प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जनवरी 2019
अंक -50

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

संस्मरण
गुनिया कहाँ है?
 
वो बड़े अजीब दिन थे, गुुनिया के चीखने-चिल्लाने से ही आँख खुलती थी। “मार-मार और मार, तू और कर ही क्या सकता है”, सुबक-सुबक कर गुनिया और ज़ोर लगा कर चीखती। कानों को फाड़ती उसकी आवाजें पूरे मकान के लोगों को हरकत में ला देतीं। वो चौक में पड़ी बड़ी बेरहमी से पिट रही होती डंडा, झाड़ू, तख्ती, लात -घूंसे सब कम पड़ जाते। पीछे से गुनिया की अम्मा दाँत पीस-पीस कर बोलती 'और लड़ा जुबान'।
 
वो ऐसी धाराप्रवाह हिन्दी बोलतीं कि क--ख भी समझ न आता, बस चुनिंदा लफ़्ज़ों के अलावा। झाँसी का रहने वाला यह परिवार कौनसी हिन्दी बोलता है? मेरा पाँचवी कक्षा में पढ़ने वाला दिमाग़ कभी समझ ही न पाता। कभी गुनिया अपने बाउजी पर भारी तो अक्सरहां बाउजी ही गुनिया पर भारी दिखाई देते। यूँ भी किसी का ज्यादा वश नहीं चलता था। मेरी अम्मा, यानि दादी और नीचे चीतो की अम्मा ने बहुत समझाया। कई बार बीच-बचाव किया पर वो माने नहीं। छज्जे पर खड़े सब हम बच्चे, माँ, चाची और ऊपर खुट्टर की अम्मा सब चिल्लाते रह जाते पर साँप और नेवले की दुश्मनी चलती रहती।
 
पूरे मकान में किरायदारों की भीड़ लगी थी। एक एक परिवार में सात-आठ बच्चों से कम न थे। हम भी पाँच भाई-बहन थे। मैं सदा सोचती कि ये गुनिया ही क्यों रोज़ पिटती है? बाकी तो कोई नहीं? बेवजह रोज़ ही रोज़ क्यों? दरअसल गुनिया बड़ी ही अलग थी। उसको अपने मन की बात कहने की ही सज़ा मिलती थी। "मैं बालों में कड़वा तेल नहीं लगाउंगी, मुझे गोले का तेल चाहिए।"
उसके बाउजी ठहरे परम कंजूस! बेटे की चाहत ने पाँच-पाँच बेटियों की लड़ी लगा दी थी। तब कहीं जाकर उपरवाले ने उनकी गुहार सुनी और पप्पू पैदा हुआ। पप्पू के लाड़ निराले थे, जो गुनिया की समझ से बाहर थे। वो अपने माँ-बाप से जिरह करती।
"पप्पू को टट्टी करने के बाद धोया क्यों नहीं जाता, रुई की बत्ती बनाकर गोले का तेल लगाकर पोंछा क्यों जाता है? कहाँ का लाट साहब है ये।" फिर तुर्रा ये कि वो टट्टी से लिसी गन्दी बत्ती मुझसे ही क्यों फिंकवाई जाती है, गुल्लो से क्यों नहीं। उसके तर्कों के आगे बाऊजी की मार ही जवाब होता था और तब मैं भी सोचती 'ये उल्टा भी तो कर सकते हैं। हमारे भी तो चुरने काटते हैं तो अम्मा कड़वे तेल की बत्ती लगाती हैं। गुनिया गलत तो नहीं कहती। फिर उसके बाउजी भी सारे काम गुनिया से ही क्यों कराते हैं?' 
 
उनके घर में सुबह पतली-सी चाय बनती थी, तब पीतल के बड़े-बड़े गिलासों का ही रिवाज़ था। स्टील और प्लास्टिक तो आया भी नहीं था। आधे से भी कम चाय वाले उस गिलास से न किसी का मन भरता न पेट। दस बजते-बजते खाना बन जाता। बारह महीने सुबह शाम एक ही मीनू- आलू का साग और रोटी। आलू में मिर्च इतनी कि पानी ही आधा पेट भर दे। गुनिया को बारह महीने सुबह-शाम सिर्फ आलू खाने अच्छे नहीं लगते थे। जब कभी वह दाल माँगती तो पिटती थी। पता नहीं क्यों जैसे उसे पीटने के लिए बहाना तलाशा जाता था या कि उसकेअम्मा-बाउजी उससे चिढ़ते थे। अगर कोई बच्चा एक रोटी ज्यादा माँग ले तो गुनिया की अम्मा तुरंत झाड़ू उठा लेती और उलटी तरफ से मुँह में ठूंसने लगती, "ले,ले ये खाले। घनी भूख लगी है, ले खा।" बेचारा बच्चा डर के मारे चुप हो जाता। पर गुनिया सबके लिए बोलती। उसका प्रतिरोध ही उसका दुश्मन था। 
 
