प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
दिसम्बर 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ख़ास-मुलाक़ात
सोशल मीडिया के माध्यम से पुस्तक वाली 'फीलिंग' नहीं आ सकती
: डॉ. लवलेश दत्त
 
 

बरेली (उ.प्र.) निवासी डॉ. लवलेश दत्त के व्यक्तित्व के शिक्षक, लेखक, कवि, सम्पादक, प्रकाशक, संगीतज्ञ, फोटोग्राफर आदि कई रूप हैं और हर रूप किसी दूसरे से ज़रा भी उन्नीस नहीं। पिछले दो-तीन साल से इन्हें क़रीब से जानते हुए यह आभास होता है कि इन्हें वाकई ईश्वर का ख़ास आशीर्वाद प्राप्त है। शिल्पायन बुक्स, दिल्ली से हाल ही इनका तीसरा कहानी संग्रह प्रकाशित हुआ है। आइए जानते हैं इस ख़ास व्यक्तित्व को एक ख़ास मुलाक़ात के ज़रिये।
 
अनमोल- अपने आरम्भिक जीवन, शिक्षा आदि के बारे में बताएँ।
डॉ. लवलेश- मेरा जन्म बरेली में ही हुआ। कक्षा तीन तक घर के पास ही स्थित अंगूरी देवी बाल विद्यालय से ली। उसके बाद कक्षा चार से सात तक की शिक्षा उस समय के श्रेष्ठ विद्यालय सूरजभान विद्या भवन से ली। फिर आठवीं से कक्षा दस तक सरस्वती विद्यालय इंटर कॉलेज में पढ़ा। इसके उपरांत ग्यारहवीं और बारहवीं की पढ़ाई राजकीय इंटर कालेज बरेली से की। बीएससी बरेली कॉलेज से किया। यहाँ तक की संपूर्ण शिक्षा विज्ञान विषय (गणित वर्ग) से की। तदुपरांत चिकित्सा प्रतिनिधि की नौकरी की और फिर व्यक्तिगत छात्र के रूप में हिंदी और संस्कृत में एम ए, पीएचडी महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखंड विश्वविद्यालय बरेली से किया। अध्यापन कार्य करते हुए कई वर्षों बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय नई दिल्ली से दूरस्थ शिक्षा के अंतर्गत बीएड किया। इसी के साथ-साथ संगीत गायन और वादन में प्रयाग संगीत समिति, इलाहाबाद से प्रभाकर की डिग्री भी प्राप्त की।
 
अनमोल- लेखन की तरफ़ रुझान कैसे हुआ?
डॉ. लवलेश- लेखन की रुचि का बीजवपन कक्षा नौ में ही हो गया था, जो धीरे-धीरे अंकुरित होते हुए बीएससी तक कवि गोष्ठियों और छोटे मंचों तक पहुँच गया। इस समय केवल कविता की ओर ही रुझान था और इस काल के गुरु, नगर के प्रख्यात कवि स्व. शिवनाथ 'बिस्मिल' जी थे। फिर हिंदी में एमए, पीएचडी करने के साथ-साथ एक दिशा मिली और लेखन की अभिरुचि केवल कविता नहीं रही बल्कि हिंदी साहित्य में बढ़ती गयी। पीएचडी काव्य में की, किंतु अपने शोध निर्देशक डॉ. सुरेश चंद्र गुप्त के मार्गदर्शन में एक त्रैमासिक पत्रिका 'साहित्यायन' का संपादन करने का अवसर मिला और स्वाध्याय में कहानी-उपन्यास आदि पढ़ने के कारण गद्य की यह विधा कब अपना असर दिखा गयी; पता ही नहीं चला, कहानी लिखने लगा।
 
