प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
दिसम्बर 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

संपादकीय
इक बार तो मेरे सामने, मेरा ऐसा हिन्दुस्तान हो!
 
"दुश्मनी का सफ़र इक क़दम दो क़दम 
तुम भी थक जाओगे हम भी थक जाएँगे" (बशीर बद्र)
करतारपुर कोरिडोर का खुलना उस विस्तृत, अनंत आकाश का बाँहें पसार गले लगा लेना है जहाँ की ठंडी और उम्मीद भरी रात में विश्वास के असंख्य दीप झिलमिलाते हैं। यह उन सूनी आँखों से झाँकते लाखों सपनों को सच में बदल देने की सुखद आश्वस्ति भी है जहाँ एक भाई, दूसरे भाई के घर बेहिचक प्रवेश कर सकता है। जहाँ आस्था के दरबार में जाने और मत्था टेकने के लिए किसी की अनुमति की दरक़ार नहीं! ये वो लोग हैं जो दिलों में नफ़रतों की आँधियाँ लेकर नहीं चलते! इन्हें ग़र किसी से मोहब्बत है, इश्क़ है और हर वक़्त जिसकी आरज़ू में जीने की तमन्ना ये सीने में लिए फिरते हैं...वो है इंसानियत। इनके स्नेह के आँगन में सब खुलकर गले मिलते हैं। सही पहचाना! ये वही आम जनता है, जी....जो राजनीति के दलदल से बचते हुए अमन और शांति से जीने की बाट हर रोज जोहती है। 
 
नक़्शे पर उकेरी गई कुछ रेखाओं ने बस सीमायें ही नहीं बाँटीं, मज़हबों को बाँट दिया, दिलों को बाँट दिया, घर-परिवार को बिखेरकर रख दिया उन अरमानों को चकनाचूर कर दिया, जिनके पूरा होने की आस लिए देशवासियों ने स्वतंत्र भारत की दहलीज पर उल्लसित ह्रदय से सूरज की पहली किरण को चूम धन्यवाद दिया था 
न जाने क्या हुआ कि इसके बाद कुछ भी पूरा न हो सका, जो भी मिला...उसमें एक अधूरा और टूटा शख्स ही नज़र आता रहा।     
 
आख़िर बँटवारे से क्या हासिल है, सिवाय उम्र भर की ख़लिश के? ये दीवार इंसानों को नहीं, उनके भीतर की इंसानियत को भी बाँट देती है। जब बदले और क्रोध की भावना, जूनून बन उभरती है तो हर तरफ़ बस तबाही ही तबाही नज़र आती है। विध्वंस की आग और उससे उठता धुंआ दम ही तो घोटेगा। विनाश की मिटटी पर निर्माण की फ़सल कभी भी नहीं उगाई जा सकती! 
और वो, जिनके दिलों में नफ़रत कभी थी ही नहीं और जिन्हें इस आग में बरबस झोंक दिया गया, वे आज भी सीमा पार के उन अपनों के लिए तरसते हैं जिनके माथे पर राजनीति की काली भट्टी ने लम्बी जुदाई की गहरी- मनहूस लकीरें खींच दी थीं। इनकी आँखें आज भी उस चेहरे के लिए तड़पती हैं जिसकी हँसी देख इनका बचपन किलकारी भरा करता था। ये अब तक उस एक आवाज को सुनने के लिए बेचैन हैं जो कभी कानों में शहद- सी घुल जाया करती थी। 
 
आज अगर किसी ने एक क़दम बढ़ाया है तो हमें भी निस्संकोच चार क़दम उस ओर चलना चाहिए। बँटवारे के आँगन में स्वार्थ और घृणा की जो दीवार उठी है, वो उसे बनाने वाले नहीं बल्कि उसके दोनों ओर रहने वाले भाई ही गिरा सकते हैं। विभाजन की इन पक्की लकीरों को वर्षों से, नफरतों के पानी से इस क़दर सींचा गया है कि इनको तोड़ना आसान नहीं! पर इस दीवार के बीच यदि भरोसे की कोई एक खिड़की भी खुली रहे तो मुस्कान की उम्मीद तो बंध ही जाती है।  बशीर बद्र जी ने कुछ सोचकर ही यह लिखा होगा कि -
"दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे 
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों"
 