उसे हमेशा सिखाया जाता, “लड़की की जात है! जबान तालू के नीचे दबाकर रख। पराये घर जाना है। कम खा, गम खा”। पर गुनिया को दाल भी खानी थी और पेट भर खाना भी। सुबह के दस बजे से शाम के पाँच बजे तक खाने को कुछ नहीं। दोपहर का स्कूल था। दिन रोटी से न सही टीचर की डाँट से पेट भर कर साँझ में बदल जाता था। लड़की को पढ़ाई से क्या। कॉपी किताब क्यों ख़रीदी जाये? नाहक पैसा क्यों फेंका जाये? उसे न कभी दाल मिलती न गिनती से फालतू रोटी। सारी भरपाई मार कर देती।
पर गुनिया का दिल बहुत बड़ा था। मुझे आज भी याद है, मैं पहली कक्षा में थी। हमारी टीचर बहुत लड़ाकी और सख्त दिखती थीं। वो सब बच्चों को मारती रहती थीं पर बी सेक्शन की मैडम बहुत प्यारी थीं। पापा ने मेरा सेक्शन बदलवाने की कोशिश भी की, लेकिन टीचर ने मना कर दिया। मेरा स्कूल जाने का बिलकुल मन नहीं करता था। हमारा स्कूल दोपहर का था। मैं ग्यारह बजे से ही री-री करने लगती कि माथे में दर्द हो रहा है। माँ परेशान हो कहती कि “ठीक है, मत जा स्कूल।” बस मुझे मुक्ति मिल जाती। ख़ुशी भी दोहरी होती। यूँ कि एक तो बहनजी का कठोर चेहरा देखने को नहीं मिलेगा और दूसरे उनकी कव्वे-सी कर्कश आवाज़ से मुक्ति मिल जायेगी। बड़ा मज़ा तो ये होता था कि होमवर्क नहीं करना पड़ता था। ये डबल छुट्टी बड़ा आकर्षण थी।
 
ऐसे में ये छुट्टी के बहाने मुझे फँसा देंगे, सोचा न था। परीक्षा की घोषणा हुई होगी, अपने राम को क्या पता। एक रोज़ स्कूल गई तो पता चला कि हिन्दी का पेपर है। मेरे तो होश ही उड़ गये। ऊपर से मार ये कि 'गाय' पर प्रस्ताव लिखने को आ गया। उस दिन नानी-दादी सब याद आ गईं। रोज़ गाय को बची हुई रोटी, मटर के छिलके, आटे की बूर खिलाती थी। गाय को रोज़ देखने पर भी कुछ लिख नहीं पाई। बगल में बैठी गुनिया ने चट-चट चार वाक्य लिख लिए थे। वैसे लिखने तो पाँच थे। मैंने गुनिया से दिखाने को कहा और उसने गाय की तरह चुपचाप सारा प्रस्ताव टिपा दिया। उस दिन गुनिया की बदौलत जान बची, नहीं टीचर के फुट्टे की पिटाई खानी पड़ती।
 
मेरी गुनिया से खूब पटती थी हम दोनों गर्मियों की पूरी दोपहर डोलते रहते। घर के सब लोग दरवाज़े बंद कर अँधेरे कमरों में सोए रहते और हम दोनों नीम की मीठी निबोरी की तलाश में कहाँ से कहाँ पहुंचे रहते। मन के किसी कोने में अपनेपन की तलाश और प्रेम की चाहत उसे हमारे घर खींच लाती। चार बजते-बजते शाम की दिनचर्या शुरू हो जाती, अंगीठी सुलगती और खाना बनना शुरू होता। माँ खाना बनातीं तो हम बच्चे ठंडाई पीसते। कोई बाजार से बर्फ लाता तो कोई पापा के लिए सरदार हलवाई की दुकान से गरमा-गरम दालबीजी। अंगीठी पे चाय उबलती तो सिल-बट्टे तले ठंडाई। एक-एक गिलास हम जम कर पीते। पर यह सुख कभी-कभार ही नसीब होता।मध्यमवर्गीय परिवारों में ऐसी चीजें रोज़ नसीब नहीं होतीं। कभी-कभी मैं सोचती कि गुनिया ने कभी ठंडाई का स्वाद और मज़ा जाना होगा? उसे तो बस मैंने चाय पीते ही देखा था। कभी उनके घर मेहमान आते तो घर वालों को पहले खाना खिलाकर रसोई साफ़ कर दी जाती। बर्तन मांज दिए जाते फिर मेहमानों का स्पेशल खाना बनता। घर के लोगों को वह नसीब न होता।
 