अनमोल- आपकी मुख्य विधा कहानी ही है। साथ ही आप कविता, गीत एवं ग़ज़लें भी लिख रहे हैं। काव्य और कथा लेखन में से अधिक नज़दीक क्या लगता है?
डॉ. लवलेश- सच तो यह है कि आपका समय और समाज, संवेदनाजन्य अनुभूतियाँ और इन सबका सम्मिलित प्रभाव आपको लिखने के लिए प्रेरित करता है। कभी-कभी भाव एक अजस्र धारा की तरह फूट पड़ते हैं तो कविता बन जाती है और जब विमर्श की भट्टी में मनन की आँच पर वही अनुभूतियाँ तपती हैं तो कहानी आकार लेने लगती है। दोनों ही विधाएँ मेरे मन के निकट हैं बस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहानी में अधिक अनुभव होती है।
 
अनमोल- आपके सम्पादन में आ रही लघु पत्रिका 'अनुगुंजन' के बारे में विस्तार से बताएँ।
डॉ. लवलेश- 'साहित्यायन' का संपादन करते हुए लगभग 10 वर्ष हो चुके थे। इस अंतराल में बहुत से खट्टे-मीठे अनुभव भी हुए। इन्हीं अनुभवों के चलते पत्रिका के मार्गदर्शक और मेरे शोध निर्देशक डॉ. सुरेश चंद्र गुप्त से मेरा वैचारिक मतभेद होना भी आरंभ हो गया। ऐसे समय में जबकि मेरा नाम एक संपादक के रूप में उभर रहा था। मुझे इन्हीं कुछ कारणों से 'साहित्यायन' का संपादन छोड़ना पड़ा, किंतु मैं अपने इस अनुभव को यूँ ही गँवाना नहीं चाहता था तथा 'साहित्यायन' के वे सदस्य जो केवल मेरे कारण पत्रिका से जुड़े थे, उन्हें भी धोखा देना नहीं चाहता था। इसलिए वर्ष 2015 में मैंने अपने प्रकाशन संस्थान अनुकृति प्रकाशन की स्थापना की और इसे रजिस्टर्ड करवाया तथा प्रकाशन के अंतर्गत अपनी त्रैमासिक पत्रिका 'अनुगुंजन' का प्रकाशन-संपादन आरंभ किया। मुझे प्रसन्नता है कि मेरी इस पत्रिका का साहित्य जगत में स्वागत ही नहीं हुआ बल्कि पाठकों का भरपूर स्नेह भी इसे मिला और विगत चार वर्षों से आज तक अनवरत मिल रहा है।
 
पत्रिका का मुख्य उद्देश्य साहित्य-कला और संस्कृति के क्षेत्र में पदार्पण करने वाले नवागंतुकों को एक ऐसा मंच प्रदान करना है, जिस पर वे प्रतिष्ठित साहित्यकारों के साथ न केवल प्रकाशित हों बल्कि उनसे मार्गदर्शन भी प्राप्त करें। इसके साथ-साथ स्वस्थ, स्वच्छ और सोद्देश्य साहित्य पाठकों के समक्ष रखा जाए। विशेष बात यह है कि मेरी पत्रिका के माध्यम से लेखन आरंभ करने वाले कई नवागंतुक आज अच्छा लिख रहे हैं, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण डॉक्टर कामरान खान हैं, जिन्होंने मेरी पत्रिका के माध्यम से ही ग़ज़ल लेखन आरंभ किया है। पत्रिका अपने उद्देश्यों पर खरी उतर रही है, यह देखकर बहुत अच्छा लगता है।
 
