प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
दिसम्बर 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम
कहानी- गोमती का झरना
 
 
गोमती झरने के अविरल प्रवाह को देखकर मंत्रमुग्ध हुए बिना नहीं रह पाती। वह जब भी गाँव के साथ बहने वाले इस झरने को झरता हुआ देखती, दुनिया से बेगानी होकर न जाने किस लोक में खो जाया करती। झरने को देखकर गोमती के मन में आनंद का प्रपात फूट पड़ता मानो झरने के गिरते हुए पानी में उसे उस महाशक्ति के साक्षात दर्शन हो जाते हों जो इस सकल विश्व को गति प्रदान कर रहा है। या फिर झरने के रूप में उसका सबसे प्रियजन उसके समक्ष खड़ा होकर मूक संवाद कर रहा हो। उसे यूँ लगता जैसे झरने के पानी की हर बूंद के रूप में उसे हीरे-मोतियों की सौगात पेश की जा रही हो।झरने का पानी चट्टानों पर से गिर कर नीचे श्वेत झाग उत्पन्न करता मानो झरना गोमती को दूधिया चुनरी दे रहा हो।
गोमती घंटों झरने के पास बैठकर उसे एकटक निहारती। झरने से बातें करती, उसे अपनी हर बात सुनाती, हर ग़म साझा करती।उसे लगता कि झरना उसकी बातें सुनता है। उसके हर दर्द को समझता है।
 
कई फीट ऊपर से गिरते झरने का पानी गोमती को किसी ईश्वरीय सौगात से कम नहीं लगता था। वह झरना अपने पानी से कितने ही गाँव के बाशिंदों की प्यास बुझाता। कितने ही क्यारों में झरने के पानी से धान और अन्य फसलें होती थी। झरने के ऊपरी, साथ लगते घने जंगल से जंगली बकरे, जंगली सूअर, बर्फानी तेंदुआ आदि जानवर झरने के पानी से अपनी प्यास बुझाते। झरने का पानी जितना ठंडा था, उतना ही मीठा भी।
 
 
"कितने ही लोगों की ज़रूरतें पूरी करता है यह झरना कितना मददगार है सब के लिए।इसके जल प्रवाह की ऊर्जा से कई घराट चलते है जिससे इलाके के अधिकांश घरों में आटा-रोटी बनकर पकाया जाता है। कितना भाग्यशाली है ये झरना और एक मैं हूँ अभागिन।" झरने को देखकर गोमती अक्सर सोचा करती।
गोमती का घर झरने के साथ लगने वाले गाँव में है। बचपन से ही झरने के साथ उसका गहरा नाता रहा है।आज वह बहत्तर वर्ष की हो चुकी है मगर झरने के प्रति उसका लगाव आज भी ज्यों का त्यों बना हुआ है।
 

बचपन में जब माँ-बापू उसे किसी बात को लेकर डांट दिया करते या किसी के साथ उसका झगड़ा हो जाता तो वह झरने के पास आकर झरने से अपना दर्द बांटती थी। माँ-बापू की शिकायत करती थी। जब भी कोई खुशी का मौका होता तो झरने के पानी को स्पर्श करती मानो उसे अपनी खुशी में शामिल होने का निमंत्रण दे रही हो।बरसात में झरने का बहाव काफी बढ़ जाया करता था। घर वाले गोमती को उन दिनों झरने के पास न जाने की हिदायत देते। मगर वह झरने के बढ़े हुए बहाव को देखे बिना भला कैसे रह पाती। उसे झरने की ऊंचाई बहुत आकर्षित करती थी। झरने का पानी तेज बहाव के साथ चट्टानों पर से बहता हुआ नीचे गिरता। जहाँ पानी गिरता वह भाग काफी गहरा था। गोमती झरने के पास खड़ी होकर उसके ऊपरी गगन को छूते भाग को देखकर खुश होती रहती मानो झरने के रूप में आसमान से स्वयं ईश्वर उस पर अपना स्नेह लुटा रहे हों।
 
 
समय आगे बढ़ता रहा। झरने की खूबसूरती ज्यों की त्यों बनी रही है मगर वक़्त बचपन की उस चुलबुली लड़की गोमती के चेहरे पर बढ़ती उम्र की इबारत लिखता गया।  उसका लाल गोल चेहरा अब झुर्रियों से भर चुका था। त्योंड़ियों से माथे पर तीन-चार बल पड़ने लगे थे। कानों की चमड़ी लटकने लगी थी मानो उसने वजनी झुमके पहन रखे हों। गोमती का बूढ़ा हो रहा शरीर अब लाठी के सहारे चलने लगा। कमर में हल्का-सा झुका हुआ भी दिखने लगा था।
 