गुनिया की अम्मा स्कूल की फ्रॉक घर पर ही सिलती थी। यूँ उन दिनों दरजी से कपड़े अमीर लोग ही सिलवाते थे।आम शगल घर पर कपड़े सिलने का ही ही होता था। दो महीने की छुट्टियों में सब घरों से मशीन चलने की आवाजें सुनाई पड़तीं। स्कूल की पढ़ाई खत्म होते ही लड़कियों को सिलाई सिखा दी जाती। गुनिया की अम्मा भी पाँचों लड़कियों की फ्रॉकें घर ही सिलती पर बटन का खर्चा बचाने के लिए वो फ्रॉक में कपड़े की तनिया सिल देती थीं और उन्हें ही बांध देती थी। गुनिया का क्लास में लड़कियाँ मज़ाक उड़ातीं।
“अरे! गुनिया के पिछवाड़े देखो। चार-चार मक्खियाँ बैठी हैं।”
न रेडियो, न टीवी, लगभग सभी परिवारों का यही स्तर था। मनोरंजन के सीमित साधनों में एक-दूसरे की टांग खींचना मुख्य अस्तित्व रखता था। गुनिया अपनी फ्रॉक में बटन लगाने की ज़िद करती, जो बड़ी नागवार गुज़रती। परिणाम जानने के बाद भी वो क्यों ज़िद करती, मुझे समझ न आता।
 
गुनिया के घर किसी भी लड़की को सिलाई नहीं सिखाई गई। सिलाई सीखने के लिए न केवल फीस की ज़रूरत पड़ती थी बल्कि कपड़ा भी चाहिए होता था। गुनिया की अम्मा के लिए सिलाई नहीं, बर्तन मांजना, कपड़े धोना, साबुन बनाना इन सब कामों में महारथ हासिल करना ज़रूरी था। यूँ सिलाई सीखने के लिए भी बड़ी किस्मत चाहिए होती थी। परिवारों में ये निर्णय माँ के होते थे, पर मुहर पिता ही लगाते थे। आखिर नोट तो उनकी जेब से ही निकलते थे। माएँ तो सब घर की गृहिणी ही थीं। गुनिया के पिता से क्या उम्मीद की जा सकती थी। गुनिया भी मन मार कर रह गई। हमारे मुहल्ले की रेशम बुआ सिलाई सिखाती थीं। दो रूपये महीने में छोटी लड़कियों को रुमाल सिलना और उस पर कढ़ाई करना सिखाती थीं। पूरी सिलाई का रेट पच्चीस रूपये था। माँ ने मुझे सिलाई  सिखवा दी। जब मैं कटाई-सिलाई करती, गुनिया की उत्सुकता उसे रोक न पाती। उसने बड़े जतन से मुझसे सीखकर अपने बाउजी का जांघिया हमारी मशीन पर सिला। कितनी ममता थी उसके दिल में अपने पिता के लिए। बदले में क्या उसका हृदय भी स्नेह की अपेक्षा से न भरा होगा?
 
उन दिनों छत का बड़ा सहारा था, ढेर के ढेर बच्चे शामों को छत पर चढ़े होते। आसमान गुड्डियों से रंगीन हुआ रहता। लड़के पेंच लड़ाते और लड़कियाँ गप्प। लड़के फिल्मों की कहानी सुनाते और लड़कियाँ लंगड़ी टांग खेलतीं। अम्माएं खाटों पर धँसी दुनियादारी की बातों में मशगूल खरबूजों के बीज छीलतीं। गुनिया खूब लंबी थी। चील की तरह झपट्टा मार कर सबको आउट कर देती। सब उसे चील कहते। गुनिया जिसके पाले में होती वही जीतता। सब अपने पाले में आने के लिए उसकी चिरौरी करते। बदले में अपनी चीज खिलाते। गुनिया के जीवन के यही कुछ पल थे, जब उसे अपने होने का अहसास होता। छत पर दूसरे बच्चों से घिरी गुनिया के होंठों पे हँसी और ख़ुशी का यही छोटा-सा समय होता।
 