अनमोल- 'अनुगुंजन' का नियमित पाठक होने नाते मैं यह कह सकता हूँ कि 'अनुगुंजन' अपने उद्देश्य में पूर्णत: खरी उतर रही है। आपका सम्पादन कौशल भी सराहनीय है। आज पाठकों की भारी कमी के बीच पत्रिका प्रकाशन का कार्य बहुत साहसिक और जोखिम भरा है। 'अनुगुंजन' लगातार प्रकाशित हो रही है। कैसे मैनेज करते हैं।
डॉ. लवलेश- आप जैसे मित्रों, आत्मीयजनों, साहित्य रसिकों एवं प्रिय पाठकों के सहयोग से पत्रिका का प्रत्येक अंक समय से प्रकाशित हो रहा है। वैसे भी 'जहाँ चाह; वहाँ राह'। मैं अपनी पत्रिका में किसी भी प्रकार का विज्ञापन नहीं देता हूँ, केवल कलात्मक अभिव्यक्ति को ही मेरी पत्रिका में स्थान दिया जाता है। मेरी इस बात का भी कलाप्रेमियों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है और वे भी अपनी सामर्थ्यानुसार मेरे इस साहित्यिक यज्ञ में निस्वार्थ योगदान देते हैं। 
 
अनमोल- सच है, 'जहाँ चाह; वहाँ राह'। सोशल मीडिया के दौर में साहित्यिक पुस्तकों और पत्रिकाओं का भविष्य क्या देखते हैं?
डॉ. लवलेश- यह सच है कि आज का युग सोशल मीडिया का है किन्तु यह भी सत्य है कि आज भी लोग काग़ज़ पर अपनी रचना छपवाने के लिए अधिक उत्साहित रहते हैं। वैसे भी पाठक उसे कहते हैं, जो किसी रचना का 'पाठ' करता है और पाठ उसी का किया जाता है, जो किसी पुस्तक या काग़ज़ पर छपा हो, जैसे कविता पाठ, कहानी पाठ या किसी धर्मग्रंथ का पाठ। सोशल मीडिया के माध्यम से पुस्तक वाली 'फीलिंग' नहीं आ सकती। एक पुस्तक को आप वहाँ भी ले जा सकते हैं, जहाँ सोशल मीडिया सुचारू रूप से उपलब्ध नहीं है। एक दूसरी तकनीकी बात यह भी है कि पुस्तक प्रकाशित होने के बाद डाटा करप्ट या डिलीट या फार्मेट होने की परेशानी भी नहीं है।
 
अनमोल- अभी हाल-फ़िलहाल आपका एक कहानी संग्रह आया है 'स्पर्श', इसके विषय में कुछ बताएँ।
डॉ. लवलेश- जी, मेरा तीसरा कहानी संग्रह 'स्पर्श' प्रकाशित हुआ है। इसमें सोलह कहानियाँ हैं और सभी कहानियाँ स्त्री केंद्रित हैं। इसीलिए इसकी टैग लाइन 'स्त्री मन की कहानियाँ' है। इसका प्रकाशन देश के ख्यातिलब्ध प्रकाशन संस्थान शिल्पायन बुक्स, दिल्ली ने किया है और इसका ब्लर्ब प्रख्यात आलोचक प्रो। मधुरेश जी ने लिखा है। बाकी आप कहानियाँ पढ़ेंगे तो कहानियाँ स्वयं अपना परिचय देंगी।
 
अनमोल- पिछले कुछ समय से आप ग़ज़ल-लेखन भी कर रहे हैं। इस तरफ़ आने का मन कैसे बना। ग़ज़ल लेखन को कहाँ पाते हैं इन दिनों, ख़ास तौर पर हिन्दी ग़ज़ल को
डॉ. लवलेश- मैंने बताया ना कि मैंने लेखन का आरंभ कविता से ही किया था। पहले गीत लिखे फिर धीरे-धीरे ग़ज़लों की ओर बढ़ा। ग़ज़ल के विषय में पढ़ा और फिर प्रख्यात ग़जलकारों के संपर्क में आने से ग़ज़ल लेखन की ओर सक्रिय हुआ।
 
