेशी टीम-टाम से भरपूर हर प्रकोष्ठ ....वो भी तब का जब भारत आजाद नहीं था ,,मेरे भीतर एक अकुलाहट वाला प्रश्न छोडता है कि....जब जनता भुखमरी और आजादी के लिये लड़ रही थी तब ये तामझाम...जनता के रखवालों के लिये इतने आवश्यक थे ? या इसकी लागत के ख़र्चे का आधा भी यदि आजादी की लड़ाई में लगा दिया जाता तो....हिम्मत चार गुनी रहती ,,,नहीं क्या ?
ख़ैर ये व्यक्तिगत सोच की बात है फिलहाल तो आप मेरे ज़रिये इन नज़ारों को भोगिये ।
यहाँ से बाहर निकल कर जलमहल है जिसमें अब जल की बूँद भी नहीं पर उसकी बनाबट आपको उस काल में ..."बैज़ूबावरा साहब" की संगीत महफिल की याद जरूर करा देगी...राजसी ठाठ का एक विस्तृत सुंदर नमूना यह भी है ।


बहरहाल.... मेरी आदतानुसार बागीचे में धूप में काम कर रहे वृद्धों से मैंने बातें की थोडी...काकी/काका बोल के ,,उनकी तस्वीरें लीं और बाहर...गाडी तक आकर ,,निकले बेटी को नगरपालिका द्वारा संचालित चिडियाघर "गाँधी"दिखाने ।

आपके लिये ग्वालियर घाटे का सौदा नहीं यदि कभी आयें तो किला बहुत शानदार धरोहर है यहाँ की... इसी किले पर “शून्य” से जुड़े हुए सबसे पुराने दस्तावेज किले के ऊपर जाने वाले रास्ते के मंदिर में मिलेंगे...जो की करीब 1500 साल पुराने थे।
मानसिंह की रानी मृगनयनी का गूजरी महल,मानमंदिर...तेली महल ,सूर्यमंदिर,सास बहू (सहस्त्र बाहु )😃मंदिर...तलवार वाले हनुमान, बड़ा गुरुद्वारा बहुत सुंदर और सुकून भरा ,मोतीमहल आदि और यदि सस्ती,सुंदर,टिकाऊ शापिंग करनी रहे तो ...बाडा...चले जाइये यहाँ टाँगे अब तक चलते हैं ।यदि आप दिसंबर, जनवरी में आते हैं तो सोने पे सुहागा...विशाल मेला आपका इस्तकब़ाल करेगा ।


आवश्यक... जो लोग यहाँ रुकेंगे वो किलेके आसपास होटल न देख के रेलवे स्टेशन के सामने नहीं,,पीछे वाले होटल खंगालें आराम से सस्ते में इंतजाम हो जायेगा,सामने मंहगे और तीन,चार सितारा भी पर....बता दूँ वर्थी नहीं हैं।

 


- प्रीति राघव प्रीत