झरने की ही तरह गोमती का गाँव भी बहुत खूबसूरत था। घने देवदारों के बीच बसा छोटा-सा पहाड़ी गाँव। गाँव में मुश्किल से 18-20 घर थे। अधिकांश घर कच्चे थे।कुछ घरों की छतें स्लेट की बनी थीं तो कुछ पर टीन की चद्दरें लगी थीं। ज्यादातर घरों के साथ उनके पुश्तैनी खेत लगते थे। गाँव के पूर्व की तरफ पीपल का एक बड़ा पेड़ था।पेड़ के पास ही भगवान भोलेनाथ का एक छोटा-सा मंदिर था। गाँव में अभी तक सड़क की सुविधा नहीं थी। लोग गाँव की बावड़ी से पीने का पानी लाते थे।सर्दियों में गाँव की सुंदरता और बढ़ जाया करती थी। हिमपात होने पर पूरा गाँव बर्फ की चादर ओढ़ लेता था।
 
 
माँ-बापू की शादी के बीस साल बाद गोमती का जन्म हुआ था। वह गोमती को पीर बाबा की सौगात मानते थे। गोमती को पांच जमात पढ़ाकर, थोड़ा बहुत काम सिखाकर उन्होंने एक फ़ौजी के साथ ब्याह दिया था। फौजी गोमती को बहुत प्यार करता था।सबकुछ सही चल रहा था कि एक दिन खबर मिली कि शत्रुओं ने घात लगाकर फौजियों के ठिकानों पर धावा बोल दिया है। कई घंटे गोलाबारी चलती रही। सभी आतंकवादियों को मार गिराया गया। लेकिन दो फौजी भी शहीद हो गए। मरने वालों में एक गोमती का घरवाला भी था। यह खबर पाकर माँ-बाप और गोमती का रो-रो कर बुरा हाल था। शादी को अभी सात महीने ही हुए थे। 
 
"हाय! किस कुल्चछिणी को घर लाए हो! मेरे बेटे को ही निगल गई। हाय! किस घड़ी इस मनहूस का मेरे घर में साया पड़ा था! मेरे जवान बच्चे को खा गई ये रांड! दफा हो जा हमारे घर से! हमें अपनी शक्ल मत दिखाना आज के बाद!"
 
गोमती नेउनकी बहुत मिन्नतें कीं। मगर किसी को भी उसके आँसुओं पर तरस नहीं आया। बहुत रोई थी वो। अपने भविष्य की दुहाई दी थी कि कहाँ जाएगी!  मगर किसी को भी गोमती पर तरस नहीं आया।
उसी दिन गोमती कपड़ों की गठरी बांधकर मायके आ गई। वहाँ भी हालात ज़्यादा भिन्न नहीं थे। गाँववाले ज़रा-ज़रा सी बात पर उसे ताने मारते। 
 
"न जाने कितने दिन रहेगी यहाँ बूढ़े माँ-बाप के सर पर!" बदजात अपने ही पति को खा गई।
कोई कहता "अब किसके घर जाकर बैठेगी ये! न जाने किसके भाग फूटेंगे अब!"
कोई उसके पेट के बढ़ते उभार को देखकर कहता "फौजी तो सरहद पर रहता था, न जाने किस का पाप अपने गर्भ में पाल रही है, चरित्रहीन!"
अपनी नारकीय जिंदगी से तंग आ चुकी गोमती कई दफा गाँव की धार से कूदकर जान देने की सोचती।  मगर पेट में पल रहे फौजी के अंश को जीते जी ख़त्म करना उसके ममतामई हृदय को मंजूर नहीं था।
 
 
मायके में एक बार गोमती गाँव की बावड़ी से पानी की गगरी घर ला रही थी। हल्का अंधेरा होने लगा था। अचानक उसका पैर फिसला और वह धड़ाम से नीचे गिर पड़ी।जब उसे होश आया तो खुद को दूसरे गाँव के वैद्य के घर लोगों से घिरा हुआ पाया। पूरे बदन में ऐसा दर्द हो रहा था मानो उसके प्राण निकलने वाले हों।
"हाय माँ!" कराहते हुए जब गोमती ने अपने हाथ से पेट को छुआ तो उस नन्हे जीव को अपने भीतर न पाकर जोर-जोर से दहाड़े मार कर रोने लगी।
"हाय मेरा बच्चा! हे भगवान! मुझे क्यों ज़िन्दा छोड़ दिया? मुझे भी बुला लेता अपने पास!"
 
