प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
दिसम्बर 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

धारावाहिक
गवाक्ष - 13
 
"आप बहन की चिंता मत करिए, जो होगा अच्छे के लिए ही होगा। दुनिया में आए हैं तो श्वाँसों के रहते तक मनुष्य को जीवित रहना होता है, फिर अर्थपूर्ण जीवन क्यों न जीया जाए?  इसमें कोई संशय नहीं है कि अक्षरा दर्शन-क्षेत्र में अपना नाम और भी  रोशन करेगी।" स्वरा ने अक्षरा का पक्ष लिया।
 डॉ सत्यविद्य श्रेष्ठी! दर्शन का इतना बड़ा नाम! ज्ञान के भंडार! उनसे न प्रभावित होना संभव ही नहीं था। देश-विदेशों में दर्शन पर व्याख्यान के लिए जाना, साथ ही अपनी दर्शन पर लिखी जाने वाली महत्त्वपूर्ण पुस्तक के कारण उनके पास समय का बहुत अभाव था अत:अब वे कोई नया शोधार्थी लेने के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने दर्शन की गहराई में उतरने के लिए अपने विश्वविद्यालय में त्यागपत्र दे दिया था।
 
विश्वविद्यालय में सत्याक्षरा व भक्ति का परिचय हुआ और बहुत शीघ्र प्रगाढ़ मित्रता में परिवर्तित हो गया। भक्ति राज्य के मंत्री की विदुषी बेटी थी जिसके पिता भी डॉ. श्रेष्ठी को अपना गुरु मानते थे। जीवन के एक ऐसे मोड़ पर प्रोफेसर ने उन्हें लड़खड़ाने से बचा लिया था जिसमें यदि वे संभल न पाते तो उनके लिए जीवन में बहुत कठिनाइयाँ उत्पन्न हो जातीं। भक्ति की माँ स्वाति भी प्रोफेसर का बहुत आदर करती थीं। भक्ति ने जन्मते ही अपनी माँ को खो दिया था, उसके पिता ही  माता-पिता थे तथा गुरु पथ-प्रदर्शक! एक प्रकार से श्रेष्ठी उसे अपनी बिटिया ही मानते थे। उन दिनों अक्षरा व स्वरा प्रतिदिन प्रो.श्रेष्ठी के 'चैंबर' के चक्कर लगाते रहते थे। अक्षरा की मित्रता के पश्चात भक्ति भी उनमें सम्मिलित हो गई और प्रोफ़ेसर को अन्य कोई छात्र न लेने का अपना प्रण तोडना ही पड़ा। 
 
"कोई विषय पसंद किया है?" उन्होंने सत्याक्षरा से वैसे ही पूछ लिया था। 
"जी" अक्षरा का चेहरा खिल उठा था। उनके प्रश्न को उसने बीच में ही लपक लिया था। 
"राजनीति में दर्शन सर..." सत्याक्षरा के मुँह से अचानक निकल गया, इस विषय पर वह वर्षों से चिंतन कर रही थी। 
"अरे वाह! बहुत गहन विषय है। इतना विद्वत्तापूर्ण विषय का चयन कोई विद्वान ही कर सकता है। आपको सूझा कैसे?" अचानक  उनके मुख-मंडल पर अक्षरा ने  एक विश्वास देखा और उत्साह से भर उठी। 
उल्लास के बंद वातायन में दस्तक हुई जिसकी झिर्री से  झरती शीतल पवन ने उसके  चेहरे को स्निग्ध  शीतलता से भर दिया। स्वप्न सत्य होने की कगार पर था। 
 