जैसे साँझ पलक झपकते ही बीत जाती वैसे ही गुनिया की खुशियाँ। उसके अम्मा-बाउजी पप्पू के संग छत पर सोने के लिए धमक पड़ते। मकान के सारे लोग छत पर ही सोते। पर सब रात को आते। बस ये दुष्ट ही हमारे खेल बिगाड़ने चले आते। सब बच्चों को उदास कर देते। आते ही थोड़ी देर में ही सुराही खाली कर देते। बार-बार "गुनिया  जा सुराही भर के ला", एक ही वाक्य सुनाई पड़ता। तीन मंजिल सीढ़ियाँ उतर-चढ़ गुनिया कम से कम चार बार पानी भरने जाती। सब सोचते, "अरे इतना पानी ही पीना था तो ऊपर चढ़े ही क्यों? पड़े रहते नीचे ही। गुनिया क्या नौकर है?" दिन छुपते ही हमारे खेल बदल जाते। अब 'आई लव यू' या  'छुपन छुपाई' का खेल शुरू होता। पर गुनिया की अम्मा साक्षात् यमराज-सी सिर पे डटी रहती और हमें खेलने भी न देती।
 
गुनिया की सबसे बड़ी बहन सुषमा बहुत सुन्दर थी। आठवीं कक्षा में आते ही उसकी शादी तय हो गई। बड़ी खुश हो-हो कर बता रही थी कि सास ने उसे देखते ही कैसे अपने गले का हार निकाल कर उसे पहना दिया। मुझे आज भी याद है। बड़ा अजीब लग रहा था। इत्ती छिटकया-सी सुषमा और शादी! मौसियाँ तो बड़ी थीं शादी के वक्त। पर उस छोटे से दिमाग़ ने कुछ ही समय में सब भुला दिया। नहीं भुला पाया कि आखिर गुनिया इम्तिहान में क्यों नहीं बैठी जबकि मैंने उसे अपने पास से कॉपी-पेन भी दिया था और पढ़ाया भी था। जब उसकी अम्मा से पूछा, तो एक लप्पड़ दिखा कर भगा दिया।
 
मेरे पिता एक अध्यापक थे। दादाजी ने भले ही हवेली-सा मकान बना दिया था पर बचपन से ही अपने पैरों पर खड़े होने की ज़रूरत समझ आ गई थी। पता नहीं कैसे। पापा छोटे भाई को कहते “पढ़ोगे नहीं तो क्या झल्ली ढोओगे”। लिहाजा पढाई में समय ज्यादा और खेल में कम बीतने लगा। सुषमा की सास को बेटे के विवाह की जल्दी थी। कुछ ही दिनों में सुषमा की शादी हो गई। उन्होंने अम्मा का कमरा भंडार-घर बनाया था। थाल के थाल मिठाइयों से भरे वहाँ पहुँचाए जाते और हम ललचाते ही रह जाते। शादी के कई दिन बाद वो कमरा खाली हुआ। बस आले में एक लड्डू रखा रह गया। हमें लगा कि वो भी जायेगा पर वो वहीं पड़ा सूखता रहा। गुस्से में हम बच्चों ने उन्हें अपना लड्डू ले जाने को कहा तो गुनिया की अम्मा बोली कि उसका हलवा बना लो। माँ ने उसे सिल पर बट्टे से कूट कर कढ़ाई में भून कर हलवा बना डाला।आह! कितना स्वाद था वो हलवा। आज भी उस लड्डू की याद ताज़ा हो जाती है।
 