जहाँ तक हिन्दी ग़ज़ल की बात है तो मेरा मानना है कि आज के समय की सशक्त काव्य विधा यदि कोई है तो वह ग़ज़ल ही है क्योंकि इसमें आज के समय, समाज और परिस्थितियों को ख़ूबसूरती के साथ अभिव्यक्त करने की क्षमता है। आज की ग़ज़ल पारंपरिक ग़ज़ल से बहुत आगे निकल चुकी है। आप तो स्वयं एक प्रतिष्ठित ग़ज़लकार हैं, आप यह बात आसानी से समझ सकते हैं। एक बात अवश्य है, जिसकी कमी खलती है और वह यह कि ग़ज़ल में निष्पक्ष मूल्यांकन होना चाहिए। इस विधा का निष्पक्ष समुचित मूल्यांकन अनिवार्य है।
 
अनमोल- बहुत ज़रूरी बात कही आपने। उम्मीद है कि इस क्षेत्र में हालात सुधरेंगे। आपके परिवार के विषय में भी कुछ जानकारी चाहेंगे।
डॉ. लवलेश- मेरा परिवार बहुत छोटा है। मैं और मेरी एक बहन। बहन का विवाह बरेली में ही एक व्यवसायी परिवार में हुआ है। वह अपने पति और दो पुत्रों के साथ रहती है। मैं अपनी पत्नी और दो पुत्रियाें के साथ अपनी माता के साथ ही रहता हूँ। गत वर्ष पिताजी का देहांत हो चुका है। पत्नी संगीत की शिक्षिका एवं गायिका हैं। वे अनुश्रुति संगीत महाविद्यालय की ‌संचालिका हैं। इसके साथ ही वे आकाशवाणी और दूरदर्शन की कलाकार हैं।
 
अनमोल- श्रीमती जी ख़ुद एक कलाकार हैं। अच्छा तालमेल रहता होगा दोनों फ़नकारों का। आपके पिताजी भी एक प्रसिद्ध फोटोग्राफर रहे हैं। मतलब पूरा परिवार ही कलाकारों से भरा है। अपने फोटोग्राफी के शौक़ के विषय में कुछ बताएँ।
डॉ. लवलेश- मेरे पिताजी एक उच्च कोटि के चित्रकार थे लेकिन उन्होंने फोटोग्राफी को अपना व्यवसाय बनाया। मोनिका आर्ट स्टूडियो के नाम से बरेली कॉलेज रोड पर स्थित था। बचपन से ही कैमरों से खेलता रहा और पता ही नहीं चला कब फोटोग्राफी आ गई। सच कहूँ तो कला मुझे विरासत में मिली है। हाँ, उसके रूप अलग-अलग हो गए। पहले तो पिताजी के साथ उनके व्यवसाय में सहयोग करता था किंतु अध्यापन कार्य में प्रवृत्त होने के बाद मैंने फोटोग्राफी को व्यवसाय की तरह नहीं लिया। अब यह केवल एक शौक रह गया। आप तो जानते हैं कि मुझे लेखन के साथ-साथ पर्यटन का भी शौक है तो इसी क्रम में फोटोग्राफी भी मेरे से जुड़ी हुई है और जहाँ कहीं भी जाता हूँ, वहाँ चित्र  खींचना तो स्वाभाविक है। मैं कोशिश करता हूँ कि मैं जिन स्थानों का भ्रमण कर रहा हूँ, उन स्थानों की संस्कृति, भौगोलिक परिदृश्य और रीति-रिवाजों को लेखन के अतिरिक्त अपने चित्रों के माध्यम से भी कलाप्रेमियों के समक्ष रख सकूँ।
 
अनमोल- अपने हरफ़नमौला व्यक्तित्व के दम पर आप बहुत अच्छा कर रहे हैं। 'स्पर्श' की सफ़लता के लिए हमारी शुभकामनाएँ। अपना कीमती समय देने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।
डॉ. लवलेश- आपका भी हार्दिक आभार
 

- डॉ. लवलेश दत्त
 
रचनाकार परिचय
डॉ. लवलेश दत्त

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गीत-गंगा (1)कथा-कुसुम (6)आलेख/विमर्श (2)ख़ास-मुलाक़ात (1)