यह कल्पनातीत हो सकता है, कुछ की नज़र में गुस्ताख़ी भी; पर मैं अब भी उस भारत का सोच लेती हूँ-
जहाँ हम सब एक हैं।
जहाँ एक देश का नाम, दूसरे देश में गाली की तरह नहीं लिया जाता! जहाँ देशद्रोही और पाकिस्तानी समानार्थी के रूप में प्रयुक्त नहीं होते! जहाँ भाइयों में थोड़ा मनमुटाव हो जाने भर से वे स्वार्थी तत्त्वों को उनके दिलों के बीच ज़हर का बीज नहीं बोने देते।
जहाँ भारत का मतलब 'हिन्दुस्तान+पाकिस्तान' होता है!
 
जहाँ सीमाओं पर लगे घरों में उल्लास की ध्वनि सजती हो, बमबारी से कोसों दूर खुशियों से भरी डाली-डाली महकती हो, जहाँ न गोलियों की आवाजें, न दंगे, न उन्मादी भीड़ का भय हो कोई! हर तरफ़ चैन हो, अमन हो और सबका अपना-अपना आसमान हो!
या ख़ुदा! इक बार तो मेरे सामने
मेरा ऐसा हिन्दुस्तान हो!
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चलते- चलते: कोई दल हिन्दुओं को प्रसन्न करने में लगा है, कोई मुसलमानों को, कोई दलितों को...क्या यह प्रमाण पर्याप्त नहीं कि इन सबकी प्राथमिकता सूची में आम जनता आती ही नहीं और न ही किसी को 'देश' की कुछ पड़ी है! 
जिसकी बात न जमे उसे 'देशद्रोही' कह दो, बाकी काम तो जनता स्वयं कर ही देती है। कोई मुद्दा न सँभले तो विदेशी ताक़तों का हाथ बता दो या फिर उसे दबाने के लिए नया मुद्दा उछाल दो क्योंकि देश को 'ब्रेकिंग न्यूज़' और चटख़ारे की राजनीति में ही अधिक आनंद आने लगा है। किसने आज से सौ वर्ष पहले क्या किया,क्यों किया, किसके कहने पर किया और उससे किस-किस ने इतना कमाया...देश बस यही जानना चाहता है! भ्रष्टाचार, बढ़ते अपराध और महँगाई से उसे क्या लेना देना!! आप तो बस ये बताओ कि कौन कितनी अच्छी तरह से दूसरे को जलील कर सकता है, आरोप लगा सकता है, निकृष्टतम भाषा का प्रयोग कर अपने ही पद की गरिमा को गिरा सकता है क्योंकि हम 'भड़ास युग' में रह रहे हैं, जिसके आदर्श ईर्ष्या और कुंठा हैं। 
यहाँ का अन्नदाता सर्वाधिक निरीह प्राणी है और मनुष्यता की लाश पर गौमाता पूजनीय! हादसों की सूची लम्बी होती जा रही है और उसमें ये किस्से बस जुड़ते चले जाते हैं। समस्याओं के समाधान में कोई रुचि कहीं दिखती ही नहीं!  हो भी क्यों भला? जब यहाँ क़ायदे नहीं, फ़ायदे की राजनीति चलती है। 
अफ़सोस के साथ बीते इस वर्ष को विदाई! आगामी वर्ष के लिए थोड़ी उम्मीद अब भी साथ है
 

- प्रीति अज्ञात
 
रचनाकार परिचय
प्रीति अज्ञात

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