प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
दिसम्बर 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम
विद्या
 
कक्षा में शिक्षक नहीं थे। बच्चे उनके न होने का फ़ायदा उठाते हुए शोर मचा रहे थे। अचानक पदचाप सुन; सब चुपचाप अपनी-अपनी जगह पर बैठ गए। 
सर ने कक्षा शुरू की, "बच्चो! कल जो पाठ पढ़ा था। वह सबको समझ आया था न!"
"जी सर।" सब बच्चों ने ज़ोर से आवाज लगायी।
"ठीक है, रवि! तुम वह श्लोक सुनाओ।" 
"विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्।
पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम्।।"
"समीर, अब तुम इसका अर्थ बताओ।"
"विद्या विनय...."
"ठीक!"
"विद्या विनय देती है और...और!" 
"अरे नालायक! कल ही तो बताया था।"
"सर, विद्या विनय देती है और ...और उससे धन...!"
"ला रे रवि, छड़ी ला। इस गधे को एक श्लोक का अर्थ तक याद नहीं हुआ। उल्लू का पट्ठा, पक्का फेल होगा इस बार।"
 
बच्चे अपनी कॉपियों में सर द्वारा लिखवाया गया श्‍लोक का अर्थ पढ़ रहे थे- 'विद्या विनय देती है....!'
 
 
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टंगटुट्टा
 
घर का माहौल थोड़ा असामान्य-सा हो चला था। परसों ही राजेन्द्र ने किसी दुखियारी से शादी करने की बात घर पर छेड़ दी थी। छोटे भाइयों को तो आश्चर्य हुआ पर बहुओं की आवाज़ कुछ ज़्यादा ही तेज़ हो गयी। बेचारी बूढ़ी माँ समझाने की कोशिश कर; थक कर हार मान चुकी थी। बहुओं के तीखे बाण से कलेजा छलनी हो रहा था पर कान में रूई डालने के सिवा कोई चारा भी तो नहीं था।
 
शाम में तमतमाते वीरेंद्र का प्रवेश सीधा माँ की कोठरी में हुआ। बिना देर किये हुए दोनों बहुएँ दरवाज़े से चिपक गयीं।
"माँ, यह हो क्या रहा है घर में? भैया पागल तो नहीं हो गए हैं।"
"बेटा, इसमें पागल होने वाली क्या बात है?"
"इस उम्र में शादी!! लोग क्या कहेंगे? मुहल्ले वाले थूकेंगे हम पर!" गुस्से में वह लाल-पीला हो रहा था।
"बेटा, उसने कोई निर्णय लिया है तो सोच-समझकर ही लिया होगा न! उस दुखियारी के बारे में भी तो सोच।"
"हाँ, कुछ ज़्यादा ही सोच कर लिया है। अपना तो दोनों टाँग टूटा हुआ है ही और ऊपर से बुढ़ापे में एक औरत की ज़िम्मेदारी लेने चले हैं!"
"बीस साल से बिना टाँग के ही चाय बेचकर हमारा-तुम्हारा खर्चा चला रहा है न! थोड़ा कलेजे पर हाथ रखकर सोचना कि असली टंगटुट्टा वह है या...!"
 
 
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बाबा
 
अपनी सहेली विदुषी के कहने पर रक्षा आशुतोषानंद जी महाराज के आश्रम तो आ गयी पर आने के साथ ही उसका सारा उत्साह जाता रहा। वह सोच रही थी कि बहुत बड़ा आश्रम होगा, हज़ारों की भीड़ होगी पर इसके विपरीत बहुत छोटा-सा आश्रम और बमुश्किल दस पंद्रह लोग थे। मन तो हुआ कि लौट जाए फिर सोचा, जब इतनी दूर आ गयी हूँ तो मिल ही लेती हूँ।
आसनविहीन चटाई पर बैठे महाराज मोबाइल पर कुछ कर भी रहे थे और आगंतुक भक्तों की समस्या का समाधान भी बता रहे थे। अचानक उसका ध्यान एक लड़के की ओर गया, जो महाराज को अपनी व्यथा सुना रहा था।
"प्रभु, मैंने बी टेक किया है। छह महीने हो गये पर अभी तक जॉब नहीं मिला है। मन करता है कि ज़हर खा लूँ।"
"वत्स! फेसबुक चलाते हो?"
"जी, महाराज।"
"कितना समय देते हो फेसबुक-व्हाट्सएप पर?"
"यही कोई दो-तीन घण्टे!" सकुचाते हुए लड़के ने कहा।
"जाओ! फेसबुक-व्हाट्सएप चलाना बन्द कर दो। तीन महीने में जॉब मिल जाएगा। जाओ अब।"
 
अपनी बारी देख रक्षा आगे बढ़ी।
"भंते! क्या कष्ट है?" महाराज ने उसके आँखों में आँख डालते हुए पूछा।
"महाराज, शादी के पाँच साल हो गए हैं पर मैं अभी तक माँ नहीं बन पाई।"
"अकेले आयी हो?"
"जी महाराज।"
"अपने बायें गाल पर एक थप्पड़ मारो।"
"क्या?"
"सुना नहीं, मैंने क्या कहा?" महाराज गुस्सा हो गए।
धीरे से एक थप्पड़ मार रक्षा गहन सोच में पड़ गयी कि कहाँ फँस गयी मैं।"
"पति या माता-पिता को बताकर आयी हो?"
"जी...जी नहीं, महाराज।"
"अब अपने दाहिने गाल पर ज़ोर से थप्पड़ मारो।"
रक्षा उठने लगी। फिर सबकी नज़र ख़ुद पर टिकी देख अपने गाल पर थप्पड़ लगा लिया। अब लग रहा था कि वह रो ही देगी।
"रिपोर्ट साथ में लायी हो?"
"नहीं.....नहीं महाराज।"
"अगले पूर्णिमा को रिपोर्ट लेकर पति के साथ शहर के किसी अच्छे डॉक्टर से मिलना। समझी! और हाँ, सीधा घर जाना। नहीं तो अनिष्ट हो सकता है। समझ गयी कि नहीं!"
 
घर जाते समय रक्षा सोच रही थी कि यह बाबा इंसान है या शैतान या फिर कुछ और...।"

- मृणाल आशुतोष
 
रचनाकार परिचय
मृणाल आशुतोष

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कथा-कुसुम (1)