प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
दिसम्बर 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ज़रा सोचिए
रिश्ते बेशकीमती होते हैं
 
"बचपन से जुड़े बच्चों को मनाना कितना आसान होता है न मैडम, ज्यूँ ही ये बच्चे बड़े होते जाते हैं उतना ही इनको मनाना मुश्किल का सबब बनता जाता है।आपको पता है राहुल जब छोटा था तो हर बात उसको मुझसे साझा करनी होती थी। स्कूल से घर आते ही बैग को एक तरफ डाल जब स्कूल की प्रार्थना की घंटी के बजने से लेकर उसकी बातों का सिलसिला एक बार शुरू होता तो छुट्टी की घंटी बजने तक हर क्लास हर दोस्त से क्या-क्या बातें हुईं, कोशिश करता एक ही साँस में वो सभी बातें बोलता जाए और मुझसे अपेक्षा करता था कि मैं चुपचाप उसकी हर बात सुनकर अपनी प्रतिक्रिया दूँ। सुनती थी बहुत तसल्ली से और कभी-कभी उसकी शैतानियों पर डांट भी लगाती ताकि अगली बार ऐसी कोई गलती न करे।
 
मैडम! आपको एक बात बताती हूँ, तब राहुल झट से प्रॉमिस कर अपनी ग़लती को सुधारने की कोशिश करता। जितना डांटती उतना ही मेरे से चिपक कर मुझे आगे कोई ग़लती न करने के आश्वासन दे देता। मेरी डांट बहुत जल्दी भूल जाता था पर अब जैसे-जैसे बड़ा होता गया है मेरा बेटा, नाराज़ होने के अंतराल बढ़ते गए हैं उसके, जब तक बच्चा था झट मना लेती थी उसको। स्कूल पूरा होना तक कुछ घंटों में सही हो जाता और कॉलेज पहुँचने पर इन घंटो की अवधि लगभग पूरा दिन और नौकरी के बाद तो कई-कई दिन बात नहीं करता। सच सोचूं तो कई बार मुझे उसके नाराज़ होने की वजह भी पता नहीं होती और मुझे उसको मनाने का मौका भी कभी नहीं मिलता। शायद मेरी बढ़ती उम्र और उसकी अपनी व्यस्तताओं के बीच वो इतना परिपक्व हो चुका है कि उसको अपनी ज़िम्मेवारियों की समझ है और वो शायद संतुलन बनाने की कोशिश में मेरी नाराज़गी को चुप रहकर समय निकालता हो क्योंकि उसके मेरे प्रति कर्तव्यों की पूर्ति में कही कमी नहीं होती। दरअस्ल जैसा कि मैं सोचती हूँ, औरत की दुनिया इतनी उसके परिवार और बच्चों में सिमटी होती है और वो बच्चों के चेहरे की खुशियों को अपना जीवन मान कर जीती है। समझ ही नही पाती हूँ अब मैं कैसे किस बात का हल निकालूं। बहुत समझदार समझती थी ख़ुद को पर अब तो उलझ कर रह जाती हूँ।"
 
मिसेज कपूर को लगातार बोलते सुनकर मैं भी उनकी बातों में खो गई थी। जैसे ही उन्होंने चुप्पी साधी; एक प्रश्नचिन्ह उनकी आँखों में नमी के साथ तैरने लगा।अपने आपको संयत कर, मैंने मिसेज कपूर को शांत करने के हिसाब से उनको चाय के लिए पूछ लिया।
"आप चाय या कॉफ़ी कुछ पियेंगी मिसेस कपूर?"
"हाँ पी लूँगी...आपको पता है मैडम एक अरसा हो गया हैं राहुल को मुझसे बहुत अपनी-सी बातें किये हुए। जबकि हम अक्सर ही साथ खाना खाते हैं। कुछ ज़रूरी बातों के सिवाय हमारे बीच संवाद करने की स्थिति ही नहीं बनती। दरअस्ल बढ़ती उम्र के साथ शायद मैं आज भी राहुल के बचपन में जीती हूँ और उसके बचपन की आदतों में से, मैं निकल ही नहीं पाई हूँ क्योंकि जब राहुल आठ साल का था तब इसके पिता का देहावसान हो गया और मैंने अकेले ही इसको पालने की वजह से, इसको ही अपनी दुनिया बना लिया। मेरी तो आज भी यही दुनिया है पर इसकी दुनिया बहुत बड़ी हो गई है, होनी भी चाहिए क्योंकि इसके पास आगे बहुत कुछ करने को है पर मैं समझदार होकर भी इतनी नासमझ बन जाऊँगी, सोच नहीं पाती।" मिसेज कपूर ने अब चुप होकर मुझे किसी सुझाव की उम्मीद से देखना शुरू कर दिया था कि शायद मैं उनको कुछ सुझा पाऊँ।
 