बूढ़े माँ-बाप दो साल के भीतर गुजर गए। अब गोमती का गाँव में कोई भी सहारा न रहा। वह अपना ज्यादातर वक्त झरने के पास आकर गुजारती। घंटों उसके बहाव को देखती। उसके पानी में पैर डुबोकर किसी शिला पर बैठी रहती। मानो झरने के साथ संवाद का आनंद ले रही हो।कई दफा उसे यूँ लगता मानो झरने के पानी में से झाँककर उसका फौजी उससे बातें कर रहा है। उसका हाल-चाल पूछ रहा है। कभी-कभी गोमती जोर-जोर से रो देती और झरना अपने वेग से ज्यादा शोर मचाकर उसके साथ रुदन करता।
 
गाँव में जब भी नई फसल घर आती थी लोग उस फसल के पकवान बनाकर गाँव के देवता को चन्दन की धूपणी देकर भोग लगाते और फसल के लिए धन्यवाद करते।वे गाँव की बावड़ी के पास जाकर ख्वाज़ा पीर को फसल हेतु उपयुक्त जलराशि देने के लिए भी रोट चढ़ाते। मगर गोमती ग्राम देव की पूजा के बाद झरने को पूजने चली आती थी।वह इसके लिए तर्क देती थी की गाँव की फसलें तो झरने के पानी से ही लहलहा रही हैं।
 
 
गोमती झरने के पास सफाई बनाए रखती। उसके आसपास उगी जंगली झाड़ियों को समय-समय पर काटती। किसी प्लास्टिक की थैली, बोतल को उठाकर उसे किसी स्थान पर एकट्ठा करके जलाकर नष्ट कर देती। उस मासूम को क्या पता था कि इन प्लास्टिक की चीजों को जलाने से निकलने वाली जहरीली गैस से हवा प्रदूषित होती है।अपनी तरफ से तो गोमती अच्छा काम कर रही थी।
 
धीरे-धीरे इलाके का विकास हुआ तो सड़क गाँव तक बन गई। अब गाँवों तक छोटी गाड़ियाँ पहुंचने लगीं। कुछ ही महीनों में बस सेवा भी शुरू हो गई।लोग इन सुविधाओं को पाकर बहुत खुश थे।
 
गोमती का गाँव पहाड़ी पर बसा था। सरकार ने उस गाँव को पर्यटन की दृष्टि से और विकसित करने का विचार बनाया।स्थानीय विधायक ने एक दिन स्वंय आकर गाँव का सर्वेक्षण किया। उसे गाँव की खूबसूरती के साथ झरने की सुंदरता ने मोहित कर दिया। आगामी विधानसभा के चुनाव सर पर थे।विधायक जल्द से जल्द उस गाँव का विस्तार करके इलाके के लोगों को रिझाकर अच्छे वोटों से जीतना चाहता था।
 
फिर क्या था वह और उसके चमचे अपने काम में जुट गए। लोगों ने विधायक और पंचायत प्रधान को कई बार साथ-साथ बैठे देखा। न जाने क्या खिचड़ी पक रही थी दोनों के बीच। कुछ दिनों में दो-दो जेसीबी सड़क को चौड़ा करने के लिए लगा दी गई। न जाने कितने ही देवदारों की विकास के नाम पर बलि दे दी गई। लकड़ी के बड़े-बड़े स्लीपर रातों-रात गायब होने लगे। रोड की कटिंग ज़रूरत से ज्यादा की गई। सड़क चौड़ा करने से निकला हुआ मलबा नाले में फिंकवा दिया गया जिससे झरने के पानी का मार्ग अवरुद्ध हो गया। पानी पास के खेतों में घुसकर पकी फसल को नुकसान पहुंचाने लगा। सड़क निर्माण का काम प्रधान ने अपने दोस्त चंदू ठेकेदार को देर खा था।चंदू एक नंबर का घपलेबाज था। अगर कोई नाजायज हो रही कटिंग की शिकायत करता तो वो उन्हें धमकाता।
 
