प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
दिसम्बर 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन
तुझे कहूँ कि तेरे शहर को...!
 
तुम्हारी अल्हड़ जुस्तजू में झुम्पा गांगुली,
मैं कॉलेज स्ट्रीट की सैकड़ों किताबें छान आया,
वहाँ छोटी- बड़ी नालियों से बजबजाती हुई,
हर सड़क पे बिकनेवाले अड़हुल के सुर्ख रंगों पर
मैंने फिर विरह की नयी कविताएँ लिखनी चाहीं,
उनमें मुझे प्रेम के रिसते ख़ून की गंध मिली।
ये कैसी अजीब गंध थी,
जिससे मिलकर ही
मैं मिल पाया
तुम्हारी बेपरवाही के कई सारे ज़िन्दा सबूतों से!
 
तुम नहीं आयी शहर के किसी व्यस्त बाज़ार में
जहाँ घूमता रहा मैं बेचैन
तुम्हारी नर्म यादों की बेसब्र
ख़रीदारी में,
मैं अकेला ही तुम्हारे कोलकाता में
जाने क्यों फिर भटकता फिरता रहा इस बार भी!
 
उलझा हुआ था जब
मैं सिगरेट के उन्मादी कशों में
तुम्हारे धुआँ- धुआँ शहर की तरह,
तुम्हारी दोस्त रूना हसन मुझे बड़े से पुल पर सिसकती मिली,
उसने क्या नहीं खोया उसके अपने शहर में
पर मिला उसे भी नहीं,
वो जिसपर सब लुटाकर
वहीं अपना नया शहर बसाना चाहती थी!
 
मैं सुन रहा था,
कि तुम ख़ुद बेवफ़ाओं के इस शहर में कहीं बुत तो नहीं बन गयी,
कैसे इन फ़िज़ाओं में साँस लेती हो तुम झुम्पा, कहो न?
तुम्हारी मुहब्बत की उम्मीद से ज़्यादा फिर मुझे
रूना हसन ने ही
तुम्हारी हिफ़ाज़ती के संभावित कशीदे सुनाए,
तब, जबकि वो ख़ुद टूटकर बिखरी हुई थी।
 
एक पूरी रात फिर अख़बार ओढ़कर ही
मैं प्लेटफार्म पर भूखा सोया रहा,
प्यास नहीं लगी एक बार भी मुझे,
मेरी ज़ेब में पैसे थे,
बैग में तुम्हारे शहर के मशहूर छह बड़े पके अमरूद
लगातार उल्टियों जैसी दुर्गंध मारते रहे थे,
और फिर मैं लौट आया!
 
बहुत सुन रखा था मैंने,
तुम्हारे बड़े से शहर में मिलनेवाली
सुनहरी और पागल उम्मीदों के बाज़ार को
मैं वहाँ भी तो गया
कई दफ़े प्रेम में मिलनेवाले बुख़ार से तिलमिलाकर,
और विरह से उपजी वर्जनाओं को लाँघकर
पर इतनी छोटी बात नहीं समझ सका-
मेरी किसी ख़रीदारी में
भौतिकता का वैसा सामर्थ्य नहीं था,
जो मुझे- तुम्हें एहसासों के हिसाब- क़िताब का
पक्की रसीद- सा कोई आश्वासन ला दे,
और, मुझे कहीं अपनी ज़मीन पर लौट जाना भला- सा जान पड़ा, झुम्पा!
 
मैं चला आया, तुम्हारे शहर में
अपने प्यार के सारे अधूरे अरमान छोड़कर,
मैं तब भी चाहता रहा
अगर तुमने सोचकर कभी की हो
तो तुम्हारी बेवफ़ाई पर
कोई मज़मून या दायरे तय कर लूँ,
मुझे तुम्हारे साथ में मिलनेवाले सहारे के लिए
रिश्तों के ज़हर को उगलना हर तरह से जायज़- सा जो लगा।
 
तुम्हें पढ़ते हुए मैंने फिर भोर की तेज़ धूप देखी,
जिस चिलचिलाती उष्णता में
प्रेम की कोई गन्ध यकायक किसी सीने में बहककर फैलती है,
ऐसे ही किसी स्याह रात में भी
तुममें उलझा हुआ मेरा मन अजनबी हो जाता है
और नीन्द से निकलने वाले
लाचार सपने
सिसककर मन की गुफाओं में अब सो जाते हैं
मैं कुहरे और धुंध में कंपकंपाकर भी फिर
तुमपर ही बेकार सी कविताएँ लिखने लग जाता हूँ,
 
तो तुम क्यों नहीं मानती, झुम्पा गांगुली
बेवफ़ाओं के शहर में
तुम कम से कम आधी बेवफ़ा तो हो गयी हो!
 
