प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
दिसम्बर 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

भाषान्तर
मूल पंजाबी से हिन्दी में रूपांतरित स्वयं की कविताएँ
 
 
शब्दों का इन्तज़ार
 
शब्द जब मेरे पास नहीं होते
मैं भी नहीं बुलाता उन्हें
दूर जाने देता हूँ
अदृश्य सीमाओं तक
उन्हें परिंदे बन कर
धीरे-धीरे
अनन्त आकाश में
लुप्त होते देखता हूँ
 
नहीं!
जबरन बाँध कर
नहीं रखता मैं शब्द
डोरियों से
ज़ंजीरों में
पिंजरों में कैद करके
नहीं रखता मैं शब्द
नहीं होते शब्द जब
मन को
खाली हो जाने देता हूँ
सूने क्षितिज की भाँति
 
कितनी बार
अपनी ख़ामोशी को
अपने भीतर गिर कर
टूटते हुए
देखता हूँ मैं
लेकिन इस टूटन को
अर्थ देने के लिए
शब्दों की मिन्नत नहीं करता
 
टूटने देता हूँ
चटखने देता हूँ
ख़ामोशी को अपने भीतर
मालूम होता है मुझे
कि कहीं भी चले जाएँ चाहे
अनंत सीमाओं में
अदृश्य दिशाओं में
शब्द
आख़िर लौट कर आएँगे
वो मेरे पास एक दिन
 
आएँगे
मेरे कवि-मन के आँगन में
मरूस्थल बनी
मेरे मन की धरा पर
बरसेंगे रिमझिम
भर देंगे
सोंधी महक से मन
 
कहीं भी हों
शब्द चाहे
 
दूर
बहुत दूर
 
लेकिन फिर भी
शब्दों के इन्तज़ार में
भरा-भरा रहता
अंत का खाली मन।
 
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घर का अँधेरा
 
मैं घर से चला
तो घर का अँधेरा
मेरे साथ-साथ
चल रहा था
 
मेरी आँखों में सूरज था
उज्ज्वल भविष्य के
सपने थे
लेकिन मेरे पाँवों में
पीछे छूट चुके
घर की बेड़ियाँ थीं
रिश्तों की आवाज़ें थीं
मेरे शहर की
छूट रही सीमाएँ थीं
मेरे पूर्वजों की आत्माएँ थीं
 
मैं अपने रास्तों में अटके
काले पवर्तों से जूझा
मैंने मरूस्थली पगडंडियों को फलाँगा
समुद्रों को तैर कर पार किया
हाथों में सूरज को पकड़ा
तितलियों को
सपनों में सजाया
धीरे-धीरे मैंने
अपनी इच्छा का
अपना संसार बसाया
 
लेकिन अब
जब कभी भी मैं
भूले भटके
अपने शहर जाऊँ
अपने घर की
चौखट पर पैर टिकाऊं
तो उस घर का अँधेरा
मुझसे अजब सवाल करे
जिनका जवाब देने से
मेरा मन डरे 
 
मैं जल्दी-जल्दी
माँ की सूख रही हथेलियों पर
चन्द सिक्के टिकाऊँ
और वापिस
अपने शहर लौट आऊँ
 
लेकिन
मेरे पीछे चल पड़तीं
कुछ आवाज़ें
जिनसे बचने के लिए
मैं छटपटाऊँ
पीड़ा से बिलबिलाऊँ
 
अँधेरे के
इस जंगल से
निकलने के लिए
तिलमिलाऊँ
आँसू बहाऊँ
 
मैं घर से चलता 
तो घर का अँधेरा
अब भी
मेरे साथ साथ चलता।
 
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जीवन जिया मैंने
 
उन लोगों की तरफ देखकर
नहीं जिया जीवन मैंने
जिन्होंने मेरे रास्तों में
काँच बिखेर दिया
और मेरे लहू को
सुलगते खंजरों की
तासीर बताई
 
