प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जनवरी 2019
अंक -46

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

यात्रा-वृत्तान्त
दोस्तों 
सर्वप्रथम आप सभी को नववर्ष 2019 की कोटि-कोटि शुभकामनाएँ। आप सभी स्वस्थ रहें, मस्त रहें और आवश्यक कार्यों में व्यस्त भी रहें।
पिछले साल से शुरू घुमक्कड़ी वाला ये रोचक सफर पुनः जारी रखते हुए आज उस बेशकीमती धरोहर से मिलाती हूँ, जो पलकें बिछाये पर्यटकों की बाट जोह रही है।
 
मित्रो, कतई आवश्यक नहीं कि जानी-मानी जगहें और स्मारक आदि ही देखने लायक हों। अक्सर लोग अपनी ही दुनिया में मगन रहने वाले शहर को किसी प्राचीन अफवाह या डर से अनदेखा, अनछुआ कर देते हैं और वहाँ की नैसर्गिक सुंदरता के साथ-साथ बेशकीमती पौराणिक धरोहर के इतिहास से वंचित रह जाते हैं। माफ़ कीजिएगा, उच्चवर्गीय तबके के कुछ लोग सोचते हैं कि यहाँ क्या रखा है देखने को।
सोच की दिशा बदलिये और सवाल ख़ुद से करिये कि विदेशी पागलों की तरह विपरीत परिस्थितियों में भी क्यूँ और क्या देखने को पड़े रहते हैं हमारे देश में?
घर की मुर्गी दाल बराबर न आँकिये, हाजमा दाल से ही सही रहता है; मुर्गी से तो स्वाइन फ्लू भी हो सकता है। बहरहाल, निकलिये इस कूप-मंडूक के कवच से और तब खुले दिल और दिमाग़ से जान सकेंगे कि हमारी धरती अमूल्य रहस्यमयी धरोहर और ज्ञान व शिक्षा की ट्रैजर बॉक्स है।
 
पौड़े हनुमान जी से वापिस शनीचरा आकर मुख्य द्वार से सीधे हाथ की सड़क पकड़ हम बढ़ निकले। पड़ावली के एक छोर से आये थे हम। दूसरे छोर पर बढ़ चले 15 से 20 मिनट के रास्ते पर 'बटेश्वर' मिला। मुख्य सड़क से यू-टर्न लेकर बड़े से लोह गेट के भीतर सपाट पक्की सड़क, छायादार पेड़ लगे और चारों ओर पथरीली जमीन में भी लुभावनी हरियाली, गाड़ी यहीं सड़क पर रख हम पुनः एक गेट में गये तो देखकर आँखें व मन भौचक्का था। लगा ये कहाँ आ गये! कशीदाकारी, नक्काशी किये पत्थरों के मंदिरों का ऐसा अद्वितीय समूह कि दिल झूम गया।
 
एक-दो नहीं, लगभग आधे सैकड़े से अधिक शिव मंदिर, इसे आठवीं शताब्दी की कारीगरी का उत्कृष्ट नमूना कहेंगे। यह 'बटेश्वर मंदिर समूह' ख़जुराहो मंदिर से भी तीन सौ वर्ष पूर्व के बने हैं।हर दीवार व पत्थर को बारीकी से तराश कर बनाई गई बेशकीमती वास्तुकला,,, ये धरोहर भले ही पर्यटकों से अंजान है पर अपनी उत्कृष्टता को संजो कर गर्व से तनी बैठी है । ये कहने को खंड़हर हैं, अवशेष हैं मगर छाप ऐसी छोड़ते हैं मानो हम उसी प्राचीन युग में पहुँच गये ।
 