किसी भी मरीज का मुझे अकेले देखकर लगातार अपनी बातों को बग़ैर मुझसे इजाज़त लिए बोलते जाना और मेरा शांत मन से उसको सिर्फ सुनना,  मुझे इस तरह किंकर्तव्यविमूढ़ कर देगा, मैंने कभी भी नहीं सोचा था। मिसेज कपूर की बातों और भावों से साफ़-साफ़ पता चल रहा था कि वो चाहते न चाहते हुए धीरे-धीरे किसी अवसाद की चपेट में हैं या आ रही हैं। उनको इस समय अगर इस तरह की सोच से हटाया नहीं गया तो भविष्य में एक पढ़ी-लिखी समझदार स्त्री की मानसिक स्थिति पर प्रभाव पड़ सकता था। मिसेस कपूर एक पढ़ी-लिखी महिला है इस बात का अंदेशा मुझे उनकी बातों से हो चुका था।
 
इन महिला के साथ सबसे अच्छी बात ये थी कि उनको पता था कि उनकी सोच उन पर हावी हो रही है और वो उससे निकलना चाहती थी। बाज़ दफ़ा तो महिलाएँ स्वयं को ही सही मान, बच्चों पर आरोप लगाने से नहीं चूकतीं। उनकी सभी बातें सुनने के बाद जब मैंने उनके बेटे को अंदर बुलाया तो वो भी मुझे उनकी ही तरह बहुत संतुलित व्यवहार का नज़र आया। मेरे पूछने पर कि- "तुम माँ को नाराज़गी प्रकट करने को कई दिन तक नहीं बोलते क्या?"
"नही ऐसा नही है, मेरे प्राइवेट फर्म में काम करने से अत्याधिक व्यस्तता रहती है जिसकी वजह से उनको समय न देने की वजह से मुझ पर पड़ती डांट और मेरा उनको जवाब न देना उनको बहुत व्यथित कर देता है चूंकि उनकी इस उम्र में, उनको मेरा कुछ भी समझाया बताया हुआ, हो सकता है उनको व्यथित करे तो मैं चुप रहकर उनके ठीक होने का इंतज़ार करता हूँ और माँ समझती हैं मैं नाराज़ हूँ। फिर भी अगर मैं ग़लत हूँ तो मुझे भी बताइये। मैं सुधार करूंगा।" 
राहुल ने मुझको बताया।
 
मेरे जीवन काल में कॉउंसिललिंग का पहला केस था, जिसमें दोनों के ही मन में दोनों की खुशियों की प्राथमिकताएं थी बस समयाभाव की वजह से दोनों के बीच रिक्त-स्थान भरने की कड़ी खो गई थी और मेरा काम बस उस कड़ी को बेटे के हाथ में थमाना था क्योंकि समयाभाव और माँ की भावनाएँ आहत न हो जाये इसी सोच में वह समाधान खोजने में असमर्थ था और यह भी सच है कि कई बार हमको किसी तीसरे व्यक्ति का समझाया हुआ कुछ ज़्यादा अच्छे-से समझ आता है। सो बस कुछ दिन थोड़ा-थोड़ा समय देकर मैंने दोनों के बीच उस अदृश्य से तार को पुनः बांध दिया कुछ छोटी-छोटी उन बातों से, जिनकी कड़ियाँ गुम हो रही थी।
 
समय परिस्थिति कैसी भी हो हमेशा हम सभी को खुले मन से एक-दूजे की बातों को स्वीकार कर जगह देने की कोशिशें करनी चाहिए। रिश्ते बेशकीमती होते हैं, उनके लिए हमेशा मन में सैकड़ों गुंजाइशें रख; उनकी बेतहरी के लिए जतन करते रहना बहुत ज़रूरी है। कुछ दिल से जुड़े रिश्ते रेशम के धागों से बंधे होते हैं, उनकी कीमतें और देखभाल हमें स्वयं से ज़्यादा होती है। सोचकर ज़रूर देखिएगा।

- प्रगति गुप्ता
 
रचनाकार परिचय
प्रगति गुप्ता

पत्रिका में आपका योगदान . . .
कविता-कानन (1)ज़रा सोचिए! (7)