प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2018
अंक -44

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन
स्त्रियाँ और वृक्ष
 
श्श्श!
कि स्त्रियाँ बाँध रही हैं धागे
इस वृक्ष के तने से
ये विश्वास के धागे हैं
जो जोड़ते हैं स्त्रियों को
ईश्वर से
 
केवल स्त्रियों में है वह ताक़त
जो वृक्ष को ईश्वर में बदल दे
 
श्श्श!
कि गीत गा रही हैं स्त्रियाँ
पूजा करते हुए इस वृक्ष की
ये विश्वास के गीत हैं
जो जोड़ते हैं स्त्रियों को
ईश्वर से
 
केवल स्त्रियों में है वह भक्ति
जो गीत को प्रार्थना में बदल दे
 
आश्वस्त हैं स्त्रियाँ अपनी आस्था में
कि वृक्ष के तने से बँधे धागे
उनकी प्रार्थना को जोड़ रहे हैं
उनके आदिम ईश्वर से
 
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एक, दो, तीन और पाँच पैसे के सिक्के
 
मेरे बालपन की
यादों की गुल्लक में
अब भी बचे हैं
एक, दो, तीन
और पाँच पैसे के
बेशक़ीमती सिक्के
 
उन पैसों में बसी है
उन्नीस सौ सत्तर के
शुरुआती दशक
की गंध
उन सिक्कों में बसा है
माँ का लाड़-दुलार
पिता का प्यार
हमारे चेहरों पर
मुस्कान लाने का
चमत्कार
 
अतीत के कई लेमनचूस
और चाकलेट
बंद हैं इन पैसों में
तब पैसे भी
चीज़ों से बड़े
हुआ करते थे
 
एक दिन
न जाने क्या तो
कैसे तो हो गया
माँ धरती में समा गई
पिता आकाश में समा गए
मेरा वह बचपन
कहाँ तो खो गया
 
अब केवल
बालपन की यादों
की गुल्लक है
और उसमें बचे
एक, दो, तीन
और पाँच पैसे के
बेशक़ीमती सिक्के हैं
 
दो-दो हज़ार रुपये के
नोटों के लिए नहीं
इन बेशक़ीमती पुराने
सिक्कों के लिए
अब अक्सर
बिक जाने का
मन करता है
 
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काम पर बच्चे
 
सुबह के मटमैले उजाले में
दस-ग्यारह बरस के
कुम्हलाए बच्चे
काम पर जा रहे हैं
 
बुझी हुई हैं उनकी आँखें
थके हुए हैं उनके चेहरे
 
नहीं गा रहे वे
कोई नर्सरी-राइम
 
नहीं देख रहे वे स्वप्न
देव-दूतों या परियों के
 
जब उन्हें खेलना था
साथियों संग
जब उन्हें हँसना था
तितलियों संग
जब उन्हें घूमना था
तारों संग
वे काम पर जा रहे हैं
 
पूरा खिलने से पहले ही
झड़ गई हैं
उनके फूलों की
कोमल पंखुड़ियाँ
पूर्णिमा से पहले ही
हो गई है अमावस
उनके चाँद की
वसंत से पहले ही
आ गया है पतझर
उनके ऋतु -चक्र में
 
हर रोज़
सुबह के मटमैले उजाले में
यही होता है
हमारा अभागा देश
इसी तरह
अपना भविष्य खोता है
 
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नट बच्चा
 
शहर के गंदे नाले के
एक किनारे
डेरा लगाया है नटों ने
उन्हीं नटों में
एक बच्चा भी है
 
उसकी बाज़ीगरी ही उसकी
बाल-सुलभ लीलाएँ हैं
ऊँची रस्सियों पर
सँभल-सँभल कर चलना ही
उसके बचपन का खेल है
 
सुदूर ग्रह-नक्षत्रों जैसे
दूर हैं हम-आप उससे
उसके दु:खों से
उसकी चिंताओं से
 
सारी पंच-वर्षीय योजनाएँ
उससे बहुत दूर हैं
बहुत दूर है
दिल्ली उससे

- सुशांत सुप्रिय