सुषमा बड़े घर में ब्याही गई थी। खाने-पीने की कोई कमी न थी। गुनिया बार-बार सुषमा के घर चली जाती या कहो कि भेज दी जाती। इसी वजह से उसका स्कूल से नाम कट गया। अब गुनिया बहुत कम नज़र आती। पहले कई-कई दिन, फिर कई महीने। पूछने पर एक ही उत्तर मिलता- मेरठ गई है, सुषमा के पास रहने। अचानक एक दिन खबर मिली कि गुनिया की भी शादी है। अरे! इतनी जल्दी। पहली बार मैंने उसकी अम्मा को उसके बालों में गोले का तेल लगाते देखा। सर्दियों की दोपहरों में हमारी छत पर बड़ी रौनक होती। गाजर-मूली, मूंगफली, तेल, पानी, काटने वाले साग, चटाई, बिनने वाले स्वेटरों की ऊन-सलाई पूरे ताम-झाम के साथ सारे मकान की औरतें और बच्चे छत पर धमक  पड़ते। सब बच्चों के सर पर तेल रगड़ा जाता। गुनिया के सर पर बड़े भूरे रस्सी जैसे छोटे बाल थे। खूब भर-भर कर तेल लगा। उसकी अम्मा ने गुनिया के बालों की काया ही पलट दी। कुछ ही महीनों में न सिर्फ वो लम्बे हुए बल्कि काले भी हो गए।
 
जिस दिन गुनिया की शादी थी, हलवाई चौक में आलू तल रहे थे। मठरी, कचौरी, लड्डू और बालूशाही के पकवान से भरे थाल तैयार हो गए। पहली और दूसरी मंजिल से कई चोर आंखें ललचा रही थीं ऐसा नहीं था कि मैं उनके आकर्षण और लालच से परे थी पर मेरी चेतना का केंद्र बिंदु भिन्न था। गुनिया की किसी दूर के कस्बे में शादी हो रही थी। सुना था कि उसका पति बड़ा काला था पर उसकी परचूनी की दुकान खूब चलती थी। मुझे इन सब चर्चाओं में कोई रुचि नहीं थी। बस संतोष था कि इस घर से उसे मुक्ति मिलेगी पर ये ज़रूर लग रहा था कि न जाने फिर कब मिलना होगा। ऊपर की मंजिल पर रहने वाली खुट्टर तो शादी होके गई तो बरस बाद ही लौटी थी, वो भी एक बिटिया लेकर। मन बड़ी उहापोह से भरा था। किससे पूछूँ! ऐसे ही प्रश्नाकुल मन ने गुनिया की बिदाई स्वीकार की। गुनिया भी चली गई शादी करके। छह महीने बाद जब वो आई तो वो गर्भवती थी तब भी मैंने देखा वो दाल-चावल खाने की ज़िद कर रही थी। पहली बार उसके बाउजी को मुलायमियत से बोलते सुना। "बेटा, जिद मत कर, साग से ही खाले।"
 
ऐसे ही पता ही नहीं चला कब दिन कूद-फांद कर बढ़ते गए। यूँ तो दिन पहाड़-सा नज़र आता था लेकिन कैलेंडर बदलते वक्त लगता कि कैसे इतनी जल्दी पूरा एक साल बीत गया। अभी तो हैप्पी न्यू इयर मनाया था। मैं ग्यारहवीं क्लास में आ गई थी और उस साल बोर्ड की परीक्षाएं थीं। पूरी जान डाल कर पढ़ाई करनी थी। नम्बरों पर ही कॉलेज का एडमिशन टिका था। सर्दियों के दिन थे। एक दिन मैं अपनी किताब लेकर छत पर चली गई। तब तक सब लोग नहीं आये थे। गुनिया खाट पर अकेली बैठी थी। चुपचाप, शांत, तृप्त और परिपूर्ण। लाल बिंदी-सिंदूर लगाये, साड़ी पहने बड़ी सुन्दर लग रही थी। पर अब पहले जैसी बातें न थीं पर मन वही था। अंतर था तो इतना कि अभावों के भर जाने से शांत, सागर -सा चेहरा, कांति बिखेर रहा था। सूरज की पीली धूप और हलकी-सी गरमाई सारे माहौल में पसरी पड़ी, एक अलसायापन उत्पन्न कर रही थी। गुनिया और लड़कियों की तरह चहक-चहक कर बातें नहीं कर रही थी। विवाहित जीवन ने उसे अतिरिक्त गंभीर बना दिया था। कुछ भी पूछो, वह बस मुस्कुरा देती थी।
 
मैं खुश थी उसके इस नए जीवन से। कुछ समय पश्चात उसके बाउजी मकान खाली कर अपने मकान में चले गए। सुना था बहुत दूर था उनका मकान। कई साल बाद अचानक एक दिन गुनिया दिखी। हम राजस्थान में 'तिजारे' का मंदिर गए थे। वहाँ गुनिया भी आई हुई थी। अब उसके दो बेटे थे। गुनिया खुश थी और अपनी सहेली के सुख को अनुभव कर मैं भी। वक्त बीतता गया। जीवन की प्राथमिकताएं बदलती गईं। गुनिया अब कभी-कभार ही याद आती। लेकिन बीती कहानी के कुछ पन्नें अचानक एक दिन एक झोंके-से फड़फड़ा कर खुल पड़े।
 
