प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मार्च 2015
अंक -49

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आओ धर्म-धर्म खेलें: आशा पांडे ओझा
इन दिनों धर्म को लेकर खेली जा रही राजनीति व सारे दाँव-पेंच गुजरी 20 सदियों का शायद सबसे घिनौना खेल है। जिस भी समाज, धर्म, मनुष्य को देखो
अपने-अपने धर्म का एक झंडा बहुत गहराई से गाड़ने की कोशिश कर रहा है। जैसे अचानक इन्ही दिनों उनका धर्म समूल नष्ट हो जाएगा, जो उसने धर्म-धर्म
का राग ना छेड़ा। हर पहला आदमी दूसरे को धर्म की याद दिला रहा है।
कहने को चाँद-तारों पर पंहुच गये, ग्रह नक्षत्रों को अपने वश में कर रहे हैं पर हमारी दकियनुसी सोच नहीं बदली। नहीं बदली हमारी मानसिकता। आदमी
जितना ज्यादा पढ़ा लिखा हुआ, उसकी मनुष्यता की पीठ पर धर्म नाम का फोड़ा भी तेजी से उभरा और उस फोड़े की ऊंचाई में मनुष्यता नाम की पीठ गुम हो गई। अचानक पिछले पांच-छ सालों में मैंने सबसे ज्यादा हौवा जो देखा-सुना-पढ़ा-समझा वो धर्म था। धर्म चाहे यहूदी, जैनी, हिन्दू, इस्लाम, इसाई,
बोध किसी भी धर्म को ले लो सबके अपने-अपने मठाधीश उनकी अपनी-अपनी डफली, अपने-अपने राग, अपनी-अपनी गूंगी-बहरी-अंधी भीड़। बल्कि मैं यह कहूँगी कि सोशल साईट व मिडिया ने भी इन बकवास बातों को सबसे ज्यादा तवज्जो दी। इस खेल को खेलने के लिये बढ़िया लम्बा-चौड़ा मैदान दिया फेसबुक, ट्वीटर, ब्लोग्स ने। जहाँ एकदम तानाशाह की तरह सबका निरकुंश व्यवहार। एक और चीज जो शिद्दत से महसूस की इन दिनों, वह थी गाली-गलौच व अमर्यादित भाषा जो शब्द कभी देखे-पढ़े-सुने न थे, सोशल मिडिया ने उनसे भी रूबरू करवा दिया। यह बात तो सौ प्रतिशत सही है कि जिस किसी विषय का पक्ष उसे जितना प्रबल नहीं बना पता, उतना उसका विरोध उसे ऊंचाई दे देता है। सोशल साईट पर पक्ष व विपक्ष की त्वरित कार्यवाही पांच-पांच हजार की सबके पास अपनी-अपनी लिस्ट फेवर अनफेवर वाली। फिर भला कौन पीछे रहे! हंगामा भी बरपाया यहाँ। फतवे भी जारी किये। यहाँ अपराध हुआ। बहस हुई। अदालतें भी लगी सजा भी सुनायी।
वाह वाह यह बहुत बढ़िया दुनिया है जहाँ दोस्ती-दुश्मनी सब सेकेंड्स में होती हैं। दूजा यह कि हम अपने-अपने धर्म  के प्रति इन साइट्स पर आकर इतने
जागरूक हुए कि हमें यह भी जरूरत नहीं लगी कि हम यह भी जानें कि हम हमारे धर्म के बारे में कितना जानते हैं? "अंधे नु अँधा ढेरिया, दोई कूप पड़ंत"
हम धर्म का अर्थ समझे बिना, गूढ़ चिंतन किये बिना हमारा, श्रेष्ठ हमारा श्रेष्ठ का नारा बुलंद किये जा रहे हैं। मनुष्य अक्सर अपने धर्म का उसके भावों का सत्य-सौंदर्य देखने में असफल रहता है, बस हर प्रश्न के बदले प्रश्न करना जानता है। ना उत्तर जानता है, ना जानने की कोशिश करता है।
बहसबाजी करने के चक्कर में भूल जाता है आदमी कि विश्व के सारे महान धर्म मानव जाति की समानता, भाईचारे और सहिष्णुता का संदेश देते हैं। आज हर
सामान्य व्यक्ति जो थोड़ा बहुत खाता-पीता या दो चार या कुछ अधिक किताबें पढ़ा हुआ सोशल मिडिया पर है। जिसे खुद को निजी सोच या चिंता से धर्म से
कोई लेना देना नहीं वो सिर्फ अपने धर्म गुरुओं के कहने पर ऊँचे-ऊँचे हाथ उछालने लगता है। लम्बी-लम्बी दौड़ दौड़ने लगता है या अपने उस दोस्त की
बात की पुष्टि करने के लिए उछल-उछल कर कमेंट्स करता है, जिसकी लिस्ट में वो जुडा है या जिस धर्म से वो है। वह जानता है कि संसार में जन्मे पहले
पुरुष, स्त्री का कोई धर्म नहीं रहा होगा और हम सभी उसकी ही संताने हैं पर सच्चाई से दूर भागता है। और तो और आजकल धर्म की अधिकतर कक्षाएं भी
इन्ही साइट्स में लगती है। लाइक, कमेंट्स, शेयर भी आजकल धर्म को खतरे से बचाने का अच्छा प्रयास माना जाता है। अगर आप हिन्दू हैं तो लाईक करें..अगर आप मुसलमान हैं तो शेयर करें...आप इसाई हैं तो कमेंट्स करें ..वो भी अस्ल हों तो? पाक हैं तो? शुद्ध हैं तो? मतलब आपको अब आपके धर्म का
