प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
दिसम्बर 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

यात्रा-वृत्तान्त
तांत्रिकों का विश्वविद्यालय: चौंसठ योगिनी मंदिर, मितावली
 
 
दोस्तो!
 
एक अजब/ग़जब-सा सफ़र जो कि पूर्व निश्चित नहीं था, एक मौन तृप्ति-सी दी। मानो शिव की शक्ति बन सारा गरल उतार लिया हो मैंने स्वेच्छा व ख़ुशी से। यहाँ आध्यात्म की अनुभूति से ज़्यादा आत्मशांति एकत्र हुई।
शिव नाम सदा ही एक अलग-सी ख़ुशी देता रहा है, एक भरोसा कि ये हैं तो सब कुशल होगा। अपने-अपने विश्वास की बात है ये ख़ैर, मेरा बचपन से है। ये बम भोला औघड़ दिखावों से परे विशाल हृदयी अपार शक्तियों का एक विटप-सा मालूम पड़ता है, जिसने जगत भर की छाया कर रखी है। बहरहाल सफ़र की शुरूआत करते हैं।
 
जी हाँ, गढ़ी पढावली से आगे निकलते ही दूर एक पहाड़ी पर कुछ संरचना-सी दिखी और मन में स्वयं ये आया कि यही है मेरा अगला विश्राम। और जो रास्ता मैंने पकड़ा वो ग्राम 'मितावली' ले जा रहा था, जो थाना 'रिठौराकलां' के अंतर्गत आता है। सफ़र पर निकलने के पहले भाई ने कहा था कि गर कोई दिक्कत आये तो फोन से बता दें, जिससे वो यहाँ थाना-प्रभारी को मदद को भेज सके पर ज़रूरत नहीं लगी। हमारे इस बदनाम चंबल इलाके में लोग बहुत सहज, सरल और मददगार हैं। पहुँचने लगे गंतव्य पर बिना किसी व्यवधान के, बस गर्मी थोड़ी बढ़ने लगी थी।
 
दोस्तो! हम सब अपने देश की राजधानी के संसद भवन की बाह्य संरचना से तो भलीभांति परिचत हैं। ब्रिटिश वास्तुविद् सर एडविन लुटियंस ने संसद भवन बनाया था। पर मैं पहाड़ी पर जिस जगह जा रही थी तो करीब आते-आते दिमाग में संसद भवन घूम गया। अब उत्सुकता थी कि ये दिल्ली के संसद भवन जैसा क्या है! ये उसकी नक़ल है या वो इसकी नक़ल। मानसिक ऊहापोह। तकरीबन 20-25 मिनिट में हम गाँव में बने इस पहाड़ी पर बने भवन के नीचे थे। पहाड़ी रास्ता तोड़ कर शायद सहज सीमेंट के ब्लॉक वाली टाइल्स का रास्ता बनाना अभी शुरू ही हुआ है। आगामी पाँच-छह माह में बन जायेगा सपाट रास्ता कि जीपें और गाडियाँ जा सकें। यहाँ स्वागत के लिये खुदाई में निकली एक विशाल मूर्ति खड़ी है नंदी देव की।
मगर हमारे लिये ऊपर देखने पर और पहाड़ की ही कटी टेड़ी, संकरी, बेतरतीब सीढ़ियों से भवन तक जाना असंभव-सा लग रहा था। गर्मी और ख़तरनाक रास्ता देख सभी ने हाथ खड़े कर दिये। हम दो लोग राजी थे पर अटकल आई कि दो फीमेल इतनी ऊँचाई पर ऐसे रास्ते कैसे जा सकती हैं! हाँ, सच कहूँ तो ड़र लगा भी अंदर से क्योंकि मैं अपनी इस डेस्टिनेशन का नाम अच्छे से जानती थी और यहाँ तक आ के बिना देखे जाना मेरे दिल को मंजूर नहीं था और मेरे इस स्वप्न का नाम था 'चौंसठ योगिनी' मंदिर, मितावली।
 
