प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
दिसम्बर 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

फ़िल्म समीक्षा
फिल्म समीक्षा: 2.0 'दिए तले अंधेरा
 

 
निर्देशक - शंकर 
स्टार कास्ट - रजनीकांत, अक्षय कुमार , एमी जैक्सन , आदिल हुसैन , सुधांशु पांडे , रियाज खान 
संगीतकार – ए आर रहमान  
 
यह कहावत तो आपने सुनी ही होगी - "दिए तले अँधेरा" अब इसे एक बार पुनः चरितार्थ होते देखिए भारतीय सिनेमा के बड़े पर्दे पर। रोबोट फ़िल्म का रीमेक कही जाने वाली फिल्म 2.0 इस गुरुवार सिनेमाघरों में बड़े शानदार तरीके से दिखाई जा रही है। दक्षिण भारत में रजनीकांत के फैंस ने उनकी फ़िल्म में एंट्री को भी शानदार तरीके से सेलिब्रेट किया है। और आज 30 नवंबर 2018 को रजनी ने 43 साल सिनेमाई कैरियर में पूरे किए हैं। दक्षिण भारत में भगवान की तरह पूजे जाने वाले रजनीकांत और अक्षय कुमार की जोड़ी कितना धूम मचाएगी यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। किंतु एक बात तो सत्य है कि रीमेक के नाम पर इस बार भी गहराई से सिनेमा की पहचान रखने वाले लोगों के लिए यह फ़िल्म पेशानी पर शिकन का बायज़ बन सकती है। रोबोट फ़िल्म में जिस तरह कसा हुआ निर्देशन, कसी हुई पटकथा, गीत- संगीत विजुअल इफेक्ट्स देखने को मिले थे वह सब 2.0 में सिरे से नदारद तो नहीं कहे जा सकते मगर कुछ हद तक कमजोर अवश्य है और फिल्में खाली विजुअली इफेक्ट्स पर तो नहीं चला करती ना जनाब।
 
फ़िल्म की कहानी सीधी सी है कि आज के समय में मोबाइल फोन और गेजेट्स का इस्तेमाल बेतहाशा और धड़ल्ले से बढ़ता जा रहा है। जिसके कारण हमारा वायुमंडल भी खासा प्रभावित हुआ है। वैज्ञानिक तकनीक का जितना सदुपयोग हुआ है उससे कहीं ज्यादा हम लोगों ने दुरुपयोग किया है। विदेशों में तो काफ़ी लोगों को यह बात समझ आने लगी है। किंतु हम भारतीय तो उस कुत्ते की पूँछ की तरह हैं जो कभी सीधी नहीं होने वाली। खैर अब कौन मगज खपाए इस ज्ञान को बांटने में। यह काम तो हमारे रजनीकांत भी नहीं कर पाए और ना उनके "ऑल द रजनी फैन्स - थलाइवा" गाने वाले कर पाएंगे। हाँ एक बात जरूर है अक्षय कुमार अपने गैटअप से जरूर प्रभावित करेंगे किंतु अदाकारी के मामले में वे फिसड्डी ही साबित हुए हैं। इस ओर भी कुछ लोगों का ध्यान नहीं जाएगा क्योंकि उनका गैटअप आपकी आंखों में ऐसा चुंधियागा कि आप कुछ और देखने की कोशिश भी नहीं करेंगे। फ़िल्म की मोटा-मोटी कहानी रेडियेशन्स पर ही आधारित है। किंतु इसमें हॉलीवुड का छौंक लगाने की जो कोशिश की गई है उसे तर्कों के तराजू में न तौलिएगा। क्योंकि ऐसा करना आपके मनोरंजन में व्यवधान पैदा कर सकता है। हालांकि फिल्म के निर्देशक शंकर ने इससे पहले रोबोट फिल्म बनाकर जरुर हॉलीवुड से मुकाबला करने की कोशिश की थी। किन्तु 2.0 पूरी तरह से हॉलीवुड के पैमाने पर भी खरी नहीं उतरती । हमारे भारतीय फिल्म निर्देशकों को यदि हॉलीवुड की बराबरी करनी है तो अभी भी उनसे बहुत कुछ सीखना बाकि है । 3D /3डी इफेक्ट के चमकीले रैपर में निर्देशक और निर्माताओं ने जो चॉकलेट आपको दिया है बस उसे चाटते रहें। रेडिएशन से नुकसान केवल मानव प्रजाति को या हमारे वायुमंडल को ही नहीं हुआ है अपितु उस गिरैया को भी हुआ है जो अब दिल्ली जैसे महानगरों से कब का पलायन कर चुकी है। यह फ़िल्म उन पक्षियों के लिए भी खासी संवेदनशील नहीं दिखाई पड़ती। 
 
इसके अलावा फिल्म के एक्शन सीक्वेंस सड़कों पर जिस तरह से फिल्माए गए हैं उन्हें देख कर तो सड़कों पर मजमा लगना चाहिए किंतु आम जन को इससे लगता है विशेष सरोकार नहीं है। इसलिए जब चिट्टी और वसीकरन की लड़ाई होती है तो वे लोग अपनी दैनिक दिनचर्या में व्यस्त दिखाई देते हैं। अक्षय कुमार और रजनीकांत के अलावा एमी जैक्सन भी फ़िल्म में है और इन्होंने भी केवल अपनी सुंदरता दिखाने के अलावा खासा प्रभावित नहीं किया है।
फ़िल्म रेडिएशन के खिलाफ मैसेज तो अच्छा देती है किंतु वह मैसेज जब तक पूरी तरह से देखने वालों के दिलो दिमाग में या जेहन में कब्ज़ा न जमाए तो एक कहावत और सिद्ध होती है - असफलता केवल यह सिद्ध करती है कि सफलता का प्रयास पूरे मन से नहीं हुआ। बाकी ए आर रहमान का फ़िल्म में दिया गीत संगीत भी इस मामले में पैदल है। बाकी आप रजनीकांत के या अक्षय कुमार के फैंस हैं तो फ़िल्म देखने जरूर जा सकते हैं। या स्पेशल इफेक्ट्स और 3D फिल्में पसंद करने वालों के लिए भी यह इस हफ़्ते का अच्छा मनोरंजन साबित हो सकती है। देखना दिलचस्प यह भी होगा कि लगभग 543 करोड़ के बजट से बनी यह फ़िल्म क्या अपना बजट कवर कर पायेगी या नहीं ? 

 


- तेजस पूनिया