मंदिर से जुड़ा इतिहास :~
 
मुरैना से लगभग 35 किलोमीटर अंदर बीहड़ो के बीच बटेश्वर मंदिर समूह का निर्माण 8वीं शताब्दी से 11वीं शताब्दी में प्रतिहार राजाओं के वंश के दौरान किया गया। आप को जान कर हैरानी होगी, पर यह सच है कि बटेश्वर मंदिरों का यह समूह लगभग 1000 साल पुराना है।
यह पौराणिक धरोहर वास्तव में 200 से अधिक मंदिरों के समूह के रूप में निर्मित की गई थी, जो मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के इतिहास का महिमामंडन करती है।
दोस्तों कहते हैं कि आज अगर हिन्दू धर्म भारत में बचा हुआ है उसका श्रेय परिहार राजवंश को जाता है। यह सत्य है कि कोई भी राजवंश स्थाई शासन ना कर सका फिर भी प्रतिहारों ने अरबी मुगलों से 300 वर्ष तक लगभग 200 से ज्यादा युद्ध किये जिसका परिणाम है कि हम अपनी गौरव-गाथा समेटे हैं समय के गर्भ में । यहाँ अनेकों क्षत्रिय राजवंशों ने समयानुसार अपनी वीरता, शौर्य व कला के प्रदर्शन से शासन किया ।
इन मंदिरों का निर्माण प्रतिहार/परिहार क्षत्रिय राजवंश के सम्राट मिहिरभोज के शासनकाल से प्रारम्भ हुआ और सम्राट विजयपाल प्रतिहार के शासनकाल के समय इन मंदिरों का निर्माण कार्य पूरा हुआ।
भगवान् शिव और विष्णु को समर्पित ये अद्वितीय मंदिर खजुराहो से भी तीन सौ वर्ष पूर्व बने थे,दुर्भाग्य कि ये चंबल के डाकुओं के भय से उपेक्षित रह गये और कालचक्र पर पिस कर ध्वस्त हुये ।
 
दोस्तों गूगल चचा पर अब इन मंदिरों की जानकारी उपलब्ध है कि कैसे इनका जीर्णोद्धार हुआ .....भारतीय पुरातत्व विभाग के डायरेक्टर (ASI) "के के मुहम्मद" साहब के प्रयासों ने इन मंदिरों को पुनर्स्थापित किया । 
के के मुहम्मद साहब की वजह से ही आज क्षत्रियों द्वारा बनावाये दो सौ भी अधिक मंदिर अपने पुराने रूप में लाये जा चुके हैं। के के मुहम्मद इन मंदिरों को अपना तीर्थ मानते हैं और चाहते हैं कि आने वाले समय में इस स्थान को तीर्थ यात्रा के रूप में मान्यता मिले, के.के. जी ने भारत के विभिन्न स्थानों पर कई मंदिरों का जीर्णोद्वार किया है।।
के के मुहम्मद मंदिरों और भारतीय मान्यातों का बहुत गूढ़ ज्ञान और श्रद्धा रखते है, और बिना श्रद्धा के इस तरह का पुनर्निर्माण संभव नहीं होता है ।
बटेश्वर मंदिर का समूह पहले तब तक डकैतों के कब्ज़े में था, जब तक कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण संस्थान ने इस विरासत में दखल देकर इसकी जाँच आरंभ नहीं की । 
 
ख़ोजी प्रीत :~
अब मैं बहुत रोचक बात साझा करती हूँ जो आपको गूगल चचा ना दे सकेंगे ! ये जानकारी मैंने मंदिर के बागीचे में पानी देते कुछ ग्रामीणों से व वहाँ के स्थानीय केयरटेकर श्री " जसवंत सिंह जी" से एकत्र की बातचीत के दौरान । ये मोहम्मद सर के समय से यहाँ हैं ।
जसवंत बब्बा ने एलबम से तस्वीरें भी दिखाईं के के मोहम्मद सर की और उनके प्रयासों के पहले के हालात और बाद की मंदिरों की उभरी रंगत की भी और एक खास बात कही कि के के मोहम्मद साब को सपने में " भूतेश्वर बाबा (शिव) "ने दर्शन दे कर कहा कि वर्षों से मेरी अनेक पिंडियाँ और मेरे मंदिर क्षत-विक्षत हो भू-गर्भ में फलानी जगह पर दबे हैं,जाओ और उन्हें सुरक्षित करो । और तभी मोहम्मद सर ने अपने पुरातात्विक विभाग से सिफारिश की यहाँ तबादले की और उत्थान कार्य का श्री गणेश करवाया,, यही नहीं उन्होंने उस वक्त निडर हो कर डाकू निर्भय सिंह गुर्जर से भी सविनय निवेदन कर साथ माँगा जिनका इस खंड़हर क्षेत्र पर तब कब्जा था । प्रतिहार गुर्जर होने की वजह से वो डाकू सरगना तैयार हो गया व गाँव वालों की व पुरातात्विक टीम की मदद की ।
 
