प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
दिसम्बर 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव
ग़ज़ल-
 
बाहर तो सिकन्दर के ही पैकर-सी रही हूँ
अंदर से मगर रूह-ए-कलन्दर-सी रही हूँ
 
इक जंग मुसलसल-सी मेरी ख़ुद से रही है
मैं ज़ात में अपनी किसी हैदर-सी रही हूँ
 
हालात ने मजबूत मुझे इतना बनाया
मिट्टी से बने जिस्म में पत्थर-सी रही हूँ
 
जब तक न मेरी कोख़ से कोपल कोई फ़ूटी
लोगों की नज़र में किसी बंजर-सी रही हूँ
 
ख़्वाहिश को किया दफ़्न उमीदों को झिंझोड़ा
बेशक़ मैं ख़ुद अपने लिए नश्तर-सी रही हूँ
 
थक हार के सो जाते हैं साए में मेरे सब
मानूस दीवारों में बसे घर-सी रही हूँ
 
तन्हाई मेरी ज़ीस्त का हिस्सा रही लेकिन
लोगों के लिए भीड़ के मंज़र-सी रही हूँ
 
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ग़ज़ल-
 
लौ मेरे दिल ने अभी उससे लगाई ही नहीं
उसकी चाहत की कभी जोत जगाई ही नहीं
 
रौशनी रूह तक आई है तो आई कैसे
जबकि उस तक तो मेरी कोई रसाई ही नहीं
 
अपनी रौ में हूँ, बहे जाती हूँ नद्दी की तरह
पत्थरों को मैं कभी ध्यान में लाई ही नहीं
 
कैसे बन जाते हैं सब काम ये बिगड़े मेरे
मैंने नेकी तो अभी इतनी कमाई ही नहीं
 
ख़ुद-ब-ख़ुद झुक गईं दर पर तेरे नज़रें मेरी
ये नज़र मैंने कहीं और झुकाई ही नहीं
 
कैसे चुपचाप चले आते हैं नींदों में मेरी
मैंने ख़्वाबों को तो आवाज़ लगाई ही नहीं
 
उसकी उम्मीद अभी से मैं लगा लूँ कैसे
अपनी हस्ती तो अभी मैंने मिटाई ही नहीं
 
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ग़ज़ल-
 
ग़ैब से पैग़ाम जारी हो गया
मुझपे उसका रंग तारी हो गया
 
मुंतज़िर रहने लगा दिल इस क़दर
लम्हा-लम्हा इन्तज़ारी हो गया
 
एक शब वो ख़्वाब में आया मेरे
दिल मेरा उसका पुजारी हो गया
 
इक नशा-सा था विसाल-ए-यार में
उम्र भर की जो ख़ुमारी हो गया
 
जान की बाज़ी लगा बैठा है फिर
फिर कोई आशिक़ जुआरी हो गया

- अलका मिश्रा
 
रचनाकार परिचय
अलका मिश्रा

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