प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
दिसम्बर 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

व्यंग्य
प्यार से नफ़रत के लिए आहें भरिए
 
      
यहाँ नफ़रत भी बड़ी मुहब्बत और नज़ाकत से की जाती है। नफ़रत करने वाला इतना नादान तो होता नहीं कि करे भी और खुलासा भी कर दे। आख़िर उसको परिश्रम से लबरेज़ अपनी नफ़रत पर इतना तो भरोसा होता है कि चार पाँच दशक तक उम्दा ढंग से अगर उसने कार्य कर लिया तो कम से कम सामाजिक संरचना को अपने बूते पर ढहा सकता है। फिर मानवता, प्यार और भारतीय संस्कृति जितना चाहे नफ़रत से आगे निकलने के लिए ज़ोर लगा दें परन्तु नफ़रत अपनी शानदार परफॉर्मेंस के सहारे और नई शैली की करतूतों के बल पर सदैव अव्वल दर्जा हासिल करके ही दम लेती है। सच्ची में ऐसी पुश्तैनी नफ़रत को सचमुच कोई नहीं पछाड़ सकता। उसका नफ़रत करने का बारीक तज़ुर्बा उसकी नफ़रत को इतना परिपक्व बना देता है कि दुनिया की हर चीज़ में डाउन फॉल आ सकता है लेकिन नफ़रत की स्तरीय औकात में रेशे भर का फ़र्क नही आता साहब।
 
नफ़रत की यह आन-बान-शान ही कही जाएगी कि वो अपने नफ़रत के जादू से हर जगह अपनी पहचान बनाती रहती है। घर, परिवार, पड़ोसी और दुनियादारी में हर समय अच्छे दिनों की तरह छाई रहती है। इतनी चर्चा और शोहरत तो मानवता तक को नसीब नहीं होती, जितनी नफ़रत की चारों ओर जय जयकार होती है। व्यापारिक दृष्टिकोण से देखें तो बड़े से बड़ा व्यापारी घाटे में जा रहा है लेकिन नफ़रत को कोई घाटा नहीं हो रहा। हर जगह मुनाफा बटोर रही है। बात-बात पर नफ़रत शेयर की तरह इसीलिए उछलती है कि उसकी विजय होगी। नफ़रत चाहे राजनीतिक हो, सामाजिक हो या आर्थिक हो यह अपने निशान बेहद बेबाकी से हर जगह छोड़ देती है।
 
नफ़रत का स्टेटस इंसान से बढ़कर होता है। इसी कारण यह हर जगह आपको उपलब्ध मिलेगी। तरक्की का पैमाना भी अब नफ़रती स्टेटस से जुड़ गया है। अब भले ही कोई इस बात को तरजीह न दे। पहले नज़र-नज़र में मोहब्बत दिखती थी। अब नज़र उठाई और नफ़रत से नज़रअंदाज़ कर दिया जैसी चालाकियाँ जन्म ले रही हैं। इंसान के सुलूक और बर्ताव में जब तक नफ़रती भाव नहीं झलकेंगे तब तक इंसान को अंदरूनी ख़ुशी नहीं मिलती। यह नफ़रत करने का अदभुत नज़रिया जब से समाज में पनपा है। तब से हमारा समाज पहले से ज़्यादा समझदार हो गया है। जागरूकता भी नफ़रत के चलते पाइयाँ-पाइयाँ चल रही है। ताकि नफ़रत तेज़ भागने से थके नहीं।
 
नफ़रत हमारे समाज का दर्पण बन रही है। जब तक हम नफ़रती भाव अपने अंदर नहीं पनपाएँगे, तब तक कोई भाव नहीं देगा। अब नफ़रत भी एक बाज़ार बन गई है, जिसकी जितनी ज़्यादा नफ़रत उसके उतने उम्दा सुलूक की समाज में बिक्री। इंसानियत तो टूटी चारपाई है, जिस पर कोई बैठना नहीं चाहता। नफ़रत के सोफे पर समाज का हर इंसान बैठकर अपने मन का करने पर फ़िदा है। एक अब देखिए न चुनावी बिगुल बजाती नफ़रत। पक्ष और विपक्ष की स्पीचों में सन्दर्भ व्याख्या सहित नफ़रत। अब नफ़रत सामाजिक न हो तो नफ़रत करने का मज़ा ही क्या। हम पड़ोसी से नफ़रत न करें, तो मुझे पड़ोस में रहने का कोई हक़ नहीं बनता। इसलिए नफ़रत को सलाम कीजिए और प्यार से नफ़रत के लिए आहें भरिए।

- आसिम अनमोल
 
रचनाकार परिचय
आसिम अनमोल

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व्यंग्य (2)