प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
दिसम्बर 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

उभरते स्वर
तेरी याद
 
आँख भर आती
तकते तेरी राह रे
रह-रह के आती है
मुझे तेरी याद रे
 
कुछ इस कदर
कुछ इस कदर खो गया तेरे स्नेह-जाल में
जैसे फंस जाती है मछली
जैसे फंस जाती है मछली मछुआरे के जाल में
 
तूने मुझे चलना सिखाया
तितली जैसे उड़ना सिखाया
दुनियादारी सिखा दी रे
 
स्वर्ग पा लिया
स्वर्ग पा लिया माते तेरे चरणों में
मैं धन्य हो गया
मैं धन्य हो गया तेरे इस निस्वार्थ प्रेम से
आँख भर आती है
माते तेरी याद में।
 
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गुजरा अतीत
 
कुछ यूँ अतीत में चला गया
मेरे सपनों का शहर
जहाँ कभी निजामों का
शासन हुआ करता था
 
वो गलियाँ, वो मोहल्ले, चौराहे
कभी हुआ करते थे मेरे
आज सब छूट गये पीछे
मेरे ख़याल
मेरे ज़ज्बात
यूँ बिखर-से गये कुछ रिश्ते
कुछ नाते और मेरे सपने
 
आज फिर से नई उमंग लाया हूँ
सुई-धागों से बुन रहा हूँ
कुछ नये रिश्ते, कुछ नाते
कुछ यादें और
मेरे ढेर सारे सपने
 
आज फिर मैं
कुछ यूँ ही अतीत में चला गया हूँ।

- रामडगे गंगाधर पिराजी
 
रचनाकार परिचय
रामडगे गंगाधर पिराजी

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उभरते स्वर (1)