थोड़ी मनुहार पर और ऊपर पहाड़ी पर दीखते कुछ लोगों और उतरते कुछ युवा लड़कों को देख, हिम्मत और आई। फिर उन लड़कों से पूछा कि रास्ता कैसा है, सबने कहा ठीक है पर जा कर दिल ख़ुश हो जायेगा ऊपर। समझ गये थे कि कठिन तो है पर फल निश्चित ही मधुर होने वाला है। हैंडपंप के पास खड़े ग्रामीणों ने खाली हुई पानी की बोतलें भर दी थी हमारी और सूरज तो मानो अकड़ में था कि- आओ ठाकुर, आज आया है ऊँट पहाड़ के नीचे। हा हा। 
चलना शुरू किया हम चार लोगों ने पर पहाड़ में कटी सीढ़ियों पर हाथ पकड़ना मतलब नीचे गिरना था, सो सहारा ख़ुद का ही बस। कोई ऊँची तो कोई नुकीली, तिरछी हर तरह की सीढ़ी। हौंसले की डोर पकड़े चलते रहे और बहुत कम सीढ़ियाँ बची तब वहाँ गर्मी और प्यास से हमारा ही हौंसला डाँवाडोल हो लिया। बैठ गये, नीचे देख के दुख हुआ कि यार इत्ता ऊपर आ गये अब हिम्मत मत हारो, थोड़ी और जुटा लो। पानी पिया, बाकी सब हमसे ऊपर। मन में सच्ची बोले कि भोले बाबा अब यहाँ से न लौटाओ। ऊँ नमःशिवाय किया और एकदम तल्ख सूरज नम हुआ और ठंडी बयार। मानो शिव मेहरबान हुए हों और लम्बे पैर मार कर हम ऊपर। सब वहाँ पत्थर की बैंचो पर बैठे सुस्ता रहे थे जब हम पहुँचे। फिर सबने पानी पिया और पहाड़ी विशाल चबूतरे पर बने गोलाकार संसद जैसे मंदिर की ओर बढ़ लिये।
 
दोस्तो! 'चौंसठ योगिनी' मंदिर मुरैना ज़िला, मध्यप्रदेश का विशेष महत्व है। इस मंदिर को अस्ल में गुजरे तांत्रिकों का विश्वविद्यालय कहा जाता है सदियों से।कहते हैं कि पुरातन दौर में इस मंदिर में तांत्रिक अनुष्ठान करते थे, तांत्रिक सिद्धियाँ हासिल करने के लिए। और मेरे सुनने में ग्रामीणों से आया कि आज भी गुप्त नवरात्रों पर यह भूमि तांत्रिकों की सिद्ध भूमि है। यहाँ तांत्रिकों का जमावड़ा लगा रहता था और आज तक भी है। वर्तमान में कुछ लोग तांत्रिक सिद्धियाँ हासिल करने के लिए यज्ञ करते हैं। इसे 'इकंतेश्वर महादेव मंदिर' के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर की ऊंचाई भूमि तल से 300 फीट है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इस मंदिर को प्राचीन ऐतिहसिक स्मारक घोषित किया है।
 
इसका निर्माण तत्कालीन प्रतिहार क्षत्रिय राजाओं ने करवाया था। यह मंदिर गोलाकार है। इसी गोलाई में बने चौंसठ कमरों में हर एक में एक शिवलिंग स्थापित है। इसके मुख्य मंडप परिसर में एक विशाल शिव मंदिर है और इस मंडप भवन में एक नहीं, दो शिवलिंग हैं- एक बड़ा और एक छोटा। हमने यहाँ पर देखभाल करते एक ग्रामीण से पूछा तो पाया कि बड़ा शिवलिंग स्वयं शिव हैं और छोटा उनकी योगिनी हैं। हमारे लिये ये अनुभव अद्भुत था।
भारतीय पुरातत्व विभाग के मुताबिक़, इस मंदिर को नवीं सदी में बनवाया गया था। यह मंदिर 1323 ई में बना था। ऐसा माना जाता है कि भारत का संसद भवन (जो 1920 में बना) इसी शैली पर निर्मित है।
 
पहले हर कमरे में भगवान शिव के साथ देवी योगिनी की मूर्ति भी थी, इसलिए इसे चौंसठ योगिनी शिवमंदिर भी कहा जाता है। योगिनियों (देवी) की कुछ मूर्तियाँ चोरी हो चुकी हैं। कुछ मूर्तियाँ देश के विभिन्न संग्रहालयों में भेजी गई हैं। तक़रीबन 200 ऊबड़-खाबड़ सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद यहाँ पहुँचना दिल में सुकून-सा दे रहा था एकटक घूम-घूम कर देखते रहे। यह सौ से भी ज़्यादा पत्थर के खंभों पर टिका है तांत्रिकों का सिद्ध विश्वविद्यालय।
इतनी पुरातन वास्तु होने पर भी ये अंदाज़ा लगाना आसान रहा कि तब के वास्तुशास्त्र और विशेषज्ञ सच में उत्कृष्ट रहे होंगे। बारिश के पानी निकास तक को ध्यान रख कर प्रत्येक कोष्ठ में छत पर नालियाँ बनाई गयी हैं। मुख्य द्वार से जब वापिस बाहर आ कर मोज़री पहनी तो वहाँ के केयरटेकर ने कहा- जीजीबाई 'विश' माँगी के नहीं? हमने उन्हीं से मंदिर की सारी जानकारी नीचे चबूतरे पर ली थी सुस्ताते समय। हमने पूछा कि कहाँ! अंदर माँगते हैं क्या? तो वो पुनः मुख्य मंडप की सीढ़ियाँ चढ़ा कर ले गये और एक कोष्ठ के आगे पटिया सरकाई तो उसके नीचे बड़ा हवनकुण्ड छुपा था, जहाँ ताज़ा राख, पुष्प, बेलपत्र आदि थे। उन्होंने कहा कि इस राख को माथे पर लगा कर जो माँगना है माँगो ये सिद्ध शिव धाम है, यहाँ स्वयं भगवान शिव विराजमान हैं। यकीन होना तो निश्चित है। नाम लेते ही टूटी हिम्मत जो आ गई थी मुझमें। विभूति माथे लगा; सर्व कल्याण की प्रार्थना की और एक संतोष-सा समेट लाई आँचल में। बहुत-से लोग पहाड़ी पर मन्नत वाले घर बना गये थे, जैसे 'करह वाले बाबा' पर बना जाते हैं और 'दाऊ जी' पर। संतुष्ट मुस्कान के साथ दुआ की कि भोले बाबा सबकी मनौती पूरी कर देना पता न कौन किस मजबूरी और आस में आया हो कभी।
 
