प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जनवरी 2019
अंक -47

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन
आज बहुत दिनों बाद
 
आज बहुत दिनों के बाद
मैंने अपने पड़ोसी को दूध का पैकेट लाते देखा,
मोहल्ले के हलवाई को गरमा-गरम जलेबी बनाते देखा,
अख़बार वाले चाचा को साईकिल पर सवार जाते देखा,
नीचे वाली भाभी को बैठकर सब्जियाँ छाँटते देखा,
स्कूल वैन में खिलखिलाते-उछलते बच्चों को देखा।
 
आज बहुत दिनों बाद
मैंने मोहल्ले में उग आई
छोटी-छोटी गुमटियाँ देखीं,
मन्दिर में लगी नई घण्टियाँ देखीं,
मकान की चारदीवारी पर काँच की किरचें देखीं,
सड़क पर पड़ी कंक्रीट की परत देखी।
 
आज बहुत दिनों बाद
बेटी की नई चप्पल देखी,
दोस्त की सफ़ेद पड़ी दाढ़ी देखी,
माँ के चश्मे की टूटी डंडी देखी,
पत्नी की आँखों की झांइयाँ देखीं।
 
जी आप जैसा समझ रहे हैं
वैसा कुछ भी नहीं है
मैं शहर में ही था
कहीं बाहर से नहीं लौटा हूँ
बहुत दिनों बाद।
 
बस, मेरा स्मार्टफोन नहीं है
मेरे हाथ में कल सुबह से।
 
इसलिए दुनिया को 'देखने' का मौका मिल गया है।
 
फोन अस्पताल में है ठीक हो रहा है
और मैं इस असल दुनिया में आया हुआ हूँ
लगता है 'ठीक' हो गया हूँ।
 
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बहुत झगड़ालू होती हैं औरतें
 
बहुत झगड़ालू होती हैं औरतें
जब देखो तब झगड़ती रहती हैं
मेरी पत्नी मुझसे अक्सर झगड़ती है
जब मैं बाज़ार से समोसे, कचोरी और आलू की टिक्की ले आता हूँ
तो शुगर बढ़ने की बात कहकर लड़ लेती है
 
कितनी निष्ठुर है!
उससे परांठे माँगता हूँ, तली हुई चिप्स और साथ में भुजिया माँगता हूँ
तो कोलेस्ट्रोल का बहाना बनाकर मना कर देती है
अक्सर झगड़ लेती है
जब मैं दही, सलाद और फल खाने से मना कर देता हूँ
पता नहीं उसे क्या एलर्जी है मुझसे
रात 11 बजे फेसबुक चलाऊँ तो झगड़ती है
यू-ट्यूब देखूँ तो डपटती है
जैसे कि पूरे जमाने का डिप्रेशन मुझे ही हो
बहुत झगड़ालू है
एक दिन बीपी वाली गोली न लूँ तो लड़ लेगी
उसके लिए बिना वजह महंगी चीज ले लूँ
तो भी झगड़ लेगी
पता नहीं क्या चाहती है वो
किसी को चैन से नहीं रहने देती घर में
मन का कुछ भी तो नहीं करने देती
बेटी होमवर्क न करे, सेल्फ स्टडी न करे तो झगड़ लेगी
बहुत झगड़ालू है मेरी पत्नी
लगता है उसका काम ही है झगड़ना
अपने कपड़े खुद धो लूँ तो झगड़ा,
डॉक्टर के पास निश्चित दिन न जाऊँ तो झगड़ा,
उसके लिए रखी ठण्डी रोटी खा लूँ तो झगड़ा,
पता नहीं इतनी झगड़ालू क्यों होती हैं औरतें
 
मेरी पत्नी ही क्यों, मुझे तो सब ऐसी लगीं
कल बस में किसी ने छू दिया, तो झगड़ पड़ी एक औरत
कुछ दोस्त आपस में गाली-गलौज कर रहे थे
तो उनसे झगड़ पड़ी एक औरत
कोई गली के नुक्कड़ पर शराब पीकर कमेंट्स कर रहा था
उससे झगड़ पड़ी एक औरत
गली के लड़के नुक्कड़ पर ताश खेलें
तो उनसे लड़ पड़ती हैं कुछ औरतें
ये औरतें होती ही झगड़ालू हैं
 
आखिर इतनी झगडालू क्यों होती हैं ये औरतें?

- शिखर चंद जैन
 
रचनाकार परिचय
शिखर चंद जैन

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