प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
दिसम्बर 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन
आखेट
 
तुम्हारा मन नींव है
मेरे प्रेम नीड़ की
 
तुमसे अलग मैं देखता नहीं
प्रकृति के रंग-रूपों को
एक बार मेरी भावनाओं के
रंगों वाले कैनवास से अलग
रख कर देखो तुम स्वयं को
और महसूस करो वो
जो तुमने मुझे दिया है
प्रणय के उपहारस्वरूप
चाहता हूँ कि तुम भी
वो टीस करो आत्मसात
जैसे प्रेम में डूबी
दो तितलियों को पकड़ ले
कोई हथेली मजबूती से
और झर जायें वो
अनुराग रंग पंखों से
जिनके मद में डूबी
वो रचती हैं प्रेम में परस्पर
परागणों के चुंबन से
मधु निर्माण सुनहरी-सा
जो पूरा करता है उन्हें
सार्थक जिससे अस्तित्व उनका
हाँ, तुम भी महसूस करो
वो जकड़न कि जिसमें
प्रणय के सारे पराग छीन लिये हों
किसी अनदेखे आखेटक ने
कठोरता से कुटिलतापूर्वक
अकस्मात्, ज्यों तुमने किया
संग मेरे कुछ यूँ ही
ये जानते हुए कि
तुम्हारा मन नींव है
मेरे प्रेम नीड़ की।
 
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चटखारे
 
चटनी-सी हो गयी है ना!
ज़िन्दगी निगोड़ी
चटपटी तीखी, सी-सी करती
सुखों के चंद लिबलिबे टमाटर
दु:खों का तीखा कसैला कांदा
अनुभवों का खट्टा-सा अमचूर
जलन का झर्राता, महकता लहसुन
उम्मीदों का धना तनिक सूखा, ज़रा हरियल
लालच के भुने हुए तिल
झूठ का भुरभुरा ज़र्र नमक
और
मक्कारियों, धोखों, कुटिलताओं की
हरी, लाल व काली मिर्चियाँ
समय का खुरदुरा सिल-बटना ले
पीसने लगे हैं महीन दर महीन
बस बँट-बँट के 
आँख के सूखते पानी के छींटे डालकर
हादसों के गरम टिक्कड़ों पर चिपड़ के
बना कर पुंगियों-सी लपेट गोल-गोल
गटकने लगे हैं
संग मजबूरियों के दूसरों की हर रोज़
चटखारों की कैसी आदत लग गयी है हमें!
 
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विदा
 
एक रस्म भर नहीं है
ये एक युग,
एक सदी की
संस्कार दूर्वा है
जो पल्लवित हो
एक आँगन से
दूसरे आँगन तक
परिपक्व होती है
बचपन से लेकर
जवानी तक की
देहरी का पुण्य
वो संकल्प है जो
मासूमियत, खिलौने,
अंतरंग रिश्तों की
एक साथ विदाई कर
पुनर्जीवन की
शपथ लेता है।

- प्रीति राघव प्रीत