प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
दिसम्बर 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

संस्मरण
आसमां का तारा
 
यही गर्मियों की रात, यही खुली विस्तृत छत, यही खुला विस्तृत आकाश और टिमटिमाते तारे भी...इन सबको देखकर मुझे बचपन के सुखद क्षण और अप्पा के साथ का संस्मरण हो आता है। इन टिमटिमाते तारों से ही जुड़ी है- मेरे मन की मुराद।
हम ग्रीष्मकालीन आवकाश पैदमा (मौसी) के घर ही बिताते थे। तब हम गर्मियों की रातों में सपरिवार कमरे की उमस से बैचेन होकर इस खुली विस्तृत छत पर ही पसर जाया करते थे। लेकिन मुझे नींद फिर भी नहीं आती थी। मैं तो अपने अप्पा के पास ही सोया करती थी और जब तक मुझे नींद न आए। तब तक उन्हें  भी सोने नहीं देती थी। अपनी तरह-तरह की बातों में उनको उलझाकर रखती थी।
 
अप्पा भी बहुत विनम्र थे। अपनी नींद को भंग करके मुझे सुनते रहते या कभी-कभी ऊँघने लगते तो मैं उन्हें झकझोर कर जगा देती और सोने नहीं देती। कभी उनको कहानी सुनाने का आग्रह करती तो वे या तो कल को टाल देते या फिर मेरी ज़िद पर अपनी नींद के लिए कोई उबाऊ कहानी सुनाने लगते। ताकि मैं बोर हो जाऊँ और उनका पीछा छोड़  दूँ और वो अपनी नींद पूरी कर सकें।
 
अप्पा तो मेरे बाल सखाओं से अभिन्न मित्र थे। अप्पा को अपना मित्र कहना क्या उचित होगा? वैसे अप्पा उम्र में तो मुझसे बहुत बडे़ थे। इतने बडे़ कि अगर साथ चले तो मेरी सखियाँ उनको दादा जी की संज्ञा दे दिया करती थीं।
खैर! मैंने उन्हें हमारे बीच की उम्र सीमा से परे हमउम्र ही समझा। पहली बात यह रही कि बचपन से ही मेरा स्वभाव इतना मिलनसार नहीं रहा था कि मैं सभी बच्चों को अपनी मित्रता के लिए उन्हें आकर्षित कर सकूँ। बचपन में बहुत कम या यों कह लें कि मैं गिने-चुने लोगों को ही अपना मित्र बनाती थी। हाँ, मैंने आगे चलकर ज़रूर अपनी इस बुरी आदत को सुधारा और अनेक मित्र बनाए।
 
दूसरी बात यह रही कि अप्पा में अपनी उम्र के अनुरूप गम्भीरता कम और बचपना अधिक था। वे तो मुझे एक अबोध बालक के समान ही लगते थे। मैंने अप्पा को हमेशा बालसखा के रूप में ही देखा। जब वे लूडो खेल रहे होते थे और अप्पा हार की स्थिति में पहुँच जाते थे। तब वे बालक के अनुरूप ही खेल जीतने की चेष्टा में चिन्तित दिखते और उनके माथे पर शिकन पड़ने लगती थी। इस खेल को जीतने के लिए अपनी पूरी जान झोंक देते थे। और यदि हमसे हार जाते तो बालक की भाँति ही मायूस हो जाते थे। उनका व्यवहार हम सबके साथ बाल सखा वाला ही था। उनके सारे बर्ताव में प्रौढ़ता कम और बालकपन ही अधिक झलकता था। इसलिए मैं यही कहूँगी कि वो मेरे बालसखा और अभिन्न मित्र ही थे।
 
रात को उनके पास सोने की जगह मिलना मेरे लिए परम सौभाग्य का क्षण होता था। रात को उनकी नींद को भंग कर अपनी बातों में उलझाकर रखने में मुझे बहुत आनन्द आता था। अचानक उनसे गहरी रात में मन में उपजे प्रश्नों के हल को पाने के लिए जिज्ञासु बनकर तरह-तरह के प्रश्न करना और अप्पा की अनोखी बातें सुनना। वैसे तो अप्पा को बच्चे बहुत प्रिय थे। वे हम सबसे भी बहुत प्यार करते थे। लेकिन नींद उनकी  प्रिय-सहचारिणी थी। मुझे अप्पा अपने जीवन के रिक्त समय में नींद लेते ही नज़र आते थे। इस पर पैदमा (मौसी) उन्हें कुंभकरण शब्द से अलंकृत कर चुकी थी।
 
