फरवरी-मार्च 2019 (संयुक्तांक)
अंक - 47 | कुल अंक - 54
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव

ग़ज़ल-

इक मुकदमा तो लगे हाथ लिखाया जाये
ज़िन्दगी तुझको गवाही में बुलाया जाये

दीन है प्यार, धरम प्यार इसी में रब है
ये सबक़ हर किसी मक़तब में पढ़ाया जाये

इश्क़ फ़रियाद नहीं इश्क़ नहीँ है मातम
अश्क़ आँखों से न हरगिज भी गिराया जाये

जो नहीं बस में उसी बात का वादा करके
क्या ज़रूरी है फ़क़त ख़्वाब दिखाया जाये

और भी ग़म हैं मुहब्बत के सिवा दुनिया में
किसलिए दर्द को सीने में बसाया जाये

लोग हर बात यहाँ दिल पे लगा लेते हैं
'आरसी' उन से भला दिल क्या लगाया जाये


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ग़ज़ल-

आप हैं जो तीरगी से डर गए
लोग अक्सर रोशनी से डर गए

आँख से उसने पिला दी इस क़दर
पीने वाले मयकशी से डर गए

इम्तिहानों का सिला रुकता नहीं
यार हम तो ज़िन्दगी से डर गए

दुश्मनी तो मुफ़्त में बदनाम थी
दोस्तों की दोस्ती से डर गए

रिस रहे हैं ज़ख्म मेरे अब तलक
इस क़दर चारागरी से डर गए

आज तक हमने नहीं की उफ़ मगर
आप तो लेकिन अभी से डर गए

हो मुखालिफ़ ये ज़माना 'आरसी'
पर तुम्हारी बेरुखी से डर गए


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ग़ज़ल-

गाँव में कुछ नहीं बचा होगा
सिर्फ़ बूढ़ा शजर रहा होगा

साथ जब भी तेरा रहा होगा
कुछ न कुछ हौसला बढ़ा होगा

हमनें समझा कि रास्ता होगा
क्या ख़बर थी कि हादसा होगा

सिर्फ़ एह्सास भर रहा होगा
जब कभी मुड़ के देखता होगा

छुप न पाया बहुत छुपाया पर
राज़ आँखों ने कह दिया होगा

ज़िन्दगी में कभी जो हारे तो
ग़म नहीं यार तज़्रिबा होगा

तू नज़र से नहीं पिलाये तो
फिर कहाँ से मुझे नशा होगा

आजकल दिल उदास रहता है
मुश्किलों में घिरा-घिरा होगा

टूट जाना कि प्यार में दिल का
बात ये दिल भी जानता होगा

सुर्ख़ रुख़सार हो गए होंगे
ज़िक्र जब भी मेरा छिड़ा होगा

जीत कर दिल को हार जाना भी
सोच लो खेल क्या रहा होगा

तुम कहीं और मैं कहीं हूँ अब
क्या पता था ये फ़ासला होगा

'आरसी' है कहाँ ये मत पूछो
वो मुहब्बत ही बो रहा होगा


- आर. सी. शर्मा आरसी

रचनाकार परिचय
आर. सी. शर्मा आरसी

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