जिन्होंने
मेरे मासूम मन पर
रिश्तों की परिभाषा को
उल्टे अक्षरों में
लिख दिया
उन लोगों को देखकर
नहीं जिया जीवन मैंने
 
उन लोगों की ओर देखकर भी
नहीं जिया जीवन मैंने
जिन्होंने
इस पृथ्वी को
नर्क बनाने में
कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी
जो मौत के बन्जारे बन कर
बेगुनाह सीनों में
सुराख़ करते रहे
भोली-भाली आँखों में जो
आँसूओं के सागर भरते रहे
उन लोगों को देखकर भी
नहीं जिया जीवन मैंने
 
मैं जीवित रहा
उन लोगों को देखकर
जो मेरे कुछ नहीं थे लगते
लेकिन उनके कमरे
मेरी उदास वक्तों में ठहरगाह बने
कितनी ही बार ख़ुदकुशी की तरफ़ जाते
मेरे क़दमों के लिए पनाह बने
 
उन लोगों को
देखकर जिया जीवन मैंने
जिनके सीने में
मैंने प्यार के चिराग़ जलते देखे
अभी भी देखे जो
मरूस्थली रास्तों पर
गुलमोहर बोते 
 
सचमुच 
उन लोगों को देखकर
जिया जीवन मैंने
जिन्होंने इस जीवन को
अंदर बाहर प्यार से भर डाला
गहन उदासी में भी
जिनके प्यार ने
मनुष्य को जीने के 
काबिल कर डाला
 
उन लोगों को देखकर
जिया जीवन मैंने।
 
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अद्भुत कला
 
मैं जिन्हें
वर्षों तक
दूध पिलाता रहा
अंगुली पकड़ कर
चलना सिखाता रहा
जब वे मेरी पीठ पर
डंक मार रहे थे
तब मुझे पता चला
कि साँप कभी किसी के
मित्र नहीं होते
 
लेकिन जब वे
मेरी पीठ पर
डंक मार रहे थे
और मेरे अंगों को
ज़हर से भर रहे थे
तब वे भी नहीं जानते थे
कि मैं
बचपन से ही
यह ज़हर पी-पी कर
पला बढ़ा हूँ
 
और मुझे
साँपों के सिर कुचलने की
और ज़हर को
ऊर्जा में बदलने की
अद्वभुत कला आती है।
 
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बहुत दूर
 
बहुत दूर
छोड़ आया हूँ मैं
वो खाँस-खाँस कर
जर्जर हुए ज़िस्म
भट्टियों की अग्नि में
लोहे के साथ ढलते शरीर
फैक्ट्रियों की घुटन में कैद
बेबसियों के पुतले
मैं
बहुत दूर छोड़ आया हूँ
 
दूर छोड़ आया हूँ
वह पसीने की बदबू
एक-एक निवाले के लिए
लड़ा जाता युद्ध
छोटी-छोटी इच्छाओं के लिए
जिबह होते अरमान
दिल में छिपी कितनी आशाएँ
होठों में दबा कितना दर्द
मैं 
बहुत दूर छोड़ आया हूँ
 
दूर छोड़ आया हूँ
मैं वह युद्ध का मैदान
जहाँ हम सब लड़ रहे थे
रोटी की लड़ाई
अपने-अपने मोर्चों में
 
पर मुझे मुट्ठी भर
अनाज क्या मिला
कि मैं सबको
मोर्चों पर लड़ता छोड़ कर
दूर दौड़ आया हूँ
 
वे सब अभी भी
वैसे ही लड़ रहे हैं
अंतहीन लड़ाई
उदास
निराश
फैक्ट्रियों में
तिल-तिल मरते
सीलन भरे अंधेरों में गर्क होते
मालिक की
गन्दी गालियों से डरते
थोड़े-से पैसों से
अपना बसर करते
पल-पल मरते
 
वे सब
अभी भी
वैसे ही लड़ रहे हैं
 
मैं ही
बहुत दूर
भाग आया हूँ।

- डॉ. अमरजीत कौंके
 
रचनाकार परिचय
डॉ. अमरजीत कौंके

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