प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
दिसम्बर 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन
अकेली स्त्री की आवाज़
 
भीड़ चिंतित नहीं
संकुचित व भयभीत हो उठी थी
उस तीव्र कम्पन से
जो किसी अकेली स्त्री के कंठ से गूँज रही थी
 
स्त्री के मौनिक-इतिहास के स्वरूप के बिगडने से
भीड़ व्यक्तिगत तौर पर बेहद डरपोक है
 
वह स्त्री को
तितलियों के जीवाश्मों तक खींच ले गयी
जिनके कंठ की उम्र नदारद थी
 
बस टूटे रंगीन पँखों की अधूरी उड़ानें थीं
जो या तो बेहद कम उम्र की थीं
या पत्थरों पर हल्का दाग़ तक नहीं लगा पायी थीं
 
भीड़ में अपनी आवाज़ को खोजती अकेली स्त्री
विलुप्त हो चुकी किसी भाषा की तरह है
 
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चित्त का विश्राम
 
चित्त के विश्राम को
पुष्प की तरह सूँघो
वह हर परागकण से लिपटकर
वृद्धिशील नाखूनों में कहीं अटक जायेगा।
 
उसे ओस की तरह पलकों से बीनो
वह हर बरौनी को भिगोकर
आँखों की आकाशगंगा में डूब जाएगा।
 
उसे तितली की तरह जी-भर मचलने दो
वह देह की कोमलता को छूकर
कठोर मौसम में दुबकना सिखाएगा।
 
उसे गौरेया की तरह फुदकने दो
वह देहरी-आँगन में सहज घुसपैठिये-सा
तुम्हारी देह के कोटरों में गूंज जाएगा।
 
उसे नग्न-शिशु की तरह पवित्र स्वीकार करो
वह ख़ुद से बतकही करता हुआ
एकांत में उचारे हुए शब्दों को अनाथ न होने देगा।
 
उसे साँप की केंचुली की तरह उतरने दो
वह देह की परतों से सरकता हुआ
अतीत की विस्मृत पृष्ठभूमि बन जाएगा।
 
उसे किसी वाद्य-यंत्र की तरह भी छेड़ो
वह आत्मा की परतों में सोए हुए
सौन्दर्य के संगीत को जगाता रहेगा।
 
चित्त के हर विश्राम को थामने का क्षण
सीधी धूप के नीचे स्वयं की छाया में सिमटने-सा है।
 
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अस्तित्व
 
समय के साथ
मात्र कोशिकाओं की उम्र ही नहीं ख़त्म होती है
धीरे-धीरे अस्तित्व के टुकड़े भी गलने लगते हैं।
 
कुछ टुकड़े होते हैं
अधपकी व टेढ़ी-मेढ़ी ईंट-से
वे न नींव बन पाती हैं, न दीवार
अस्तित्व का किला भी अक़्सर यही टुकड़ें ढहाते हैं।
 
कुछ टुकड़े
जो हमने सप्रेम भेंट किये
अपने सशक्त हस्ताक्षर के साथ;
कुछ टुकड़े
जो हमसे बलात हथिया लिए गए थे
वे अस्तित्व की चारदीवारी में शिलालेख बन जाते हैं।
 
कुछ टुकड़े
जो हद दर्जे के जिद्दी साबित हो चुके हैं
वे बार-बार मुमुक्षु बन जाते हैं;
मानो, रोज़ गंगा-घाट किनारे
जहाँ, घाट के पत्थर भी गंधाती हवा में ज़रूर गलते होंगे।
वहाँ, उन्होंने धुनि रमाते किसी औघड़ को
जीवन की भस्म से स्नान करते देख लिया हो।
 
अस्तित्व के इन जिद्दी टुकड़ों के लिये
श्मशान में ठंडी राख से 'फूल चुनते' हुए हाथ,
गंगा-घाट किनारे
जीवन-मृत्यु के संगम की एकलनिष्ठ व्याख्या है।
 
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बोध
 
जीवन
इसलिये विषाक्त न था
क्योंकि विष अनुपस्थित रहा था
 
जीवन
विषमय तभी हुआ
जब
इसका बोध हुआ!
 
बोध
गहन-तीक्ष्ण अंधकार में
शरीर की देहरी से बाहर रखा
बुद्ध का डगमगाता वह पहला कदम है
 
जहाँ आत्मा
विष-परिशोधन हेतु
एक बोधि-वृक्ष की अनवरत खोज में है।
 
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सुखचिह्न...मृत पुष्प की तरह ही
 
 
सुख को पाकर
चित्त इठला गया था
 
रोमकूपों से झंकृत होकर सुख देह पर यूँ बिखर गया
जैसे प्रिय ने बाँहों में भरकर
अपने उन्मुक्त हाथों से
गर्दन के पीछे इत्र मल दिया हो!
 
उस क्षण चित्त नहीं जान पाया था
परिणति उस पुष्प की
जो हाथों में आते ही मरने लगता है
 
और तदंतर हाथ में रह जाती है
मात्र गन्ध...उस पुष्प की!
 
स्मृतियों के ललाट पर अकिंत सुखचिह्न
अपने पदचापों से ज़्यादा
धीरे-धीरे गंध रूप में ज़्यादा पहचाने जाते हैं
किसी मृत पुष्प की तरह ही!

- मंजुला बिष्ट
 
रचनाकार परिचय
मंजुला बिष्ट

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कविता-कानन (2)