प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
दिसम्बर 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन
दो किनारे
 
मैं और तुम
नदी के दो किनारे जैसे
जो सिर्फ़ देख
और महसूस कर सकते हैं
एक-दूसरे को बस
छू नही सकते
 
हमारा प्रेम
लहरों के उफ़ान-सा उठकर
पुन: उसी नदी में खो जाता है
और हमारी उम्मीद भरी चाहत
एक-दूसरे से मिलने की
फिर एक मीठा-सा इंतज़ार
कि नदी का वो मोड़
जहाँ
तुम-हम सबसे पास होते हैं
जहाँ सिर्फ छूने की देर है
पर छूना नहीं चाहती तुम्हें
क्योंकि
नदी का प्रवाह ही हमारी गति है
और फिर ये मत भूलो तुम
कि हम किनारें हैं
सिर्फ किनारे
 
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तुम्हारा ख़्वाब
 
तुम्हारा ख़्वाब
कंपकपाती ठंडी रातों में
सर्दी की गुनगुनाती धूप जैसा
और कभी
उस व्यस्तता की धूप में
सहलाता, गर्मियों की ठंडी
और रेशमी रातों-सा
और कभी-कभी
उस रिमझिम सावन की
अनवरत झड़ी जैसा
और मैं अपलक-सी
निहारती रहती हूँ स्वयं को
तुम्हारे साथ हर मौसम में
जबकि मैं ये भी जानती हूँ
कि हक़ीक़त में तुम
कहीं नहीं हो फिर भी
न जाने क्यूँ?
मैं सोचती हूँ तुम्हें
और अब शायद यही सोच
मेरी दिनचर्या बन चुकी है
 
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तुम, तुम नहीं, मैं हूँ अब
 
तुम, हाँ तुम, तुम नहीं,
मैं हूँ अब
नहीं तो सोचती नहीं तुमको
इस तरहा
तुम्हें ही देखना चाहती हूँ
तभी तो मेरी हँसी में
खिलखिलाती है
तुम्हारी वो निश्छल हँसी
इसलिए
अब और भी
मुस्कुराने लगी हूँ मैं
मेरी उदासी को
आज भी
तुमने ही सहारा दिया है
अपनी बाँहों का
तभी तो
महसूस कर पाती हूँ
तुम्हारा वो मखमली स्पर्श
मेरी अलहड़-सी अठखेलियों में
हर बार
हाँ, हर बार
तुमको ही तो देखा है
साथ चलते हुए
मेरे आज भी
लेकिन!
अब डरने लगी हूँ
इन सबसे
क्यों?
कोई उत्तर नहीं है मेरे पास
तुम जानते तो हो सब
फिर भी?
चुभने लगीं है अब तन्हाइयाँ
तुम खो गये मुझसे
या छोड़ दिया
मैंने ही तनहा तुम्हें
मानती हूँ गुनहगार हूँ तुम्हारी
पर पत्थर तो अब
मैं भी बन चुकी हूँ
बस......!
अब तो एक ही गुजारिश है तुमसे
देखो
माफ़ न करना तुम
वरना
छोड़ जायेगी
ये यादें तनहा मुझे
बस यही निशानी तो बची है तुम्हारी
और मेरा अस्तित्व
वो भी तो मिल चुका है इसी में
तुम्हें नहीं मालूम
क्योंकि
मैं अब मैं नहीं
तुम बन चुकी हूँ

- हेमा दाधीच
 
रचनाकार परिचय
हेमा दाधीच

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कविता-कानन (1)