प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
दिसम्बर 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम
प्रोफेसर जगत सिंह
 
प्रोफेसर जगतसिंह को एक शोध प्रबंध की मौखिकी के लिए पटना जाना है। इस यात्रा के लिए उन्होंने उपयुक्त रेलगाड़ी के वातानुकूलित प्रथम श्रेणी का आरक्षण पर्याप्त पहले ही करवा लिया। नियत तिथि को नियत समय पर स्टेशन पहुँचे। गाड़ी समय पर आयी। उनका आरक्षण जिस कूपे में था, उसमें लगभग उन्हीं की उम्र के एक सज्जन पहले से ही बैठे थे। अभी गाड़ी विदिशा से निकली ही थी कि सामने वाले सज्जन ने अपना टिफिन खोला। जगतसिंह से बोले- "आइये भोजन कर लें।"
"जी, आप लीजिए; मैं तो यहीं से बैठा हूँ। अभी भोजन करके ही घर से चला हूँ।"
भोजन से निवृत्त हो उन साहब ने हाथ-मुँह पौंछ कर अपनी सीट पर इत्मीनान से बैठते हुए बातचीत का सिलसिला शुरू किया।
 
"यह तो भोपाल स्टेशन था; आप भोपाल से ही हैं?"
"जी साब, मैं भोपाल से ही हूँ।"
"कहाँ तक जा रहे हैं।"
"जी, मुझे पटना जाना है।"
"अच्छा अच्छा। मैं तो इंदौर से आ रहा हूँ, वाराणसी तक जाना है। मेरा बेटा इंदौर में पढ़ता है, उसी से मिलने गया था।"
...............
 
"आजकल साहब, बच्चों पर ज़रा भी नज़र न रखो तो बिगड़ते देर नहीं लगती है।...बच्चों का भी क्या दोष है साहब, संस्कार रहे ही नहीं हैं परिवारों में आजकल। मैं तो पूरी नज़र रखता हूँ अपने बच्चों पर।"
................
 
"अरे साहब, आप तो कुछ बोल ही नहीं रहे हैं; मैं ही बोले जा रहा हूँ।......हा हा हा हा, वकील हूँ न, ज़्यादा बोलने की आदत है।"
जगत सिंह विज्ञान के प्रोफेसर थे। मस्तमौला और बड़े हास्य स्वभाव के थे।
एक पढ़े लिखे, उच्च आर्थिक स्तर के व्यक्ति द्वारा बिना किसी जान पहचान, बिना किसी प्रसंग के इस तरह अपनी बात रखते जाना उन्हें अटपटा अवश्य लग रहा था; सो वे मन ही मन मुस्करा रहे थे।
सामने वाले वकील साहब के प्रश्न को कि वे कुछ नहीं बोल रहे हैं, उन्होंने हँस कर टाल दिया।
 
"साहब आपका नाम क्या है?"
"जगत सिंह।"
"जगत सिंह? आगे-पीछे क्या लिखते हैं?"
"जी, नाम के आगे, मेरा मतलब नाम से पहले कुछ लोग 'श्री' कुछ लोग 'डॉक्टर' तो कुछ लोग 'प्रोफेसर' लिख देते हैं और नाम के पीछे मतलब नाम के बाद कुछ लोग 'साहब' तो कुछ लोग 'जी' लिख देते हैं। हाँ, 'छात्र' अवश्य ही 'सर' कहते भी हैं और लिखते भी हैं।"
 
सामने वाले वकील साहब का चेहरा अब देखने लायक था।

- डॉ. आर बी भण्डारकर
 
रचनाकार परिचय
डॉ. आर बी भण्डारकर

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कथा-कुसुम (1)