प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितम्बर 2015
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

हड़ताल, हिंसा और हिन्दुस्तान के दुरूह वातावरण में खुद को खोजती हिन्दी
यूँ तो हर माह ही कोई-न-कोई समाचार होता है जो मीडिया के साथ-साथ पूरे देश को भी व्यस्त रखता है। लेकिन बीते दिनों लगातार कुछ-न-कुछ ऐसा होता रहा जिसने न सिर्फ़ हमारी सोच को बल्कि दिनचर्या को भी अस्त-व्यस्त करके रख दिया। साधारण सुखविंदर कौर से एक आध्यात्मिक गुरुमाता का चोला ओढ़ लेना कोई आश्चर्य की बात नहीं पर उसकी आड़ में दहेज़ उत्पीड़न और अश्लीलता फैलाना अत्यंत ही शर्मनाक और निंदनीय कृत्य है। इससे भी अधिक कष्टप्रद यह देखना है कि इस मायाजाल का शिकार, केवल अशिक्षित या निर्धन व्यक्ति नहीं बल्कि समाज का एक शिक्षित, समृद्ध वर्ग भी रहा है। पढ़े-लिखे और तमाम भौतिक सुख-सुविधाओं में जीने वाले इंसानों को भी जब इस संसार में दिलचस्पी या आशीर्वाद की चाह है तो इस तथ्य की पूरी तरह से जांच-पड़ताल होना और भी आवश्यक हो जाता है कि यहाँ धर्म के नाम पर किसका क्रय-विक्रय हो रहा है?
अन्धविश्वास के दानव और भ्रामक साधु-संतों के चंगुल से हमारा देश कब स्वतंत्र होगा, यह प्रश्न अभी कई वर्षों तक यूँ ही मुँह बाए खड़ा रहेगा। फिलहाल इस पर अफ़सोस करने के अतिरिक्त और कोई उपाय सोचना भी समय को नष्ट करना है! यह व्यक्ति विशेष की पसंद-नापसंद का मामला है और कोई किसी को, किस आयु तक उंगली पकड़कर चलना सिखाएगा! आम जनता को अब स्वविवेक से निर्णय लेना सीखना ही पड़ेगा
 
मीडिया की दुनिया से जुड़े एक उद्योगपति और उनकी पत्नी की कहानी ने अच्छे-अच्छे गणितज्ञों के मस्तिष्क की सारी नसें हिला दीं! रिश्तों का ऐसा दाँव-पेंच, शायद ही कभी किसी ने इतना देखा-सुना हो। कई किस्से-चुटकुले भी बनते रहे, इस पूरी घटना को इतना ज्यादा परोसा गया कि न चाहते हुए भी घर-घर में ये चर्चा का विषय बन गया। बच्चे अब तक इन प्रश्नों से जूझ रहे हैं कि कौन किसके माता-पिता थे! इस पूरे प्रकरण की जाँच जितनी तेजी से होती रही, उससे न्याय-व्यवस्था पर भरोसा बस बन ही रहा था कि इससे जुड़े वरिष्ठ अधिकारी की पदोन्नति ने इस विश्वास को भी धराशायी कर दिया। संशय नई नियुक्ति पर नहीं, 'समय' को लेकर है! डर है कि कहीं इस केस का हश्र भी 'आरुषि' जैसा न हो
 
चुनाव और राजनीति के दंगल में श्रीलंकाई जमीन पर, विराट की 'विराट जीत' की चमक कहीं फीकी नजर आई, क्रिकेट को लेकर हम भारतीयों की प्राथमिकता में भी अब कमी दिखने लगी है पर निस्संदेह यह प्रसन्नता के स्वर्णिम पल थे
इधर एम. एम. कलबुर्गी की नृशंस हत्या ने इस बात के और भी पुख्ता प्रमाण दिए कि ईमानदारी, सच्चाई से लिखने और पाखंड के विरोध में बोलने वाले लेखकों को भय में ही जीना होगा। इसीलिए कुछ ने अपने पुरस्कार विरोध में लौटा दिए और कुछ ने लिखने के विषय ही बदल लिए! इस केस की निष्पक्ष जाँच और अपराधियों को सजा मिलने की उम्मीद रखना स्वयं को धोखे में रखने के सिवाय कुछ भी नहीं कम-से-कम इतिहास तो यही गवाही दे रहा है। सीरिआई बच्चे आयलान की तस्वीर ने समूचे विश्व को झकझोर कर रख दिया और लगा मानवता और इंसानियत अब भी शेष है कहीं! प्रतीक्षा उस दिन की है, जब ये भाव अपराधियों के मन में भी उपजने प्रारम्भ हों
 