गोमती को यह सब देखकर बहुत बुरा लग रहा था। विकास के नाम पर की जाने वाली तबाही को देखकर उसका दिल रोने को हो रहाथा। एक दोपहर को घर से झरने की तरफ आती गोमती को हुऊँ-हुऊँ की आवाज़ें सुनाई दीं। जेसीबी सड़क बनाती झरने के पास तक पहुंचने वाली थी। गोमती हाथ में लाठी लिए झरने की तरफ दौड़ पड़ी।  "कलमुंहो! तुम लोगों को कोई और जगह नहीं मिली! भाग जाओ यहाँ से कुत्ते के बच्चों! वरना एक-एक की हड्डी पसली तोड़ दूंगी।"
जेसीबी और झरने के शोर की वजह से मजदूरों और ठेकेदार को कुछ भी सुनाई नहीं दिया।पास खड़े एक मजदूर को अपनी जांघ पर किसी चीज के जोरदार तरीके  से टकराने का आभास हुआ। उसने पीछे मुड़कर देखा तो गोमती हवा में लाठी लहराते हुए उस पर धावा बोलती हुई किसी रौद्र रूप धारी देवी-सी लग रही थी।वह मजदूर भागकर ठेकेदार के पीछे छिप गया।
"क्या हाल कर दिया तुमने इस जगह का? अब इस झरने को भी नहीं छोड़ोगे!" वह फुफकारती हुई ठेकेदार की तरफ बढ़ी।
"ज्यादा बकवास मत कर बुढ़िया चली जा यहाँ से!" ठेकेदार ने आँखें दिखाते हुए कहा।
"सूअर की औलाद! बात करने का तरीका सीख ले! मेरी उम्र का कुछ तो लिहाज कर!"
आवेश में आई गोमती ने ठेकेदार की तरफ लाठी लहराते हुए कहा। ठेकेदार ने लाठी को गोमती से छीनकर नाले में फेंक दिया।इस खींचतान में बूढ़ी गोमती एक पत्थर से जा टकराई। माथे से खून रिसनेलगा। गोमती की आह निकल गई। एक हाथ खून रिसते माथे पर रखते हुए वह गालियाँ बकती हुई पंचायत प्रधान के घर जा पहुंची।उसका गुस्सा सातवें आसमान पर था।
"बाहर निकल ओ प्रधानां! कहाँ घुसा हुआ है...देख तेरे राज में क्या हो रहा है!" गोमती प्रधान के दरवाजे के सामने खड़ी हो गई। उसके खुले बाल, गुस्से से  तमतमाता हुआ चेहरा किसी धधकते अंगारे-सा लग रहाथा। उसकी पूरी काया क्रोध से काँप रही थी मानो उसकी आँखों से धधकती ज्वाला प्रधान को पल में भस्म करने वाली हो।प्रधान उसका ये रौद्र रूप देखकर घबरा गया।
"क्या हो गया काकी! क्यों आग बबूला हो रही हो? ऐसी कौन-सी आफत आ गई और तेरे माथे पर ये चोट कैसी?" प्रधान बोला।
"तुझे फुर्सत हो तब तो पता चले क्या हो रहा है गाँव में! देख सारे जंगल को उजाड़ दिया उन्होंने! झरने के पास तक पहुंच गए हैं वो!" 
"अरे काकी! यह तो हमारे इलाके के लिए अच्छी बात है। यहाँ का विकास होगा, यहाँ पर्यटक घूमने आएंगे। रोजगार के साधन पैदा होंगे।कितने ही भूखे पेटों को रोजी का जरिया मिलेगा। हमारे गाँव का नाम दुनिया भर में चमकेगा। तू तो फिजूल में गुस्सा हो रही है मेरी प्यारी काकी!" प्रधान ने मीठी जुबान से गोमती को फुसलाना चाहा। 
"....और उसका क्या जो इतना नुकसान हो रहा है! इतने देवदार के पेड़ों को काट-उखाड़ दिया गया! मलबे को नाले में बहाकर झरने के पानी का मार्ग अवरुद्ध हो गया उसका क्या? मेरी खड़ी फ़सल को जो नुकसान हुआ वो! उसकी भरपाई कौन करेगा? गोमती गुस्से में बोली।  
"अरे काकी मैं हूँ ना! मैं बात करूँगा.. तू चिंता मत कर.. जा पहले वैद्य के घर जाकर अपने घाव पर दवा लगवा ले।" 
"पर देख ले तू अगर जल्द ही सब ठीक नहीं हुआ तो....."
गोमती की धमकी को सुनकर प्रधान ने मुश्किल से अपनी हँसी कोरोका।
"साली बुढ़िया!" गोमती को जाता हुआ देख प्रधान अपनी मुट्ठी भींचते हुए फुसफुसाया।
 