सच कहूँ तो हम सब भाई-बहिन सारी रात अप्पा को अपनी बातों में उलझाकर रखना चाहते थे। अप्पा यह क्या होता है? अप्पा वो क्या होता है? अप्पा ऐसा क्यों होता है? इन प्रश्नों से वो बहुत परेशान हो जाया करते थे और नींद की लालसा में वो हमें एक कार्य सौंप देते थे।
वे हम सब से कहते थे कि "मैं देखता हूँ? तुम सब में से सबसे होशियार कौन है?"
हम भी उनकी इन बातों में उत्सुकता लेते हुए बोलते कि "अप्पा इसके लिए हम सबको क्या करना होगा?"
अप्पा बोलते- "जो इस आसमान के सारे तारों को सही-सही गिनकर बताएगा कि आसमान में कुल कितने तारे है? वो सबसे होशियार बच्चा होगा और मैं उसे पुरस्कार के रूप में पाँच रुपये दूँगा। ठीक है। तुम सब तारे गिनना शुरू कर दो। देखता हूँ, कौन सबसे पहले सारे तारे गिनकर बताता है। और हाँ, ईमानदारी से तारे गिनना कोई तारा छूटना नहीं चाहिए। छूट गया तो तुम हार जाओगे। मेरे तो सारे तारे गिने हुए हैं।"
 
मुझे तो अप्पा के इस नए खेल में बहुत रूचि होती। बस आसमान के तारे गिनने जैसी इतनी-सी बात! मैं तो चुटकी में गिनकर यह प्रतियोगिता जीत लूँगी और पाँच रूपये मेरे हो जाएँगे। वैसे मेरे लिए पाँच रूपये का कोई मुल्य नहीं था लेकिन अप्पा के द्वारा मिलना एक सम्मान की बात होती थी और वैसे भी बालमन तो लालची ही होता है। अप्पा कहते- "चलो, तुम सब अब तारे गिनने लगो। तब तक मैं सो जाता हूँ। जब तुम सब सारे तारे गिन लो तब तुम मुझे जगा देना।"
हम भी उन्हें सो जाने की अनुमति देकर हम सब भाई-बहिन जुट जाते आसमान के सारे तारे गिनने और अप्पा पूरी तरह से निश्चिन्त होकर नींद की अतल गहराईयों में गोते खाते-खाते गुम हो जाते अचेतना में।
 
यहाँ हम सब गम्भीर होकर तारे गिनने लगते थे और आसमां पर तारों की संख्या दर-प्रतिशत-दर बढ़ती ही जाती थी। उस वक्त जितनी हमें गिनती भी नहीं आती थी।तारों को गिनना बच्चों का खेल नहीं है। यह कहावत सटीक रहेगी।
तारों को गिनने में यह समस्या आती थी कि तारों को गिनते वक्त कभी यह तारा छूट जाता तो कभी वो तारा छूट जाता और हमारी सारी गिनती का क्रम ही टूट जाता। हम इतने सारे तारों को देखकर भ्रमित हो जाते थे। कौनसा गिना और  कौनसा नहीं गिन पाए?
 
मैं अपने भाई-बहिनों से प्रतियोगिता जीतने के प्रयास में और अप्पा की सबसे प्रिय बनने के चक्कर में तारों को ईमानदारी से गिनने में जुटी रहती थी। अप्पा के यह कहने पर कि एक भी तारा छूटना नहीं चाहिए। अगर कोई तारा गिनने के दौरान छूट जाता तो मैं कन्फ्यूज़ होकर फिर से एक से गिनती शुरू कर देती और फिर से सारे तारे की गणन में जुटी रहती थी। तारे गिनना कितना आसान लगता था। लेकिन यह बहुत कठिन काम था। आसमान में कुल कितने तारे है? मुझे इस सवाल को हल करना था ।वैसे तो अप्पा को भी आसमान के कुल तारों की संख्या नहीं ज्ञात होगी लेकिन मुझे लगता था कि अप्पा बहुत ही प्रतिभाशाली और बुद्धिमान हैं।
 
