फरवरी-मार्च 2019 (संयुक्तांक)
अंक - 47 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ज़रा सोचिए

कहीं थी मजबूरी तो कहीं स्वेच्छा से चयन

आज सेंटर की सीढ़ियाँ चढ़ते समय अनायास ही मेरी नज़र एक औरत पर गई, जो कि कुछ ज्यादा ही सिकुड़ कर स्वयं को बहुत समेट कर दुबकी हुई, सेंटर की बेंच के एक कोने में चुपचाप बैठी हुई अपने टेस्ट करवाने की बारी आने का इंतज़ार कर रही थी। उसको देख कर न जाने क्यों मेरे मन में उसको जानने कि इच्छा हुई। अपने चैम्बर में आकर पूजा करके जब मैं अपनी कुर्सी पर बैठी तो फिर से अचानक मेरी नज़र उसी स्त्री पर पड़ी और मुझे लगा कि वो स्त्री नहीं चाहती कि कोई उसको स्पर्श भी करे और इसी भाव के साथ उसने शायद स्वयं को बहुत एतिहाद के साथ समेट कर रखा था। चाहते न चाहते हुए भी मेरी नज़र सेंटर पर आए हुए इतने मरीज़ों के अलावा उसी पर बार-बार पड़ रही थी। कुछ मासूम-सा था उस मरीज़ के चेहरे पर जो मुझे बार-बार आकर्षित कर, मुझे उसकी ओर ले जा रहा था। जिज्ञासावश स्टाफ को मैंने आवाज़ लगा कर अपने पास बुला भेजा और पूछा-

"सतीश! आप अंदर आइये प्लीज।"
"क्या हुआ मैडम! कुछ पूछना था आपको?" मेरे स्टाफ सतीश ने मुझसे पूछा।
"हाँ! सतीश, यह सामने जो मरीज़ बैठी है, क्या हुआ है इनको? किस जाँच हेतु इनका हमारे यहाँ आना हुआ है?" मैंने पूछा।
"मैम पहले कुछ ब्लड टेस्ट इन्होंने करवाये थे, जिसमें बोल रही है एड्स का टेस्ट पॉजिटिव आया था। इनको वही टेस्ट पुनः करवाकर कन्फर्म करना था।" सतीश ने जवाब दिया।
"सतीश आपने ब्लड लेते समय जो एतिहाद मरीज़ के साथ बरतनी चाहिए आपने ली।" मैंने सतीश से पूछा।
"हाँ मैम, सभी कुछ मेडिकल मानदण्डों को ध्यान में रख कर ही किया गया है, आप निश्चिंत रहे।"
"सतीश! मुझे बहुत अच्छा लगता है जब आप सभी स्टाफ़ इन छोटी-छोटी पर मेडिकल के हिसाब से बहुत मायने रखने वाली बातों का ध्यान रखते है।" अब आप जाये अपना काम करिये और प्लीज इस मरीज़ को मेरे पास भेजिएगा। मैंने सतीश को कहा और सतीश ने बाहर निकलकर उसको अंदर भेज दिया।


"क्या नाम है आपका? क्यों इतना दुबकी सिमटी हुई बैठी हैं आप? कहाँ रहती हैं? मेंने पूछा।
मेरे इतने प्रश्न पूछते ही न जाने किस बात से वो इतना द्रवित हुई कि उसकी आँखों से आँसू अविरल बह चले।
"बोलिये न क्यों रोई आप?" मैंने यह पूछकर उसके कंधे पर हाथ रखा ही था कि उसका सुबकना और बढ़ गया।