आंदोलन के नाम पर हड़ताल और हड़ताल की आड़ में हिंसा, तोड़फोड़, आगजनी; लगता है हिंदुस्तान की यही नियति रह गई है। अधिकारों की मांग लेकर, धरने पर बैठते हैं। सारे कामकाज ठप्प करते हैं और इसका अंत पुलिसिया बल-प्रहार, फिर बचाव के लिए जनता का उन पर पथराव, जिसके बदले में गोलीबारी, आंसू गैस और फिर सरकारी संपत्ति को अग्नि के हवाले कर देना! हर बार यही प्रोटोकॉल फॉलो किया जाता है परिणाम? शहर में कर्फ्यू, छुट्टियां और फिर करोड़ों का घाटा! किसको, क्या मिला; कोई नहीं जानता परन्तु धरने, आंदोलन के बाद की तस्वीरें लगभग एक-सी ही रहती हैं। धीरे-धीरे यह भी अब एक 'प्रथा' ही बन गई है। यहाँ यह बात भी ध्यान देने योग्य है, कि....... 
जब सभी लोग असंतुष्ट है तो संतुष्ट कौन है?
गर सभी अपने हक़ के लिए लड़ रहे हैं तो हक़, मिल किसे रहा है?
कहीं ऐसा तो नहीं कि ये रोना-धोना हमारी आदत हो गई है और खुद को दुखी दिखाना अब ज्यादा तसल्ली देने लगा है वरना जीने के लिए जरूरतें हैं ही कितनी? अधिक और अधिक की अपेक्षा न सिर्फ वर्तमान को खाए जा रही है बल्कि भविष्य को भी उतनी ही गति से निगल रही है
 
'हड़ताल, हिंसा और हिन्दुस्ता न' के इस दुरूह वातावरण में 'हिंदी' का उत्सव मनाता 'विश्व हिंदी सम्मेलन' आलोचनाओं और प्रशंसा के झूले में हिचकोले लेता नजर आयाअनामंत्रित लोग बुराईयाँ निकालते रहे और सम्मिलित तारीफ़ों के पुल बांधते रहे। जो भी हो या हुआ, इन सबके बीच 'हिंदी' का मान बना रहे तो बहुत है! हमारी अपनी भाषा को संरक्षित रखने के लिए बहस चलती रहेगी। कई राज्यों में अंग्रेजी का राज, आज भी हिंदी से ज्यादा है, हर प्रदेश की अपनी बोली है। मुसीबत उनको सबसे अधिक है, जो दूसरे राज्यों से आकर यहाँ बसे हैं। 'आंग्ल-भाषा' के आधिपत्य का एक कारण यह भी है। 
भाषा कोई भी हो, सम्मान-योग्य ही होती है बस इस बात का पूरा ध्यान रखना है कि हमारी अपनी पहचान नजरअंदाज़ न होने पाये। 'संस्कृत' का हश्र हम सब देख ही चुके हैं। आइये प्रण करते हैं कि हम, निस्संकोच अपनी बोल-चाल की भाषा में 'हिंदी' का अधिक-से-अधिक प्रयोग करेंगे! अपने आसपास रहने वाले 'निरक्षरों' को साक्षर बनायेंगे, उन्हें पढ़ने-लिखने की प्रेरणा देंगे और अपने 'हिंदी-भाषी' होने पर गर्व का अनुभव करेंगे!
 
'हिंदी-दिवस' की शुभकामनाओं के साथ, एक उम्मीद यह भी है कि भारत के हर राज्य में 'हिंदी' को बारहवीं कक्षा तक अनिवार्य विषय घोषित कर दिया जाए। 'उत्साह से कहीं ज्यादा हम लोग, मजबूरी में सीख जाते हैं!'अगर मीडिया इस कार्य में रूचि दिखाए तो यह असंभव नहीं!
वैसे भी "जब कोई व्यक्ति अकेले ही, पहाड़ काटकर रास्ता बना सकता है, तो इस दुनिया में मुश्किल रहा ही क्या!" दशरथ मांझी के इस प्रेरणादायी कथन के साथ-
जय हिंदी! जय भारतवर्ष!

- प्रीति अज्ञात
 
रचनाकार परिचय
प्रीति अज्ञात

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