सार्टिफिकेट चाहिए तो, अपने धर्म में बना रहना है तो, यह सब कीजिये नहीं तो मान लिया जायेगा कि आप उक्त धर्मों के नहीं हैं। यह ये सोशल साइट्स
के लोग जो धर्म के तथाकथित प्रचारक हैं, आपको आपके धर्म से वंचित कर देंगे।
आज स्थिति यह है कि आपके सिद्धांत, आदर्श सब थोथे हैं, जो आपने धर्म-धर्म का खेल न खेला तो। इधर कुछ लोग हैं जो जबरन लोगों का धर्म परिवर्तन करा रहे हैं। अब जब आप मेरा मन नहीं बदल सकते तो आप मेरा धर्म बदलकर क्या नौ की तेरह कर लेंगे? ओह! धर्म की संख्या जो बढ़ानी है, फलां-फलां धर्म के इतने अनुयायी..जितने संख्या में अनुयायी उतना बड़ा धर्म, क्यों यही न? मेरी राय में दूसरे के धर्म का अपमान करना, दूसरे के धर्म को कमतर आंकना, वो ही लोग करते हैं जिन्हें अपने धर्म का जरा भी इल्म नहीं है। क्योंकि किसी भी धर्म में मानवता से बढ़कर कुछ भी नहीं माना गया। बस हमारे हाथ में लेपटॉप है, मोबाइल है, जेब में पैसा है, नेटवर्क है, सुविधाभोगी हम धर्म की बातें करते हैं। ज्ञान का अजीण भी होता है, कट्टरता का पेट भी फूलता है। अल्लाह, राम, जीसस को कोसते, पोसते, खीजते, कुढ़ते 21 वीं सदी का भी डेढ़ दशक जी लिया। हमें हमारे धर्मों की जितनी फ़िक्र है उतनी अगर आस-पास घट रही , विपदाओं, आभावों से जूझ रही मानवता, भूख से बिलखते परिवार, शिक्षा से वंचित बच्चे, छत से विहीन जिंदगियों की फ़िक्र हो जाये तो समझो बिना पढ़े ही हम अपने धर्म का मर्म समझ गये। जिनके पास भर पेट रोटी नहीं, मजदूरी उनका धर्म है। जिनके पास घर नहीं, जहाँ भी आसरा मिल जाये वो
उसका धर्म है। ठण्ड में ठिठुरते भिखारी या बेघर को हिन्दू-मुस्लिम किसी के द्वारा पहनने ओढने को मिल जाय, वही उस क्षण उसका धर्म है। किसी घायल को जो खून देकर बचा ले, वही उसका धर्म है। किसी भूखे को जो भरपेट भोजन खिला दे, वही उसका धर्म है। धर्म से बड़ी आवश्यकता है। आवश्यकता को इंसानियत पूरा करती है। अत: इंसानियत से बड़ा धर्म क्या हो सकता है? धर्म-धर्म का राग अलापते हुए पड़ौसी मुल्क ने खुद की जो हालत कर ली वो किसी से छुपी नहीं है। अब उनके सांप उन्हीं को निगल रहे हैं। उनकी कुल्हाड़ी उन्हीं के पाँव काट रही है। आज पाकिस्तान हर देश की नजर में अपराधी है, आंतकवादी है। धर्म की कट्टरता ने उन्हें इंसान ही नहीं रहने दिया। उनकी इस दुर्दशा को देखते हुए अब बारी है हमें अपने भी गिरेबान में झाँकने की। आज हमारी
भी कई संस्थाएं व उन्मादी लोग इस राह पर तेजी से चल निकले हैं। धर्म के नाम पर कट्टरता सिखा रहे है। धार्मिक उन्माद में अंधे होकर देश का विकास
तो रोक ही रहे हैं, नई पीढ़ी को भी गुमराह कर रहे है। हम आज ना संभले तो कल हमारे देश में हमारे ही लोगों द्वारा हमारा बुरा हाल होगा। अब चाहे सेक्युलर कहकर निकालो गलियां मुझे, पर मैं किसी भी जाति-धर्म-देश में धर्म के नाम पर फैलाई जाने वाली कट्टरता व इस अंधेपन की भर्त्सना करती हूँ। इस प्रवृति को पैशाचिक मानती हूँ। सबसे बड़ा धर्म मानवता है, उसे स्वीकार लो, इस तबाही से बच जाओगे। भारतीय धर्म का मूल मन्त्र मानवता है, जिसने भारत का नैतिक कद इतना ऊंचा किया, जो विश्व धर्म में, इतिहास में अनूठा है। पर आज हम अपने ही धर्म का मखौल उड़ाने में लगे हैं। न उसको पढ़ा, न समझा, न आत्मसात किया, चल पड़े उसका झंडा उठाकर अगर सही अर्थों में आप अपने धर्म को विश्व समुदाय के सामने रखना चाहते हैं, उसकी महता बताना चाहते हैं,
तो उसको पढो, समझो, खुद आत्मसात करो। उसके दुर्गुणों को छोड़कर गुणों को अपनाओ क्योंकि धर्म भी समय-समाज-सभ्यता के साथ अपने मायने बदलता है।
धर्म से बड़ा राष्ट्र होता है, राष्ट्र से भी बड़ी मानवता। उसको तो बिसरा ही दिया इन दिनों हम सबने।

- आशा पाण्डे ओझा