प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
दिसम्बर 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

यादें!
जैसे कल की ही बात हो!
 
बच्चों की ढेर सारी प्यारी-प्यारी तस्वीरें देखकर बालपन के गलियारे में छपाक से कूद जाना लाज़मी था | मुठ्ठी भर यादों की छाया जहाँ-तहाँ बिखरी पड़ी थी | बच्चों की कोमल संवेदना संग झूमते -थिरकते पॉंव एक अँधेरी गली के मोड़ पर ले गए जहाँ छोटे-छोटे रोशनी के धब्बे बिखरे पड़े थे | 
ओह ! यह दिल्ली का स्टेशन था ,बात ज़रा बहुत पुराने ज़माने की है जब स्टेशनों पर भी कोई बहुत चकाचौंध नहीं होती थी | जी हाँ ! दिल्ली के स्टेशन पर भी आज जैसी धमा-चौकड़ी ,बड़े-बड़े बल्ब ,ढेर सारी गाड़ियों की आवाजाही न होकर थोड़ी शांति ही रहती | हाँ ! गाड़ी आने पर कुलियों के साथ दौड़ते या फिर लंबे-लंबे डग भरते पाँव तो देखने में आते थे लेकिन इतना टकराव न होता जितना हम आज देखते हैं | देखते ही देखते दिल्ली का स्टेशन भी इतना बदल गया है कि हमारा वो किस्सा ,जिसे हमने खूब जीया है ,अपने आप जीया है ,साँसों में भरकर जीया है, रोते-गाते जीया है आज हमें एक स्वप्निल भीड़ में घसीट ले जाता है | 
 
बात कर रही थी उस दिन की जब मैं सुन्दर सी घेर वाली फ्रॉक पहने अपने पिता के साथ दिल्ली से मुज़फ्फरनगर जाने के लिए रेलगाड़ी में सफ़र करने निकली थी | माँ मुज़फ्फरनगर रहतीं, मैं माँ के पास | अब तो याद नहीं ,न जाने किसी त्यौहार पर मैं माँ के साथ पापा के पास आई थी | माँ चली गईं थीं ,उनका कॉलेज खुल रहा था ,मैं पापा के पास रूक गई  | दो-चार दिनों बाद वो मुझे छोड़ने मुज़फ्फरनगर आ रहे थे | अधिकतर हम बस से आते-जाते ,न जाने क्यों उस  बार हम रेलगाड़ी से जा रहे थे | 
मरियल सी रेलगाड़ी प्लेटफॉर्म पर छुकर छुकर करती आ खड़ी हुई | पापा मेरी उंगली थामे धीमे-धीमे कदमों से आराम से खाली डिब्बों में झाँकने की कोशिश कर रहे थे | कोई चकाचौंध वाली रोशनी नहीं ,डिब्बों के अंदर भी बुझे-बुझे से बल्ब टिमटिमा रहे थे | एक  खाली डिब्बा देखकर  पापा की बाँछें खिल गईं थीं | उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर मुझे डिब्बे में चढ़ा दिया फिर स्वयं डिब्बे में प्रवेश कर गए | न कोई आरक्षण,न कोई धक्का-मुक्की ! यात्री बहुत आराम से हाथ-पैर फैलाकर बैठे हुए थे | पापा ने मुझे एक खाली सीट पर बैठा दिया ,मैं पापा से नाराज़ सी थी क्योंकि पापा मुझे काफ़ी दूर प्लेटफ़ॉर्म पर दौड़ाते हुए से लाए थे | इस झीनी रोशनी और उस समय की झीनी रोशनी में बहुत फर्क था ,इतना कि आज की पीढ़ी के लिए शायद उसकी कल्पना करना भी असंभव सा है |
सुने गए और ओढ़े -बिछाए  गए  मौसम में बहुत फ़र्क होता है न ? हमारी पीढ़ी ने उस मौसम को ओढ़ा-बिछाया है ,इसीलिए शायद पाँच वर्षीया या उससे भी कम की आयु की यादें कभी कभी जबरन धुंधलका चीरकर एक चमक बन आँखों के सामने तिरने लगती हैं | 
      