 
जब ग्रामीणों को गोमती के गाँव के विकास के विरुद्ध प्रधान से बहस करने की बात पता चली तो सभी उससे उखड़े-उखड़े रहने लगे। प्रधान ने नमक-मिर्च लगाकर  गोमती के खिलाफ़ गाँववालों के कान भर दिए थे ताकि गाँव की सहूलियत के नाम पर झरने के साथ लगती गोमती की ज्यादातर ज़मीन को हथियाने में कोई आवाज़ न उठाए। 
प्रधान ठेकेदार के साथ मिला हुआ था। दोनों नेआपस में सांठ-गांठ कर रखी थी। प्रधान को गाँव की जरा भी फिक्र नहीं थी। उसको झरने व गाँव के देवदार वाले जंगल के साथ कोई लगाव नहीं था। वह तो बस अपने लिए धनराशि जुटाने के लिए पड़ा था।
 
गोमती गाँववालों के बदले हुए रवैये को भांप गई थी। कोई सीधे मुँह उससे बात करने को भी राजी नहीं था। वो ज्यादातर वक़्त झरने के पास बिताती थी।लोगों ने गोमती के बारे में बातें बनाना शुरू कर दिया था। कोई कहता वो डायन है, तभी तो झरने के पास रहती है चौबीस घंटें। तो कोई कहता कि वो काला जादू करना सीख रही है।गोमती को इन सब बातों का पता था। अंततः उसने झरने के पास अपनी ज़मीन पर एक फटी हुई तिरपाल और अपने पुराने कपड़ों से अपने लिए एक झोंपड़ी बना ली। 
 
 
कुछ दिन सड़क का काम बंद रहा। गोमती को लगा कि उसके विरोध करने का ही यह नतीजा हुआ मगर कुछ दिनों बाद फिर से निर्माण कार्य शुरू हो गया।झरने के साथ लगती जमीन को समतल किया जाने लगा। गोमती को उस जगह पर पहुँचने ही नहीं दिया जाता था। वह अपनी ज़मीन जाने और झरने की दशा को लेकर रोती रहती।उनसे सड़क निर्माण कार्य को बंद करने का आग्रह करती। मगर उसकी आवाज चट्टानों को तोड़ती जेसीबी की कर्कश आवाज तले दबकर रह जाती।झरना असहाय होकर मानो बेबस गोमती से अपने अस्तित्व को बचाए रखने की अंतिम उम्मीद लिए बह रहा था।
 
एक शाम को जब निर्माण कार्य बंद हुआ। मजदूर अपने अस्थाई घरों में जा चुके थे। गोमती सबसे नज़रें बचाकर झरने के पास पहुंच गई।झरने के पास पत्थर और मलबा बिखरा पड़ा था। अब उसकी गहराई पहले से भी कम हो गई थी। गोमती की आँखों से आँसू बहकर झरने के पानी में मिलने लगे थे।मानो दोनों एक-दूसरे की विवशता पर आँसू बहा रहे हों। उनकी स्थिति को देखकर आसमान से बादल भी आंसू बहाने लगे। देखते ही देखते बारिश तेज़ और तेज हो गई। गोमती सर से पाँव तक पूरी तरह भीग गई थी। बारिश के ठंडे पानी से उसके शरीर में कंपकपी छूट गई थी।

कई दिनों तक गोमती को किसी ने नहीं देखा। बारिश में भीगने से उसको तेज़ बुखार हो गया था दूसरी ओर विधायक ने गाँव आकर लोगों के लिए झरने के पास वाली जगह पर नए बने दो मंजिला विश्रामगृह का लोकार्पण कर दिया। पर्यटकों की सुविधा के लिए छोटी-छोटी कोल्ड्रिंग, चाय की दुकानें खुल गई थीं।अब झरने की वह पहले-सी खूबसूरती नहीं रही। पहले आस-पास हरियाली हुआ करती थी। देवदार के आसमान छूते पेड़ हुआ करते थे। सुंदर पंछी झरने के पास आया करते थे।मगर अब पर्यटकों का मनोरंजन करने के लिए ज़ोर-ज़ोर से गाने बजाए जाते, जगह-जगह पर प्लास्टिक का कचरा, शराब व शीतल पेय की बोतलें बिखरी मिलतीं।
 