ग्वालियर से आने वालों के लिये बता दूँ कि यह स्थान ग्वालियर से करीब 40 कि.मी. दूर है। इस स्थान पर पहुँचने के लिए ग्वालियर से मुरैना रोड पर जाना पड़ेगा। मुरैना से पहले करह बाबा से या फिर मालनपुर रोड से पढ़ावली पहुँचा जा सकता है। पढ़ावली ऊँची पहाड़ी पर स्थित है और यहीं से ग्राम पंचायत मितावली, थाना रिठौराकलां।
 
दोस्तो! शिव की योगिनियों के नाम आपकी जानकारी के लिए लिख रही हूँ। ये जानकारी मैंने उत्सुकतावश गूगल से समेटी है क्योंकि सारे योगिनियों के नाम शायद ही किसी व्यक्ति को याद हों। गाँव में नहीं कर सका कोई इनका महिमामंडन। केवल पांच के लिखित साक्ष्य उपलब्ध होते हैं- दो ओडिशा में तथा तीन मध्य प्रदेश में। समस्त योगिनियाँ अलौकिक शक्तिओं से सम्पन्न हैं तथा इंद्रजाल, जादू, वशीकरण, मारण, स्तंभन इत्यादि कर्म इन्हीं की कृपा द्वारा ही सफल हो पाते हैं। प्रमुख रूप से आठ योगिनियों के नाम इस प्रकार हैं-
1. सुर-सुंदरी योगिनी
2. मनोहरा योगिनी
3. कनकवती योगिनी
4. कामेश्वरी योगिनी
5. रति सुंदरी योगिनी
6. पद्मिनी योगिनी
7. नतिनी योगिनी और
8. मधुमती योगिनी
 
चौंसठ योगिनियों के नाम-
1. बहुरूप, 2. तारा, 3. नर्मदा,  4. यमुना, 5. शांति, 6. वारुणी, 7. क्षेमंकरी, 8. ऐन्द्री, 9. वाराही, 10. रणवीरा, 11. वानर-मुखी, 12. वैष्णवी, 13. कालरात्रि, 14. वैद्यरूपा, 15. चर्चिका, 16. बेतली, 17. छिन्नमस्तिका, 18. वृषवाहन, 19. ज्वालाकामिनी, 20. घटवार, 21. कराकाली, 22. सरस्वती, 23. बिरूपा, 24. कौवेरी. 25. भलुका, 26. नारसिंही, 27. बिरजा, 28. विकतांना, 29. महालक्ष्मी, 30. कौमारी, 31. महामाया, 32. रति, 33. करकरी, 34. सर्पश्या, 35. यक्षिणी, 36. विनायकी, 37. विंध्यवासिनी, 38. वीर कुमारी, 39. माहेश्वरी, 40. अम्बिका, 41. कामिनी, 42. घटाबरी, 43. स्तुती, 44. काली, 45. उमा, 46. नारायणी, 47. समुद्र, 48. ब्रह्मिनी, 49. ज्वाला मुखी, 50. आग्नेयी, 51. अदिति, 51. चन्द्रकान्ति, 53. वायुवेगा, 54. चामुण्डा, 55. मूरति, 56. गंगा, 57. धूमावती, 58. गांधार, 59. सर्व मंगला, 60. अजिता, 61. सूर्यपुत्री, 62. वायु वीणा, 63. अघोर और 64. भद्रकाली।
 
 

- प्रीति राघव प्रीत