परीक्षाएं नजदीक थीं। मैं कॉलेज जाने के लिए जैसे ही घर से निकली, गली की प्रेसवाली ‘शरबती’ की आवाज़ कानों में सुनाई दी। वह हाथ नचा-नचा कर ज़ोर-ज़ोर से बोल रही थी। उसी लय में उसका बिहारी की विरहिणी नायिका-सा कृशकाय शरीर रह-रह कर हिल उठता था।
“अरे! वो तो पागल थी। उसकी अम्मा तो झूठ बोलती थी कि बहन के ससुराल गई है। वो तो बार-बार अस्पताल में भर्ती होती थी। मैंने खुद देखा था उसे मेन्टल वार्ड में।” और चीख-चीख कर अस्पताल का नाम भी बताने लगी। “तभी तो शादी कर दी जल्दी-से। उसके बाऊजी ने तो उसे मार-मार कर पागल कर दिया था”। 
 
मैं चौंक उठी। मेरे मानस-पटल पर गुनिया के अनेक चित्र अटकने लगे। अब समझ में आने लगा, क्यों गुनिया लगातार चुप्पा-सी पड़ती गई थी! क्यों उसकी अम्मा गुनिया से किसी को बात नहीं करने देती थी। क्यों स्कूल से उसका नाम कटवा दिया था। गुनिया का वह सपाट और रंगविहीन चेहरा यकायक मेरी स्मृतियों में और अधिक सफेद हो उठा। गुनिया का पति बदहवास-सा शरबती के पास खड़ा गुनिया की तहकीकात कर रहा था। चार बेटे होने के बाद ऐसी किस परिस्थिति ने गुनिया को आघात दिया कि उसे पागलपन के दौरे पड़ने लगे। मेरा मन विचलित हो उठा।
 
अब गुनिया का क्या होगा? क्या इसका पति उसे छोड़ देगा? उसके बच्चों का क्या होगा? गुनिया के विवाह को सात बरस हो गए थे। अचानक क्या हुआ ऐसा? मेरे मन में विद्रोह उत्ताल तरंगें मार रहा था। कितने प्रश्न अपना जवाब पाने के लिए कुलबुला रहे थे। कब तक हमारा समाज नारी के मन-तन को मुहरा बनाता रहेगा? कैसी आसानी से एक माँ को ससुराल में ‘पागल’ की पदवी से विभूषित कर दिया जाता है। ज़रूर गुनिया हक़ के लिए आवाज उठा रही होगी। शायद संतान के किसी हक़ के लिए और उसकी आवाज़, उसकी माँग घोट दी गई होगी। जहाँ तक मैंने गुनिया को जाना था, उसने कभी किसी नाज़ायज़ चीज की माँग नहीं की थी। वह तो अपनी बहनों के लिए भी हमेशा सही बात के लिए ही बोलती थी। उसे पिटना मंजूर था पर ग़लत बात या ग़लत इल्ज़ाम स्वीकार करना मंजूर न था। वहीं वह अड़ियल घोड़े-सी अड़ जाती थी, जिसे चलाने के लिए चाबुक मार-मार कर सीधा करना ही सही माना जाता है।
ताकतवर लोगों का कमज़ोर पर प्रहार ही उन्हें बाग़ी बना देता है। जो काम प्यार से हो सकता है ,मार से नहीं। न यह गुनिया के बाऊजी ने समझा और न उसके पति ने।
पता नहीं कितने वक्त से गुनिया सह रही होगी! पर एक माँ की सहनशक्ति भरसक सहने की कोशिश करती है। लेकिन हमेशा नहीं। कैसे वह इस हालत का शिकार हुई जबकि वह बेहद खुश थी। मेरे पास प्रश्न थे पर गुनिया के पति के पास उत्तर नहीं। वह तो खुद प्रश्नों की पोटली बांध कर लाया था।
आज गुनिया कहाँ है? वह 'माँ' किस हाल में है? मैं नहीं जानती। छब्बीस बरस से मैं गुनिया के बारे में जानना चाहती हूँ।

- डॉ.बीना जैन
 
रचनाकार परिचय
डॉ.बीना जैन

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