 
लगभग एक महीने के बाद गोमती जब कुछ ठीक हुई तो मन में सबसे पहला ख़याल झरने का आया। अपनी लाठी लेकर वह लड़खड़ाती हुई जैसे-तैसे झरने तक पहुंच गई।उसकी काया बीमारी से अब और भी कमजोर हो गई थी।
झरने के पास पहुंचते ही गोमती देखती है कि वहाँ आए पर्यटक झरने के पानी में नहा रहे हैं। उसकी गहराई में जाकर डूबकियाँ लगा रहे हैं।कुछ युवतियाँ उन युवकों को पानी में अठखेलियाँ करते हुए देखकर खुशी से चिल्ला रही हैं। जगह-जगह पर प्लास्टिक की बोतलें, गिलास और अन्य गंदगी फैली थी। कुछ युवक झाड़ियों की ओट में शराब पीते हुए जुआ खेल रहे थे। गोमती जोर से उन पर चिल्लाती है। युवतियाँ गोमती को देखकर डर जाती है मानो उन्होंने किसी चुड़ैल को देख लिया हो।युवक पानी से बाहर निकलकर अपना सामान बटोरने लगते हैं। जैसे ही गोमती उनकी तरफ बढी वो लोग वहाँ से रफ्फू-चक्कर हो गए।
 
झरने की बदहाली देखकर गोमती खून के आँसू रोने लगी। उससे झरने की हालत देखी नहीं जा रही थी। गोमती झरने के आस-पास बिखरी हुई गंदगी को साफ करने में जुट गई। कभी अपनी आँखों से निकलते आँसुओं को पोंछती, कभी झरने के पानी को देखकर कुछ बुदबुदाती। उसने एकत्रित की हुई गंदगी एक बोरी में जमा कर ली।कूड़ा बीनते हुए वह झरने के ऊपरी भाग तक जा पहुंची। वहाँ पर भी शराब की खाली बोतलें, डिस्पोजल गिलास, नमकीन के खाली पैकेट जमीन पर बिखरे पड़े थे। गोमती रोती-रोती आँसू भरी आँखों से कूड़ा इकट्ठा कर रही थी कि अचानक उसका पैर फिसला और वह शिलाओं पर से लुढ़कती हुई जोरदार 'छपाक' की आवाज के साथ नीचे झरने के पानी में आ गिरी मानो झरने ने उसे अपनी गोद में भर लिया हो। उसके शरीर में अब कोई हलचल नहीं थी।
 
सुबह तक उसका शरीर झरने के पानी में तैरता रहा। औंधे मुँह गिरी गोमती मानो झरने के पानी से जी भरकर बातें कर रही हो।दो दिन बाद लोगों ने गोमती की लाश को पानी से बाहर निकालकर उसका दाह संस्कार किया।
 
धीरे-धीरे लोगों में सफाई के प्रति जागरूकता बढ़ने लगी। जगह-जगह पर सरकार ने कूड़ेदान रखवा दिए।बोर्डों पर उस जगह को साफ़ रखने की गुज़ारिश व गंदगी फैलाने वालों के ख़िलाफ़ जुर्माना और सख्त कार्यवाही करने के निर्देश लिखवा दिए थे।झरने के सरंक्षण को लेकर गोमती के प्रयासों को जानकर सरकार ने उस झरने को 'गोमती का झरना' नाम दिया।
 
अब लोग भूत-प्रेत के डर से झरने के पास आने से कतराने लगे। गाँव के कई लोगों का कहना है कि उन्होंने गोमती को झरने के पास बैठे देखा है।उनको लगता था कि उसकी आत्मा झरने के आस-पास ही भटकती रहेगी। इसके लिए लोगों ने मिलकर झरने के पास गोमती के नाम का एक छोटा-सा मंदिर बना दिया।लोगों का यह भी मानना है कि गोमती अभी भी वहाँ पर है। वो आज भी झरने की सफाई करती है और गंदगी फैलाने वाले पर्यटकों को दंड देती है।

- मनोज कुमार शिव
 
रचनाकार परिचय
मनोज कुमार शिव

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कथा-कुसुम (3)