तारे गिनते-गिनते कब नींद आ गई और जब भोर को आँख खुली तो मैं अप्पा से आँख चुराने लगी कि कहीं अप्पा मुझसे यह न पूछ बैठे कि कल रात को आसमान के सारे तारे गिन लिए या नहीं? और यदि मैंने नहीं में उत्तर दिया तो अप्पा मुझे अपने भाई-बहिनों में मंदबुद्धि का समझेंगे।
लेकिन अप्पा हम सब से चुटकी लेने के लिए पूछ ही बैठे- "कल सारे तारे गिन लिए सबने? चलो, बताओ तो? आसमान में कुल मिलाकर कितने तारे है?"
तब मैं बोली- "अप्पा, मुझे तो तारे गिनते-गिनते नींद आ गई थी। देखना, आज रात को पक्का सारे तारे गिनकर बताऊँगी।"
 
अप्पा मेरे तर्क की मूर्खता पर मुस्कुराने लगे। लेकिन मैंने तो अपनी कितनी ही रातें आसमान के सारे तारे गिनने के प्रयास में बिता दीं। जब तक इस बात का न पता चला कि आसमान में तारे अनगिनत हैं। वैसे यह तारे गिनने जैसा काम उन लोगों के लिए उपयोगी सिद्ध होगा, जिन्हें अनींद्रा जैसी समस्या है। अगर एकाग्रता से आसमान के सारे तारे गिनने की कोशिश की जाए तो हम अचेतन हो जाएँगे और भोर को ही आँख खुलेगी।
 
एक दिन इन तारों से परेशान होकर अप्पा से शिकायत कर बैठी कि "आसमान के सारे तारे कैसे गिनूँ? आसमान में इतने सारे तारे हैं कि मुझे तो नींद ही आ जाती है। तुमने सारे तारों की गणना कैसे की?"
तब वे मस्कुरा कर बोले- "मेरा दिमाग़ तुम सबसे तेज़ है।"
मुझे तो यह सुनकर अप्पा के दिमाग से ईर्ष्या होने लगी। मैं भगवान से प्रार्थना करने लगी कि जब बड़ी हो जाऊँ तो मुझे भी अप्पा के जैसा तेज़ दिमाग़ देना।ताकि मैं आसमान के सारे तारे गिन सकूँ और अप्पा के होशियार होने के अहंकार को तोड़ डालूँ। वह हमेशा हर बात में अपनी बहुत बड़ाई करते थे और मुझे उनकी यह बात नापसन्द थी। माना वो हम सब बच्चों से बुद्धिमान थे लेकिन बार-बार हमको छोटा महसूस कराना ज़रूरी तो नहीं था। हम सब तो उनके समान सखा तुल्य थे।
 
अब हर रोज़ जब भी मेरी नज़र आसमान के तारो में जाती है तो मैं इन तारों को गिनाने वाले शख्स को तलाशती हूँ। अब अप्पा भी तो इस आसमां का तारा बनकर मेरे गिनने योग्य हैं। इन तारों में मेरे अप्पा भी तो शामिल हैं। पहले जब मैं तारे गिनती थी और प्रतिपल तारों की संख्या बढ़ती ही जाती तो मैं यह समझती कि यह आसमान के तारे मुझसे छल करते हैं। आसमान के झाग में छुपे रहते है और फिर मेरा कन्फ्यूज़न बढ़ाने के लिए ख़ुद बाहर निकल आते हैं ताकि मैं उनको गिनने में सफलता प्राप्त न कर सकूँ और तारों को ऐसा करने आनन्द आता है। उस समय मुझे तारों की ऐसी हरकतों पर बहुत गुस्सा आता था। मुझे अप्पा को सबसे पहले तारे गिनकर जो बताने थे।
 
अगर मैं अब अप्पा को तारों के साथ गिनूँ तो वो मुझे बड़ी सरलता से ख़ुद को गिनने देंगे। पता नहीं इतने सारे तारो में कौनसा तारा मेरे अप्पा है? जो मुझे टिमटिमाते हुए देखकर मुस्कुरा रहे हैं।
 
 
(अप्पा शब्द का तमिल भाषा में शाब्दिक अर्थ पिता होता है। लेकिन उनके बच्चे उनको अप्पा कहते थे तो हम सब भाई-बहिन भी उनको अप्पा कहने लगे थे।)

- तुलसी पिल्लई
 
रचनाकार परिचय
तुलसी पिल्लई

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