डॉ. श्रेष्ठी एक ज़हीन,सच्चरित्र व संवेदनशील विद्वान थे। वे कोई व्यक्ति नहीं थे, अपने में पूर्ण संस्थान थे 'द कम्प्लीट ऑर्गेनाइज़ेशन!' उनका चरित्र शीतल मस्तिष्क व गर्म संवेदनाओं का मिश्रण था। 
बहुत कठिनाई से उनके साथ कार्य   करने  का अवसर  प्राप्त हुआ था। अक्षरा को जैसे आसमान मिल गया, उसको  बहुत श्रम करना था।अपना  स्वप्न साकार करने के लिए वह रात-दिन एक कर रही थी। एक वर्ष के छोटे से समय में उसने इतना कार्य कर लिया कि प्रो. आश्चर्यचकित हो गए। वे उसकी लगन से बहुत संतुष्ट थे और आज की शिक्षा से बहुत असंतुष्ट !
यदा-कदा वे कहते --
"आज शिक्षा प्रदान करने के  स्थान पर व्यापार किया जा रहा है और छोटे स्कूलों में तो केवल व्यापार ही किया जाता है। बालपन में ही बच्चे सही शिक्षा से वंचित रह जाते हैं। पाठ्यक्रम में ऎसी चीज़ें समाविष्ट की जाती हैं जिनका व्यवहारिक ज्ञान से कोई संबंध नहीं होता। शिक्षा का अर्थ केवल पाठ्यपुस्तकों में लिखे अध्यायों को किसी न किसी प्रकार पूरा  करना होता है। इस शिक्षा का अर्थ मेरी तो बुद्धि में आता नहीं। "
प्रोफेसर से ज्ञान प्राप्त करना, उनके खुले विचारों को जानना,  उनसे  चर्चा करना एक विशिष्ठ उपलब्धि होती ।
प्रोफेसर का गहन ज्ञान उसे  सम्मोहित कर देता, लगता दुनिया में यदि ऐसे गुरु हो जाएं तब दुनिया का ढांचा ही परिवर्तित हो जाए। वह प्रोफ़ेसर  के कथन में इतना डूब जाती कि पुस्तकालय बंद  होने के समय  कभी -कभी चपरासी आकर कहता;
"मैडम ! हमें भी अब घर जाना है...." तब उसे होश आता और काम बंद होता। इस बात की शिकायत उसने प्रो.से भी की थी, जिसका उन्होंने अक्षरा से हँसकर ज़िक्र किया था।
 
एक दिन अक्षरा को पुस्तकालय में नौ बज गए। वह आठ बजे तक घर पहुँच जाती थी। भाई-भाभी चिंतित हो उठे और शीघ्रता से पुस्तकालय पहुंचे। वहाँ के दृश्य ने उन्हें अधमरा कर दिया! अक्षरा बेहोशी  की अवस्था में लुटी-पिटी सी फर्श पर पड़ी थी, उसके शरीर पर जगह-जगह खरोंचें लगी हुईं थीं, कपडे तार -तार कर दिए गए थे।  शराब की बोतलें लुढ़की हुई थीं, अक्षरा की यह स्थिति देखकर स्वरा का दिल रो पड़ा। सत्यनिष्ठ बहन को देखकर पागल सा हो उठा। वह वहाँ पर चीखने-चिल्लाने लगा लेकिन कोई सुनने वाला नहीं था। किसी प्रकार दोनों ने स्वयं को संभाला, रोते हुए ह्रदय और लगभग निर्जीव काँपते  हुए हाथों में अक्षरा को समेटकर वे गाड़ी में लिटाकर घर ले आए। 
 