"मेरा नाम पारो है मैम। सुनहरी बस्ती की रहने वाली हूँ। मुझे आज तक किसी ने इतने आदर से आप कह कर नहीं पुकारा तो रोना आ गया। बहुत परेशान हूँ मैं। जबसे पता चला है कि एड्स है मुझे, सारा-सारा दिन अपने अंदर से एक गंद-सी महसूस होती है मुझे। बस यही महसूस होता है कहीं मेरे अंदर की यह गंद किसी और के अंदर न चिपक जाए। सारा-सारा दिन खुद को समेटती रहती हूँ। बिटिया है एक मेरी दस साल की। जब भी पास आती है उसको अपने पास से छिटक देती हूँ। जानती हूँ मेरा ऐसा करना उसको बहुत रुलाता है और ऐसा करने के बाद ख़ुद भी बहुत रोती हूँ क्योंकि उसके सिवाय मेरा बहुत अपना कोई नहीं है। जिस धंधे से मैं जुड़ी हूँ वो मेरी मजबूरी थी बेबस थी मैं। माँ-बाबा के जाते ही सब बदल गया। बहुत छोटी थी मैं। गरीबी और लाचारी ने मुझे इस धंधे से जोड़ दिया। चाहते और न चाहते हुए भी मेरी बिटिया को चूंकि मेरे जीवन में आना था तो वो मेरे  जीवन का हिस्सा बन गई। जबसे वो मेरे जीवन का हिस्सा बनी है मैम, बस तब से ही मुझ हर बात हर चीज़ में गंदगी नज़र आने लगी है। जब तक बातें मुझ तक सीमित थीं मुझे इतना तनाव कभी नहीं हुआ क्योंकि मेरी मजबूरी मुझे विवश करती थी पर इसकी बढ़ती उम्र मुझे और चिंतित करती है और रही सही कसर इस बीमारी का पता चलने से पूरी हो गई है। यही बीमारी हर समय मुझे आभास कराती है कुछ मेरे अंदर कहीं गहरे में गंदगी घुस गई है और मुझे अंदर ही अंदर खाती जा रही है। कोई भी मेरे पास आकर बैठता है या बात करता है तो लगता है वो भी गंदा हो जाएगा। नहीं चाहती मेरी बेटी किसी भी परेशानी से घिरे। उसको भी अपने से दूर कर बैठी हूँ।"

"कहाँ तक पढ़ी हो पारो?" मैने अनायास ही पूछ लिया।
"कहाँ पढ़ी मैं मैम! अगर पढ़ी-लिखी होती तो यह सब दिक्कत क्यों होती मुझे पर मेरी बेटी पढ़ रही है।"
"पारो तुम बहुत समझदार हो, शायद किसी पढ़े-लिखे से कहीं अधिक समझदार। क्योंकि तुमने जो किया वो सब परिस्थितिवश था पर आज के संदर्भ में सोचे तो यह सब काम क्षणिक मज़े के लिए हो रहे हैं। मुझे जाने क्यों आभास हो रहा है तुमने अपनी बीमारी को अपने ऊपर ओढ़ लिया है जिसकी वजह से तुम सिर्फ नकारात्मक होती जा रही हो। बात करना चाहोगी मुझसे अपने ख़ुद के बारे में। कुछ दिन तुमको मेरे पास आना होगा लगातार, क्योंकि मैं नहीं चाहती तुम समय से पहले अपनी सोच की वजह से इस संसार से विदा ले लो क्योंकि हमारी सोच बहुधा हमारी बीमारी को और अधिक बिगाड़ देती है और मैं नहीं चाहती तुम समय से पहले चली जाओ। तुम्हारी बेटी को जरूरत है तुम्हारी। जितना अधिक समय उसको दे पाओगी, दोनों के लिए अच्छा है।"


मेरी इस तरह से कही बातों को सुन, उसकी आँखों से फिर से आँसुओं की धार बह चली और सुबकते हुई बोली-
"कैसे मना करूँ आपको। इतने सम्मान से तो आज तक किसी ने मुझसे कभी भी बात ही नहीं की। यहाँ आपके पास आ कर महसूस हुआ कि मै भी इंसान हूँ। अगर आप मेरे लिए कुछ कर सकती हैं तो मुझे बचा लीजिये किसी भी तरह, मुझे नहीं मरना, मेरी बेटी बहुत छोटी है और मैं जिस गंदगी से भरती जा रही हूँ उसको मेरे अंदर से हटा दीजिये।" पारो रोते-रोते बोली।