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बताओ न...!
 
कहाँ कोई पूछता है,
कैसे
प्रेम की गिरहों से
तुम्हें तराशकर निकाला मैंने,
और किस तरह
तेरे समन्दर के गर्भ- गृह से
तुम्हारे उग्र उफान को
किया था क़ैद,
अपनी इस सशक्त अंजुरि में!
 
कहो न,
पूछता कौन है अब
हमारी मौजूँ रातों की कहानी
कि जिनके स्याह रंगों में
हमने कभी प्यार की अपनी
घनी और मदहोश,
रवानी लिखी थी!
 
हम हज़ार राहों में
कभी जहाँ मिलकर चले,
और प्रेम- वेदना को
अपनी आबो- हवा में लपेटकर
उसकी सलामती में
नाहक ही नमाजी बने,
वक़्त की तंग यादों ने भी,
बताओ न,
वहाँ कहाँ कोई,
अपनी उखड़ी साँसें ही संजोयीं!
 
यह जानते हुए भी
मिट ही जाएगा इक दिन
इस निष्ठुर बारिश में
प्रेम- पीर का पूरा वजूद,
मैं ख़ुद फिर भी
बेपरवाह चींटियों की तरह
इक उम्र तक
सपनों की बाम्बियाँ गढ़ता रहा
 
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भूलना कहाँ होता....
 
तुम्हें कभी याद नहीं किया
कि भूल जाने पर
भरसक ऐसे प्रयोग किये जा सकते थे।
 
जिन्हें भूल जाने का भय है
वो याद करें
और निभाए अपनी दिनचर्या,
मेरा मन किसी डर के मुग़ालते में नहीं रहता,
फिर क्यों मैं
याद कर लेने के भरम में जियूँ!
 
कल रात भी
तुम पर फिर एक कविता लिखी है,
पूरी रात अकेला जगकर।
 
यों मुनासिब है मेरे लिए
याद किये जाने से
कहीं बेहतर
किसी को अपने लफ़्ज़ों में बांध लेना
 
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और जो बदल गया
 
तुम जब शहर की ओर जा रही थी
मैं वहीं
अपने घर में बेसुध पड़ा रहा।
 
मैं रहा मशगूल,
मुझे मेरी ख़्वाहिशें समेटनी थीं
और एहसासों के तूफ़ान से
निकाल के
जी लेनी थीं कई अबूझ ज़िन्दगियाँ।
मैं डूबा हुआ था,
तब भी उन्हीं वायदों के भरम में
जिनसे मेरी साँसों में
कभी कोई ज़िन्दा रवानी तुमने भरी थी।
 
यूँ तो
तुम्हें लौटकर आ जाना था
अपने ही किसी मुक़म्मल पहलू में
कि भूल जाना था फिर
कभी न छूटने वाले बेपरवाह ख़यालों को,
प्रेम- बगिया की गढ़ी चहारदीवारी को
जहाँ मेरा, तुम्हारा, हर किसी का
प्रेम, 'गर हो
रोज़ ही भभककर जवाँ होता है।
 
तुम फिर,
जाने क्यों आकर भी नहीं आ पायी
और मैं ठगा- सा
सारी संभावनाओं को टटोलने में रह गया,
मैं उलझ गया तब
प्रेम और प्रेम में मिलनेवाली उम्मीदों के
वैसे ही किसी अजनबी और उन्मादी नये शहर में
और मुझे सब कुछ भुला दिया जाना
हर तरह से जायज़ लगने लगा।
 
कुछ भी
बदल जाने की सारी नाउम्मीदी के बीच,
हो गया फिर हर सवाल सशंकित,
बदल गया हूँ मैं, तुम
या कि आज
वो झूठा समय बदल गया है!
 
 

- अमिय प्रसून मल्लिक