इस हादसे ने घर को निर्जीव कर डाला। परिवार में मानो किसी की मृत्यु हो गई थी। शेष सदस्य सहमे हुए से ज़िंदगी में मानो जीवित रहने का कारण तलाश कर रहे थे। अक्षरा बिलकुल गुम हो चुकी थी। उन दिनों उसकी सखी भक्ति तथा प्रोफ़ेसर जर्मनी गए हुए थे। उनके वहाँ से लौटने के तुरंत बाद ही अक्षरा के शोध-निबंध की प्रस्तुति थी। अपने शोध की समाप्ति तथा उसकी  प्रस्तुति  के बारे में वह बहुत उत्साहित थी तथा उत्सुकता से अपने गुरुदेव की प्रतीक्षा कर रही थी। अक्षरा  का श्रम रंग लाने वाला था, वह सोते-जागते अपने शोध-प्रबंध की प्रस्तुति की कल्पना करती रहती। इस अनहोनी  दुर्घटना  ने अक्षरा का मन काँच सा तिडक दिया था। ज़रा सी बात किसी ने पूछी नहीं कि उसके मन की दीवार में से  तिड़के हुए कॉंच की किरचे कुछ इस प्रकार भुरने  लगतीं  कि वह बिलबिला उठती। यह समय अक्षरा के लिए काटने आते हुए सर्प की फुफकार जैसा था,बेचारगी और सिहरन से भरा!  
 
स्वरा ने प्रोफेसर को मेल कर दिया था। आवश्यक था उन्हें अक्षरा की अनुपस्थिति की सूचना देना। ज़िंदगी की कड़वी सच्चाई के घूँट अक्षरा के कंठ में फँसे हुए थे, उन्हें निगलने -उगलने में उसकी साँसें जैसे बान की खुरदुरी  रस्सी से कस जाती थीं जो कसने के साथ -साथ चुभने के लिए भी तैयार रहती, हर पल  तीखे डंक मारती थी। कंठ में फांस से घुसे नुकीले चुभते पीड़ा के रेशों ने उसकी दृष्टि को पथरा दिया था। अगले दिन चौकीदार को पुस्तकालय के एक कोने के कमरे में रस्सियों से जकड़ा हुआ अचेत पाया गया था। इस समाचार ने त्राहि-त्राहि मचा दी। चौकीदार इतना घबराया हुआ था कि आवाज़ उसके कंठ में फँस कर रह गई थी। होश में आने पर उसने सुबकते हुए बताया था 
"साब! चार लोग थे जो पुस्तकालय में घुसे थे। मैंने उन्हें रोकने की कोशिश की तो उन्होंने मेरे मुँह पर कपड़ा बाँध दिया और कोने वाले कमरे में ले जाकर रस्सी से कसकर  बाँधकर वहाँ पटक दिया। उसके बाद मुझे नहीं पता क्या हुआ?"
 
अब सत्यनिष्ठ को लोगों की चिंता ने सताना शुरू कर दिया, लोग क्या कहेंगे? स्वरा इस बार भी उससे उलझ पड़ी। 
"मुझे नहीं पता सत्य तुम किस मिट्टी के बने हो, तुम्हें अक्षरा  से अधिक इस बात की चिंता सता रही है कि लोग क्या कहेंगे? अक्षरा के सामने तुम ऐसा कुछ नहीं बोलोगे जिससे वह बिलकुल बिखर जाए। हमें  उसकी मानसिक स्थिति संभालनी है और ऐसे लोगों  के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही भी ज़रूरी है जो समाज के नाम पर कलंक 
हैं।"
"मतलब?"  सत्यनिष्ठ घबरा गया जाने यह स्त्री क्या करने जा रही है?
" मतलब यह कि मैंने अक्षरा को तैयार कर लिया है, वह पुलिस में गवाही भी देगी और यदि वे लोग पकड़े गए तो कोर्ट में भी गवाही देगी। "
" तुम्हारा दिमाग़ ख़राब हो गया है क्या?" वह झल्ला गया। 
"कुछ भी समझ लो..." और वह शिथिल अक्षरा को लेकर पुलिस -स्टेशन पहुँच गई थी। 
स्वरा ने प्रोफेसर को भी मेल करके  दुर्घटना की सूचना दे दी थी। अब अक्षरा को ज़िंदगी की कड़वी सच्चाई के घूँट पीकर जीना था जिसके लिए स्वरा उसे तैयार कर रही थी।
 
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- डॉ. प्रणव भारती