नवंबर माह की शुरुआत, लगभग शाम के सात,साढ़े सात का समय रहा होगा, गाड़ी को चलने में अभी लगभग एक घंटा था ,जो पापा ने मुझे बताया था | सो,घबराने की कोई वजह तो थी नहीं | सामने वाली सीट पर दो भद्र पुरुष थे और मेरी वाली बर्थ पर एक महिला घूँघट में मुखड़ा छिपाए घूँघट को हाथों में पकड़े इधर-उधर प्लेटफ़ॉर्म पर नज़रें घुमा रही थीं | पापा मेरे लिए कुछ फल-फलारी लेने प्लेटफ़ॉर्म पर उतर गए । बहुत धुंधली  सी याद है ,मैं काफ़ी देर तक तो इधर-से उधर ताकती रही हूँगी  फिर असहज सी होने लगी हूँगी | सामने वाली बर्थ से एक सज्जन उठकर शायद कहीं चले गए थे और जिनको पापा मेरा ध्यान रखने के लिए कह गए थे वे झटोके खाने लगे थे | प्लेटफ़ार्म पर  भी कोई गहमागहमी नहीं थी|  खिड़की से झाँकने पर पापा का कोई अता -पता नज़र नहीं आ रहा था | खट्टी-मीठी गोलियाँ बेचने वाला भैया कई बार डिब्बे में इधर से उधर चक्कर काट गया था पर पैसे कहाँ थे जो खरीद पाती।वैसे पापा से खट्टी मीठी लैमनचूस मांगने पर मिलने की कुछ ख़ास उम्मीद तो नहीं थी पर कोशिश करने में हर्ज़ भी क्या था लेकिन पापा दिखाई तो देते। मन कुछ घबरा सा गया था ,मैंने इधर-उधर देखा और अपनी बर्थ पर से खड़ी हो गई ,किसीने मुझे टोका ही नहीं | मैं और निश्चिन्त हो गई और बैग वहीं छोड़कर डिब्बे में से उतर पड़ी | 
   
अब प्लेटफ़ॉर्म पर एक अकेली छोटी बच्ची खड़ी अपनी आँखों को इधर-उधर घुमाए अपने पिता को तलाश रही थी लेकिन पिता कहीं नज़र ही नहीं आ रहे थे | अचानक उसकी आँखें आँसुओं से लबालब भर गईं और मिनटों में आँसू गालों पर बहने लगे | जिस फ्रॉक को पहनकर वह बहुत इतरा रही थी,उसी सुन्दर सी फ्रिल वाली फ्रॉक में उसने अपने आँसू भरने शुरू कर दिए |कुछ ही देर में बच्ची के चारों ओर लोग जमा होने लगे।अब बच्ची ज़ोर-ज़ोर से बुक्का फाड़कर रोने लगी ।भीड़ बढ़ने लगी और साथ ही बच्ची के रोने की आवाज़ भी ।
जूतों की लेस खुल गई थी ,आँखों में आँसू भरे होने के कारण वह  लेस में उलझकर लड़खड़ाकर गिर गई । कुछ पाँव बच्ची को उठाने के लिए आगे बढ़े।अचानक  एक पहचानी आवाज़  सुनकर उसने सिर उठाकर देखा ,पापा थे। रोते रोते वह पिता की ओर भागी जो खाद्य सामग्री व फलों  के पैकेट्स पकड़े आश्चर्य से उसकी ओर देख रहे थे कि उनकी बेटी गाड़ी से कैसे उतरकर प्लेटफ़ॉर्म पर आ गई है? 
" पापा " मैं सुबकते हुए पापा की तरफ़ भागी ।
 
प्लेटफ़ार्म की एक बैंच पर पापा ने अपने हाथ की चीज़ें रख दीं और मुझे अपने से चिपटा लिया ।
मेरे जूते की लेस बांधी और मुझे पुचकारते हुए पूछा कि मुझे डिब्बे से उतरने की क्या ज़रूरत थी ?वो तो मेरे लिए खाने की चीज़ें लेने ही गए थे न?
तब मैंने पापा को उस खट्टी मीठी लैमनचूस के बारे में बताया। मैं जानती थी कि वो गोलियाँ , बरफ़ का गोला और बुढ़िया के बाल पापा मुझे कभी नहीं दिलाते थे क्योंकि मुझे टांसिल्स थे और दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल से मेरे आप्रेशन की तारीख़ ले ली गई थी ।
रोती हुई बच्ची को पिता द्वारा डिब्बे में इस प्रकार अकेले छोड़कर आने पर पापा को लोगों की काफ़ी बातें सुननी पड़ीं। गोदी में उठाकर वो मुझे डिब्बे में ले आए। गोली वाले भाई के आने पर मुझे इस बार लैमनचूस की गोलियाँ मिल गईं। हाँ,जनवरी माह में मेरा  गले का आप्रेशन भी करवा दिया गया।
अपने बचपन की यह घटना माँ-पापा ने मुझे इतनी बार सुनाई थी कि मुझे आज तक भी यह 'कल की बात' लगती है ।
 
                                          
 

- डॉ. प्रणव भारती