प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
दिसम्बर 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

गीत-गंगा
गीत-
 
नाव बढ़ रही, सोच रहे थे
उतरेंगे किस पार किनारे
दो भागों में नदी बँट गई
और हो गए चार किनारे
 
संयम रखकर ध्यान लगाया
और दूर तक दृष्टि जमाई
उसी दिशा में नाव मोड़ दी
जिधर रोशनी पड़ी दिखाई
पर नदिया बँटती ही जाती
दिखे नए हर बार किनारे
 
सोचा यही नियति की इच्छा
हम पतवार नहीं छोड़ेंगे
अगर किनारे साथ न देंगे
हम भी नाव नहीं मोड़ेंगे
अब धारा से प्यार हो गया
नहीं हमें स्वीकार किनारे
 
हुई अंत में विजय हमारी
गए युद्ध में हार किनारे
हवा ले गयी साथ, मिले फिर
स्वागत में तैयार किनारे
आँखें चमकी दिखी सामने
मूंगे की दीवार किनारे
 
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गीत-
 
रखकर मन में आज हौसला
पंछी निकला छोड़ घोंसला
आशाओं को लिए गगन में बिन सोंचे अंजाम।
नहीं है चिन्ता ना डर कोई रखवाला है राम।।
 
राह रुकावट वाली होगी
और थकावट वाली होगी
तेज थपेड़े झोंको वाली
हवा बहुत मतवाली होगी
फिर भी तय करना है उसको इतना कठिन मक़ाम।
नहीं है चिन्ता ना डर कोई रखवाला है राम।।
 
रात का पहरा सिल जाएगा
कहीं बसेरा मिल जाएगा
कट जाएगी रात ये काली
भोर सवेरा खिल जाएगा
फिर छू लेगा उड़कर नभ को लेगा न विश्राम।
नहीं है चिन्ता ना डर कोई रखवाला है राम।।
 
जब मंजिल का दर देखेगा
फिर वो अपने पर देखेगा
धन्यवाद देगा ईश्वर को
आँख अश्रु से भर देखेगा
होता न विश्वास किया है इतना सफ़र तमाम।
नहीं है चिन्ता ना डर कोई रखवाला है राम।।
 
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गीत-
 
बहुत दिनों के बाद हुआ है
फिर ख़ुद से संवाद हुआ है
फिर से ज्ञात हुआ यह जीवन
प्रभु से मिला प्रसाद हुआ है
 
मानस के पावन पुष्कर में
भक्ति भाव के कमल खिले हैं
फिर मीरा है हुई दिवानी
सूरा को घनश्याम मिले हैं
ध्रुव ने की है कहीं तपस्या
मन मेरा प्रहलाद हुआ है
 
कहीं कबीरा ने फिर गायी
जीवन दर्शन की शुभ साखी
घाट-घाट पर किया आचमन
रहा न कोई पनघट बाकी
अब जीवन है शान्ति निकेतन
भीतर अनहद नाद हुआ है
 
हर कोलाहल शान्त किया है
झंझावातों से टकराया
मोह भंग होने पर फिर से
अर्जुन ने गाण्डीव उठाया
गीता ज्ञान दिया कान्हा ने
मेरा दूर विषाद हुआ है
 
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गीत-
 
गीत शिव की साधना के हैं शिवालय
श्रांत मन के हेतु हैं विश्राम आलय
 
गीत हैं चौपाइयाँ संवेदना की
गीत हैं ये पाण्डुलिपियाँ चेतना की
गीत अधरों पर कहीं बिखरी खुशी हैं
गीत ये उपवास की एकादशी हैं
गीत हैं ये प्राण पल्लव उर विटप के
गीत अभिजित मन्त्र हैं प्रभु नामजप के
गीत शाश्वत सत्य का जैसे उजाला
गीत हैं दिनकर, महादेवी, निराला
गीत अभिनव अनुभवों के पुस्तकालय
श्रांत मन के हेतु हैं विश्राम आलय
 
गीत हैं उत्सव मनीषी अस्मिता के
गीत हैं उत्कर्ष रचनाधर्मिता के
गीत अरुणिम भोर हैं शुचिता सरोवर
गीत हैं शुभ-लाभ मोहक अति मनोहर
गीत हैं घुँघरू, वधू के पावनी पग
गीत हैं रज तीर्थ की, हैं गीत अग जग
गीत मंदिर प्रेम के, गुरुग्राम सुन्दर
गीत राघव का बने हैं पीत अम्बर
गीत गौरव और गरिमा के हिमालय
श्रांत मन के हेतु हैं विश्राम आलय
 
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गीत-
 
सभी नर्सरी के बच्चे थे
टीचर उन्हें पढ़ाने आए
बच्चा एक पास में आया
अपने हाथों कलम उठाए
बोला देखो तो टीचर जी
मैंने लिखना सीख लिया है
 
टीचर ने देखा कॉपी में
आड़ी तिरछी कुछ रेखाएं
रेखाओं में छिपी हुई थीं
नव भविष्य की नव आशाएं
इतना समझ गए बच्चे ने
कलम पकड़ना सीख लिया है
 
बच्चे की आँखों में देखा
भावुक होकर गोद उठाया
भोली-सी मुस्कान देखकर
निश्चल सरल हृदय भर आया
सोच रहे थे बच्चे ने अब
पैरों चलना सीख लिया है
 
कितना अधिक कठिन होता है
नन्हे हाथों कलम थमाना
कभी डांट से, कभी प्यार से
होता है विश्वास दिलाना
टीचर बोले- हमने भी अब
चेहरे पढ़ना सीख लिया है

- राघव शुक्ल
 
रचनाकार परिचय
राघव शुक्ल

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गीत-गंगा (1)