रोमांचित करने वाली कड़ियाँ :~
दोस्तों असली भूतेश्वर बाबा की तस्वीर भी लाई हूँ आप सबके लिये जिन्होंने सपना दिया मोहम्मद साहब को। ( विज्ञान नकारता है जिन बातों को उनको हम कभी नहीं नकार सकते मैं मानती हूँ कि जसवंत बब्बा ने सच कहा और उन सबसे मोहम्मद सर ने .....क्योंकि मुझे भी स्वप्न में कयी बुलावे आये हैं और जिन जगहों को देखना दूर सोचा तक नहीं वहाँ तक गई हूँ उन सपनों के बाद ....मानो या न मानो पर विज्ञान अलौकिक शक्तियों के आगे निरीह हो जाता है )
यही नहीं एक शिला पर भगवान विष्णु के बारह अवतार तक अंकित हैं जिसमें अभी " कलकी" अवतार होना बाकी है पुराणों के अनुसार।
भूतेश्वर के द्वार पर एक तरफ यमुना जी कछुये पर हैं वहीं दूसरी तरफ गंगा मैया मगरमच्छ पर।
पंचमुखी शिवलिंग विराजमान हैं एक तरफ तो दूसरी ओर शिव और उनकी योगिनी।
गणपति हैं तो....एक ओर खनन में निकली हनुमान बाबा की देश की इकलौती मूर्ति जो आधी नर है आधी नारी ....और उनके पैर के नीचे दबे हुये रति व कामदेव ।
कहते हैं कि हनुमान जी की तपस्या भंग करने दोनों आये थे तो तब से क्रोध में हनुमान जी ने रति-काम को पैर के नीचे दबा रखा है और आधे नर व आधी नारी का रूप धारण किया।
 
दुःखद पहलू:~
 
लिखते-लिखते भी वहीं पहुँच गयी हूँ ऐसा प्रतीत हो रहा है । तन यहाँ और मन वहीं रमा है मेरा ।
के के मोहम्मद जैसे लोग कम ही होते हैं ,मेरे पहुँचने तक कुल 108 मंदिर सही कर दिये गये हैं और अब काम बंद है लोहे की सलाखें ,कील,पेंच सब ऐसा ही रख छोडा है क्योंकि मोहम्मद साहब का रिटायरमेंट हो गया है ।
मेरी गुज़ारिश है कि मित्रगण इस बचे जीर्णोद्धार के काम की गुहार लगाने में मदद करें जिससे बचा हुआ कार्य संपन्न हो एक अद्भुत पौराणिक धरोहर को दुनिया के आगे रखा जा सके ।
क्योंकि मोहम्मद जी के स्वप्न के अनुसार उन शिव-मंदिरों की संख्या 365 है ।
यही नहीं अब उस इलाके में बढ़ते पत्थर के खनन से एक डर व्याप्त है कि वो खनन माफिया इस धरोहर को मतलब के आड़े पुनः ध्वस्त कर खत्म ना कर दें ।
कई तरह के विस्फोटकों का इस्तेमाल जिन्हें पत्थरों को तोड़ने के लिए उपयोग किया जाता है, ज़मीन पर एक बहुत ही भारी कपंन पैदा करते हैं, जिसकी वजह से मंदिर के आधार प्रभावित हो रहे हैं।
 
ख़ैर मुझे अभी आगे के और पड़ावों पर बढ़ना है तो ...एक उम्मीद के साथ बढ़ रही हूँ कि मेरे लिखने के बाद कोई तो वहाँ समय निकाल कर पँहुचे या मेरी उठाई आवाज "पुरातात्विक विभाग" के अधिकारियों तक कि वो आयें और सहेजे इस ऐतिहासिक सुंदरता व कला के नमूने को ।
 
क्रमशः..... प्रीत के देशी रंग प्रीत के संग
 
 

- प्रीति राघव प्रीत