उसकी बातें सुनते-सुनते अब मुझे आभास हो गया था कि वो कहीं गहरे अवसाद की चपेट में आ चुकी है और मुझे उसके लिए और उसकी बेटी के लिए जतन करने ही होंगे।
"जरूर तुम्हारी मदद करूंगी मैं पारो, तुम जीओगी अच्छे से, बस पहले अपने मन को ठीक करने कि कोशिश करो और मैं तुम्हारी इस मानसिक टूटन को ठीक करने में मदद करूंगी, समझ रही हो न! मन से हार जाओगी तो सब छूट जाएगा पारो। आज तुमसे मिलकर मुझे कितना अच्छा लगा है तुम नहीं जानती, पूछोगी नहीं? पता है तुमसे बात करने से पहले तक मेरे मन में एक विचार था कि देह व्यापार से जुड़ी स्त्रियों में भावों के प्रति बहुत बेरुख़ी आ जाती होगी पर आज तुमसे मिलने के बाद आभास हुआ भाव हर इंसान के व्यक्तित्व का हिस्सा है वो बात अलग है इंसान उनको महसूस करना छोड़ दे। साथ ही यह भी एहसास हुआ कि जिस संवेदनाहीन दुनिया में तुम रहती हो, वहाँ भी संवेदनाएँ साँसें लेती हैं। बहुत-बहुत शुक्रिया तुम्हारा पारो क्योंकि तुमसे भी मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला।" बोल कर मैने उसके कंधे पर हाथ रख उसको सांत्वना दी।


शायद मेरा उसके कंधे पर रखे हुए हाथ का स्पर्श पारो को बहुत कुछ महसूस करवा गया जो कि उसके सुकूं से जुड़ा था। फिर पारो से और उसकी बेटी से कई बार मिलना हुआ इलाज़ के सिलसिले में जाने कितनी बातें और दर्द पारो ने सांझे किए जो कि उसके साथ-साथ बहुत बार मेरी भी आँखों को नम कर गए। पारो की लाइलाज बीमारी का तो मेरे पास कोई समाधान नहीं था पर स्वयं के अंदर की भरी हुई गंदगी के जिस अवसाद से वो घिरी हुई थी, मैं बहुत कुछ उसको उससे उबार पाई। यह मेरे लिए भी बहुत आसान नहीं था क्योंकि जिस वातावरण में वो रहती थी उसी में रहते हुए उसके मन को पूरी तरह ठीक कर पाना कुछ ज्यादा ही मेरे परिश्रम को माँगता था।
पर पारो से मिलना उसकी बातों को सुनना मुझे बहुत कुछ महसूस करवा गया कि आज की इस नाटकीय और कृत्रिम-सी दुनिया में स्त्री हो या पुरुष जिस गंदगी में अपनी कुंठाओ को पूरा करने के लिए गिरने को हरदम तैयार हैं, बगैर गन्द विचारे, सोचनीय है। जबकि मजबूरियों से जुड़े पारो जैसे इंसान किस अवसाद से गुजर रहे हैं अकल्पनीय है। कहीं तो मजबूरी है और कही इंसान सिर्फ स्वयं को गर्त में गिराने को तैयार। आज जितना मैं पारो को सोचती जाती हूँ वो कही मेरे दिमाग़ में उच्च स्थान पर स्थापित होती जाती है और आज की सो कॉल्ड आधुनिक स्त्री बहुत कुछ पाने की होड़ में अपनी देह को कभी भी इस्तेमाल करने से संकोच नहीं करती, मेरे विचारों से स्वतः ही उतरती जाती है। इसके कितने घातक परिणाम होगे बहुत सोचनीय है... ज़रा सोच कर देखिये तो!


- प्रगति गुप्ता